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महामारी के बीच दाढ़ी पर बहस

महामारी के बीच दाढ़ी पर बहस

*ध्रुव शुक्ल*


कोरोना महामारी में तिनका-तिनका बिखरते जीवन के बीच देश में दाढ़ी पर बहस हो रही है। पर कोई भी दाढ़ी की परंपरा पर बात ही नहीं कर रहा। पुराण कथाओं पर नज़र डालें तो इस सृष्टि में पहली दाढ़ी ब्रह्मा की है। उन्हें संसार की रचना और व्यवस्था निर्माण करते हुए अपनी दाढ़ी की नहीं, जीवन की चिंता थी। वे जानते थे कि दाढ़ी का अपने आप उगते जाना कोई योग-दान नहीं है। उनकी अभिलाषा थी कि धरती पर जीवन के आसपास हरी-भरी दूब सदा उगती रहना चाहिए।


ऋतुकाल में गुँथे जीवन-यज्ञ के मर्म में गहराई तक डूबे ऋषियों के देदीप्यमान मुखमण्डल पर शोभती दाढ़ी को कौन भुला सकता है जो अपनी दाढ़ी को भूलकर सृष्टि के देवताओं को उन्नत बनाये रखने के लिए सदा यज्ञ करते थे। वे जान गये थे कि राजा तो निमित्तमात्र है उसका जीवन तो रोज़ दाढ़ी बनाकर सजने-सँवरने,राजकुमारियों का अपहरण करने और व्यर्थ ही युद्धों में बीत जाता है। पृथ्वी,जल वायु,अग्नि और आकाश ही जीवन को पोषित करने में समर्थ हैं। वे राजा को समझाते रहे कि जीवन में साधन बचे रहें यही राजा का साध्य होना चाहिए। राजा की दाढ़ी के होने और न होने से देश के कल्याण का कोई संबंध नहीं।


कभी सूर्य और चन्द्रमा के सामने कोई बादल बड़ी देर तक ठिठका रहता है। लगता है कि जैसे उनकी दाढ़ी उग आयी हो। फिर अचानक वायु का तेज झौंका उनकी दाढ़ी मूँड़ देता है। वेद कहते हैं कि सूर्य जगत को पोषित करने वाला विष्णु है। विष्णु की दाढ़ी किसी ने नहीं देखी। उसकी दाढ़ी नाभि के नीचे उसी के पेट में छिपी है और उसका प्रत्येक केश एक ब्रह्माण्ड के बराबर है। वह अपने चेहरे पर दाढ़ी बढ़ाये बिना ही एक देश तो क्या, सारे ब्रह्माण्डों का पालनहार है।


जिनकी दाढ़ी बड़ी होती जाती है उन्हें देखकर लगता है कि वे अपना मुँह छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। फिर कहावत के अनुसार लोग उनकी दाढ़ी में छिपा हुआ तिनका भी खोजने लगते हैं। ...छिपे हुए हैं कितने तिनके, बता रहे सब गिनके। सोचिए, अगर महाकाल शिव ने अपनी दाढ़ी बढ़ायी होती तो संसार की आँखों से उनका नीलकण्ठ छिप जाता और कोई जान ही नहीं पाता कि उन्होंने जीवन की रक्षा की खातिर सारा विष अपने कण्ठ में रखा भी है या नहीं। लोग सी.बी.आई. जाँच की माँग करने लगते और सागर मंथन से निकले रेमडेसिविर के इंजेक्शन सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं को चीह्न-चीह्नकर बाँटने लगते। जिसकी एफ.आई.आर. भी नहीं होती।


भारतीय परंपरा में दाढ़ी वालों ने कभी राज्य स्वीकार नहीं किया। वे गहन वनों में रहकर ही प्रजामंगल की साधना करते रहे। दुनिया की आधुनिक सत्ताएँ ज़रूर कुछ दाढ़ियों के राज्य में उलझ गयीं। अमरीका का रास्ता अब्राहम लिंकन की दाढ़ी से निकला। सोवियत रूस कामरेड लेनिन की छोटी-सी दाढ़ी में अपना भविष्य खोजने लगा। उसे टाल्स्टाय की दाढ़ी की परवाह नहीं थी। भारत ने भी रवीन्द्रनाथ टेगोर की उज्ज्वल दाढ़ी का सम्मान कहाँ किया। चीन में माओ की दाढ़ी और मूँछ ही नहीं थी। तभी तो चीन बीच बाज़ार में खड़ा होकर पूरी दुनिया के नेताओं की दाढ़ी-मूँछ मूँड़ने पर आमादा है।


यूरोप की उधारी में फँसे अपने देश को देखकर उन पूर्वजों की याद आती है जो कभी साहूकार के पास हुण्डी के रूप में अपनी मूँछ का बाल रखकर धन ले लेते थे। मूँछ का बाल ही बाज़ार में चलता था और दाढ़ी के बालों का इतना प्रभाव था कि स्वाभिमानी भिक्षा माँगी जा सकती थी। बाद में ऐसा पतनकाल आया कि दाढ़ी भेष बदलकर ठगने के काम आने लगी।