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4 माह की मासूम बेटी के कारण नाबालिग मां-बाप को मिला हक, मानवीय आधार पर कोर्ट ने सुनाया फैसला

4 माह की मासूम बेटी के कारण नाबालिग मां-बाप को मिला हक, मानवीय आधार पर कोर्ट ने सुनाया फैसला


नई दिल्ली । समाज और किशोर हित को सर्वोपरि मानते हुए जज मानवेन्द्र मिश्रा ने एक बार फिर लीक से हटकर फैसला सुनाया है। उन्होंने बिहार के नाबालिग दंपती और उनकी चार माह की मासूम बेटी की जान की हिफाजत को कानून के प्रावधानों से अधिक अहमियत दी। उन्होंने आरोपित किशोर और नाबालिग लड़की को शादी की नीयत से भगाकर ले जाने व रेप जैसे जघन्य अपराध से न सिर्फ दोषमुक्त किया, बल्कि नाबालिग की शादी को समाज हित व उत्पन्न हालात में सही करार दिया है।
हालांकि फैसले में यह भी कहा कि इस जजमेंट को आधार बनाकर कोई अन्य दोषी खुद को निर्दोष साबित करने का प्रयास न करे।  चार माह की बच्ची व उसकी मां को आरोपित किशोर के हवाले कर दिया। साथ ही, किशोर के मां-बाप को आदेश दिया कि वयस्क होने तक दंपती व उससे जन्मी बच्ची को सही तरीके से देखभाल, सुरक्षा व संरक्षण देंगे। इसके अलावा बल कल्याण पदाधिकारी को निर्देश दिया कि किशोर व उसकी नाबालिग पत्नी व बच्चे पर सतत निगरानी रखेंगे। वह दो वर्षों तक प्रत्येक 6 माह में उसके रहने, खाने-पीने व अन्य हालात की विस्तृत रिपोर्ट किशोर न्याय परिषद को सौंपेंगे।

घटना के समय वर्ष 2019 में किशोर 17 व लड़की 16 साल की थी। मामला नूरसराय थाना क्षेत्र से जुड़ा है। प्रेम-प्रसंग में दोनों नाबालिग ने भागकर शादी रचा ली। बाद में अंतरजातीय विवाह को लेकर लड़की पक्ष के लोगों ने अपनी बेटी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, लड़की ने भी कोर्ट में दिए गए बयान में अपनी जान को मां-बाप से खतरा बताते हुए लड़के के साथ रहने की बात कही थी।
किशोर को दंडित करना तीन जानों से खेलने जैसा : जज
न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि हर अपराध के लिए सजा दिया जाना न्याय नहीं होगा। यह सही है कि किशोर ने नाबालिग लड़की को भगाकर ले गया। और, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाया, जिससे एक बच्ची पैदा हुई। यह अपराध है। लेकिन, अब उसकी बच्ची जन्म ले चुकी है। बच्ची व उसकी मां को उसके परिजन स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में किशोर को दंडित करके तीन नाबालिगों की जान सांसत में नहीं डाली जा सकती है। किशोर ने भी पत्नी व बच्ची को स्वीकार करते हुए अच्छी तरह से देखभाल कर रहा है। और आगे भी करने का वचन कोर्ट के समक्ष देता है तो यहां पर न्याय के साथ तीन लोगों का हित भी देखना सर्वोत्तम है।