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दौड़ते हुए पिछड़ जाने का समय - ध्रुव शुक्ल

दौड़ते हुए पिछड़ जाने का समय - ध्रुव शुक्ल

अपने वक़्त को पहचानना कठिन होता जा रहा है। लगता है कि जैसे दूसरों के द्वारा गढ़े गये समय में जिए चले जा रहे हैं। यह निजता को अर्जित करने का नहीं, दूसरों के द्वारा गढ़ी गयी ग़ुलामी का समय है। यह उधार के जीवन पर गर्व करने और व्यभिचार को पाप न समझने का समय है। यह जनमत की लूट और अत्याचारियों को मनमानी छूट देने का समय है। यह मुट्ठी भर बाज़ारू लोगों के द्वारा दुनिया को हाँके जाने का समय है। कथन पर भरोसा जताने का नहीं, करार में उलझ जाने का समय है। यह ऐसा समय है जो अन्याय से, असुरक्षा से और असहायता से हमें लगातार घेरता चला आ रहा है।

विवेकहीन समाजसेवक और निर्लज्ज व्यापारी कुकरमुत्तों की तरह पग-पग पर गुमटियाँ सजाये बैठे हैं। सड़कों पर उलझे हुए निरर्थक जुलूस और आकाश में ऊँचे उठता बाज़ार का नंगा प्रचार हमें घेरता ही चला आ रहा है। चारों तरफ जैसे कैमरे की आँखें हम पर गड़ी हुई हैं जो लगातार हमारा पीछा कर रही हैं। इन आँखों की दिलचस्पी कुछ बदलने में नहीं, बस उन्हें चाहिए दंगों मरते, बाढ़ में डूबते और सड़कों पर बदहवास भागते लोग। 

त्रस्त और घुटते जीवन में मौत की ख़बर देना अब व्यापार है क्योंकि जो लोग घुट-घुटकर जीवित बचे हुए हैं उन्हें दूसरों की मौत की ख़बर सुनकर यह सांत्वना मिल जाती है कि वे अभी भी मरने से बचे हुए हैं। ऐसे लोग किसी मरते हुए को बचाने के लिए नहीं दौड़ते। उन्हें तो बस अपने बचे रह जाने की खुशी होती है। जैसे-तैसे ज़िंदा रहते लोगों को खुश रखने के लिए मौत,बीमा और आतंक की ख़बरों का व्यापार मुनाफे का धंधा है।

यह जीवन से मुनाफा कमाने का वक़्त है। यह अपना देश छोड़ सात समंदर पार चले जाने का वक़्त है। यह नदियों में गंदगी भरने, पहाड़ों पर कचरा फैलाने, धरती की साँस रूँधने और हवाओं में धुआँ भर देने का वक़्त है। यह दूसरों के जीवन में बेशर्मी से झाँकने और नीचा दिखाने का वक़्त है। यह लोगों में डर भरकर उन्हें लूट लेने का वक़्त है।

देखो तो हमारा विकसित दुर्भाग्य कि यह ठण्ड में ठिठुरकर, लू में झुलसकर और बाढ़ में बह जाने का वक़्त है। यह डरावनी प्रगति के साथ दुर्गति का वक़्त है। यह लगातार बढ़ती जाती ऐसी संवेदनात्मक लापरवाही का भी वक़्त है, जिसमें सब अपनी-अपनी चिंता में डूबकर बिलकुल अकेले हुए जा रहे हैं। निरर्थक वार्तालाप, अश्लील चुटकुले और प्रायोजित संवाद ही जीवन काट लेने के लिए काफी मान लिए गये हैं। यह धीरज का, मौन का और संतोष का समय नहीं है। इस समय में अधैर्य, बड़बोलापन और असंतोष भर गया है। यह तेज दौड़ते हुए थक जाने का समय है। यह तुक भंग, छंद भंग और अर्थ भंग का समय है। यह कविता की विदाई का, इतिहास के अंत का, ईश्वर की मृत्यु का और समय को खोने का समय है। यह राजनीति और धर्म के दिन लद जाने का भी वक़्त है।

यह इतना कठिन समय है और चुनौती दे रहा है तो इससे मुठभेड़ की शुरूआत दूसरों से नहीं, अपने आप से ही होनी चाहिए। अपने किए-धरे पर पछताने की कला जिन्हें नहीं आती वे कभी अपने समय से न तो जूझ पाते हैं और न ही उसे रच पाते हैं। समय वैसे भी कहाँ होता है, वह तो रचना करने से दिखाई भर पड़ने लगता है। अगर समय भारी हो गया है तो उसे नयी रचनाशीलता से फिर निर्भार और आत्मीय बनाया जा सकता है। समय निर्भार तभी होता है जब रचना में सब भागीदार होते हैं।