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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः यह दिन सब पर उगा है

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः  यह दिन सब पर उगा है


यह दिन उगा है, इसे देखो

यह बोल रहा है, इसे सुनो

इस दिन से कुछ कहो

यह सब पर उगा है


चीटियाँ अपने अण्डे लेकर

समाती जा रहीं पृथ्वी में

एक सजी-सँवरी इल्ली 

चढ़ती चली जा रही

उँचे तिनके पर धूप में

रँग रही है दूर्वा 

धरती को हरे रंग से

पक्षियों की बोली सुन कर

तालियाँ बजा रहे हैं पत्ते

बादलों से झाँक रहा है दिन

बूँद-बूँद झरने के लिए


आ रहा है घर के भीतर

यह उगा हुआ दिन

जगा रहा है याद 

किसी स्वाद की

भूले हुए स्पर्श की

ठिठकी हुई यात्रा की


अभी उगे इस दिन का

बस इतना ही इतिहास

यह रोज़ उगता है


इससे पहले कि इस दिन पर

टँक जाये कोई तारीख

किसी अन्याय की

इस दिन से बात करो

यह सब पर उगा है


यही एक दिन बार-बार आता है