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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-झूठ का कारोबार जो सच से ज्यादा प्रभावी है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-झूठ का कारोबार जो सच से ज्यादा प्रभावी है


भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान, बीसीसीआई के अध्यक्ष और क्रिकेट मैच में अपनी टी शर्ट उताकर रातों-रात चर्चा में आये सौरभ गांगुली बाकी क्रिकेटरों की तरह बहुत से सामान का विज्ञापन करते दिखते हैं। राईस ब्रान हेल्थ फार्चुन तेल के विज्ञापन में वे इसे कोलेस्ट्राल फ्री बताकर, गुड कोलेस्ट्राल बढ़ाने वाला, हार्ट को हेल्दी से ज्यादा हेल्दी बनाने बताते हैं, वे खुद ही हार्टअटैक के शिकार हो गए। अपना हार्ट बचाने के लिए उन्होंने एंजियोप्लास्टी करानी पड़ी। भाजपा को पश्चिम बंगाल में जो एक चेहरा चाहिए था वह चेहरा दादा यानी सौरभ गांगुली हो सकते थे। कमबख्त दिल होता ही टूटने या धोखा देने और खाने के लिए। लोग दुनिया को जीवंत बनाये रखने के लिए सभी से कहते हैं दिल धड़कने दो।

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी ठंडा-ठंडा कूल-कूल तेल सहित और ना जाने किस-किस प्रोडक्ट का विज्ञापन करते दिखते हैं जबकि सबको मालूम है कि वे खुद विग लगाते हैं। गोरेपन की क्रीम फेयर एंड लवली ने गोरेपन के नाम पर सालों साल लोगों को चूना लगाने के बाद महसूस किया कि हम फेयर हटा रहे हैं। दरअसल, हम भारतीयों की गोरेपन के प्रति अतिरिक्त आसक्ति को देखकर ही लोग गोरेपन की क्रीम धड़ल्ले से बेचते हैं। गोरापन हमारे यहां कुछ लोगो के लिए सुंदरता का प्रतीक है जिस पर बहुत से लोग इतराते हैं। बहुत से ब्यूटीपार्लर, कास्टेमिक का कारोबार इन्ही रंगो के भरोसे चल रहा है। बहुत सारे टीवी चैनल पर रात 12 बजे के बाद दुख हरण और मन माफिक मुराद के लिए बहुत सारे ताबीज, मंत्र बेचने का काम कलाकारों के जरिये करते हैं। मोटापा कम करने से लेकर सेक्सुअल ताकत और इम्युनिटी बढ़ाने तक के इस कारोबार में उन चेहरों का उपयोग किया जाता है, जिन्होंने अपने काम से एक पहचान बनाई है। हमारी राजनैतिक पार्टियां, नेता भी तरह-तरह के विज्ञापनों का, नारों का और प्रचार माध्यमों का सहारा लेते हैं। हर चुनाव के पहले नये-नये नारे गढ़े जाते हैं, उन्हे विज्ञापित किया जाता है। मनभावन और लोक लुभावन नारे, वादो को इस सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया जाता है, की लोगों को सहसा उन पर विश्वास सा होने लगता है। पार्टी द्वारा किए जाने वाले वादो और उनके घोषणा पत्र को देखकर लगता है कि इसी पार्टी को वोट दे देना चाहिए। भले ही बाद में आंदोलन के जरिये आप कहें च्च्जोकिया वो निभाना पड़ेगाज्ज्। गरीबी हटाओ से लेकर अच्छे दिन आने वाले सभी नारे लोक लुभावन साबित हुए हैं।

प्रचार तंत्र का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि चमकीले झूठ के पांव पर सत्य के भ्रम को स्थापित करना चाहते हैं। नए समय में बदचलन पूंजी के आरोह-अवरोह में विश्व जनसंख्या की एक बड़ी संख्या को बरगलाने और बहकाने के लिए निर्लज्ज समर्पण भाव से प्रचार तंत्र का सबसे बदसूरत उपयोग किया है। काले लोगों के देश में गोरेपन की क्रीम बेचने की सफलता ने इन्हें एस्किमो को फ्रिज बेचने के साहस से भर दिया है। यह किसी एक कंपनी की बात नहीं है, यह पूँजी के उस पूरे तंत्र की बात है, जिसके हाथ में प्रचार तंत्र का चिराग हाथ लगा है। सामान्य से उदाहरण के लिए बताया जाए तो गंजे पति के साथ रहते हुए जूही चावला बाल उगाने का तेल बेच रही है। ऐसे बीसियों उदाहरण हैं। प्रचार तंत्र झूठ को विश्वसनीय बनाने के लिए एक कारगर हथियार है। इसका और भी बड़ा उदाहरण राजनीति में देखा जा सकता है। कितनी अजीब बात है कि प्रजातंत्र के कीचड़ में लिथड़ कर झूठ और ज्यादा चमकीला नजर आता है। सोशल मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से इस झूठ के पांव सैकड़ों की तादाद में हो गए हैं। वह तेज गति से चलता भी है और अपना भरोसा भी मजबूत करता चलता है। अब एक ऐसा घटाटोप तैयार हो गया है, जिसमें झूठ ही सच की तस्वीर है। बाजार का यह उपकरण प्रचार तंत्र कुछ इस तरह से लोकप्रिय हुआ कि उसने बाजार के साथ ही सामाजिक जीवन और खासकर जहां सबसे ज्यादा नैतिकता की जरूरत होती है यानी राजनीति को भी अपने शिकंजे में कस लिया है। अंध भक्तों की भीड़ इसका बड़ा उदाहरण है। राजनीतिक दलों के आईटी सेल से निकलने वाली खबरें इसी झूठ को चमकीला बनाए रखने की कवायद है। इसका भयावह परिणाम यह निकलेगा कि जब झूठ के पैर टूटेंगे तो बाजार तो कोई दूसरा रास्ता अपना लेगा, लेकिन राजनीति के पास नैतिकता की शरण में आने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचेगा, जो वह किसी भी हालत में नहीं चाहेगी। इतिहास का एक चक्र होता है। झूठ का इतिहास भी अपना चक्र पूरा करेगा और किसी बहुत बुरी दशा को पहुंचेगा।
गांगुली के हॉर्ट अटैक की खबर आते ही सोशल मीडिया में फॉर्चुन ब्रैंड को लेकर कई तरह के मीम्स बन रहे हैं। लोगों ने ब्रांड एंडोर्समेंट पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। उनका कहना था कि Adani Wilmar तेल का आयात करती है और पता नहीं सेलेब्रिटीज जिस चीज का विज्ञापन करते हैं, उसे खुद भी यूज करते हैं या नहीं। Adani Wilmar ने अपने फॉर्चुन राइस ब्रान कुकिंग ऑयल के उन सभी विज्ञापनों को रोक दिया है।
इस झूठ के कारोबार पर अंकुश लगाने के जो प्रयास हुए हैं अभी उनके परिणाम उस तरह दिखलाई नहीं दे रहे हैं जैसा सोचा गया। समाज में भ्रम फैलाकर विज्ञापनों में झूठे वादे करने या गलत जानकारी देने पर कंपनियां, सर्विस प्रोवाइडर्स और उस विज्ञापन को एंडोर्स करने वाले सेलेब्रिटीज को भी सजा हो सकती है। लोकसभा में उपभोक्ता संरक्षण बिल 2019 पास कर दिया गया है। इस बिल में प्रावधान है कोई भी विज्ञापन चाहे वो- प्रिंट, रेडियो, टेलीविजन, आउटडोर, ई-कॉमर्स, डायरेक्ट सेलिंग या टेलीमार्केटिंग किसी भी माध्यम से किया जा रहा हो, अगर इसमें गलत जानकारी दी जाएगी तो ये अपराध की श्रेणी में आएगा।

इस बिल में ऐसे विज्ञापन या मिस लीडिंग ऐड्स को ऐसे परिभाषित किया गया है, जिसमें किसी भी प्रॉडक्ट या सर्विस की झूठी जानकारी देना, झूठी गारंटी देना, कंज्यूमर्स को प्रॉडक्ट के नेचर, सब्सटेंस, क्वांटिटी या क्वालिटी को लेकर फुसलाना या जानबूझकर सर्विस प्रोवाइडर या मैन्युफैक्चरर की ओर से कोई जानकारी छुपाई जाए। इस बिल के प्रावधान के मुताबिक, सर्विस प्रोवाइडर्स को 10 लाख रुपये के जुर्माने के साथ अधिकतम 2 साल की जेल की सजा हो सकती है, वहीं सेलेब्रिटीज को 10 लाख रुपये का जुर्माना झेलना पड़ सकता है। 2017 में मध्य प्रदेश के जबलपुर के उपभोक्ता फोरम ने महानायक अमिताभ बच्चन और नवरत्न तेल निर्माता कंपनी इमामी के भ्रामक प्रचार को लेकर दायर किए गए परिवाद पर सुनवाई शुरू करते हुए जवाब-तलब किया था। उनसे पूछा गया है कि नवरत्न ठंडा-ठंडा, कूल-कूल कैसे हैं।

उदारीकरण के बाद आई उपभोक्ता संस्कृति के विस्तार के साथ ही शायद ही ऐसा कोई छोटा बड़ा उत्पाद बच पाया है जिसे कोई हस्ती एनडोर्स न कर रही हो। जिन उत्पादों के लिए महंगे सेलिब्रिटी उपलब्ध नहीं हो पाते, उनमें टीवी सितारों से काम चला लिया जाता है।

एनडोर्समेंट से सेलिब्रिटी को कितनी ज्यादा कमाई होती है, इसे शाहरुख खान के उदाहरण से समझा जा सकता है। शाहरुख खान ने कई साल पहले यह बयान देकर सभी को चौंका दिया था कि फिल्मों में काम करने से उन्हें कोई खास कमाई नहीं होती, घर का गुजारा तो शादी-ब्याह या स्टेज शो में नाचने और एनडोर्समेंट के जरिए विज्ञापन से होने वाली कमाई से चलता है।  सिर्फ एनडोर्समेंट से शाहरुख को एक साल में अस्सी से सौ करोड़ रुपए की आय होने का अनुमान है। विज्ञापन से आय कमाने में विराट कोहली इस समय सबसे आगे निकल गए हैं। अनुमान है कि एक एनडोर्समेंट के लिए उन्हें दस से पंद्रह करोड़ रुपए तक मिल जाते हैं। हमारे अधिकांश सेलिब्रिटी, फिल्म और टीवी से जुड़े कलाकार, खिलाड़ी अपने खेल से ज्यादा अपने विज्ञापनों में दिखाई देते हैं। अब फिल्म बनाने के बराबर ही फिल्म के प्रचार-प्रसार का बजट होता है। हम जिस समय में हैं वहां झूठ का कारोबार सच से ज्यादा प्रभावी है और यह सब पूंजी की माया है।
सांच कहूं तो मारन धावै
झूठे जग पतियाना साधौ
देखो जग बौराना ।