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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - वृद्धाश्रम का खुलना क्या अच्छा संकेत है?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  वृद्धाश्रम का खुलना क्या अच्छा संकेत है?

-सुभाष मिश्र

हमारी परंपरा में हम पितृपक्ष के जरिए अपने पुरखों को याद करते हैं। हमारी सारी धार्मिक मान्यताएं कथाएं और सीख हमें दूसरों की पीड़ा समझकर उसे दूर करने कहती है। गांधीजी का प्रिय भजन है-वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे। बावजूद इसके हम अपने आसपास के बुजुर्ग, बीमार, अशक्त लोगों की पीड़ा की अनदेखी करते हैं। तेजी से टूटते संयुक्त परिवार और एकल परिवार, अपनी कथित प्रायवेसी सुख और कैरियर के कारण बहुत सारे लोग अपने बुजुर्गों को अकेला छोड़कर यहां-वहां रह रहे हैं। बहुत सारी युवा दंपत्ति को बुजुर्गों की टोकाटाकी पसंद नहीं है। वे स्वच्छंद जीवन जीना चाहते हैं। यह भी सही है कि बहुत बार रोजी-रोटी का संकट और बेहतर भविष्य की संभावना के कारण अपने घरों से दूर जाते हैं। यह भी देखने में आया है कि कई बार लोग जानबूझकर अपने बुर्जुगों की अनदेखी करते हैं, ऐसे असहाय अकेले बुजुर्गों के लिए अब तेजी से वृद्धा आश्रम, होम केयर जैसी व्यवस्था विस्तारित हो रही है। महानगरों की तरह ही छोटे मंझले शहरों में भी बुजुर्गों की देखभाल के लिए लोग नर्सिंग सर्विसेस की सुविधा लेने लगे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बढ़ते कदम जैसी संस्था ने बुजुर्गों की देखभाल के लिए आनंद आश्रम स्थापित किया है जिसमें 60 बुजुर्ग रह सकेंगे। यहां सवाल यह है कि क्या किसी संस्कारी सभ्य कहे जाने वाले समाज में जो वसुधैव कुटुंबम की बात करता हो वहां पर वृद्धा आश्रम का बढऩा क्या शुभ संकेत है?

देश में बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग हैं जो उम्र के अंतिम पड़ाव में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार, वरिष्ठ नागरिकों के 25.02 लाख केस लंबित हैं। तीन लाख केस तो ऐसे हैं जिसमें बुजुर्ग गुजारा भत्ता पाने अपने ही घर में रहने और बच्चों द्वारा मारपीट के खिलाफ संरक्षण से संबंधित है।

देश में 2007 में वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण व कल्याण कानून बनाया था।  दुर्भाग्य से इस कानून के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है और यह सिर्फ कानून की किताबों या संतानों से सताये जाने के कारण वकीलों की शरण लेने वाले वृद्धजनों तक ही सीमित रह गया है। माता-पिता भी लोकाचार, बदनामी या अपनी कमजोरी की वजह से कोर्ट-कचहरी के चक्कर में नहीं पडऩा चाहते।

वृद्धजनों के हितों की रक्षा के लिये 2007 में बने इस कानून में भरण-पोषण न्यायाधिकरण और अपीली न्यायाधिकरण बनाने की व्यवस्था है। ऐसे न्यायाधिकरण को वरिष्ठ नागरिक से शिकायत मिलने के 90 दिनों के भीतर इसका निपटारा करना होता है।

न्यायमूर्ति मदन लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने 13 दिसंबर, 2018 को कांग्रेस के नेता डॉ. अश्विनी कुमार ने इस विषय पर एक जनहित याचिका पर केन्द्र सरकार को विस्तृत निर्देश भी दिये थे लेकिन यह मामला इसके बाद से अगली कार्यवाही के लिये आज तक सूचीबद्ध नहीं हुआ। एक अनुमान के अनुसार इस समय देश में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या 11 करोड़ से अधिक है और अगले दो साल में  बढ़कर 14 करोड़ 30 लाख हो जाने की उम्मीद है। अक्सर ऐसे मामले देखने में आते हैं जहां बच्चे अपने बुजुर्गों की अनदेखी करते हैं। मां-बाप को संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया जाता है या फिर उन्हें वृद्धाश्रम की चारदीवारी में रहने को मजबूर कर दिया जाता है। समाज में वृद्घों की स्थिति की गंभीरता को देखते हुये न्यायालय भी चाहता है कि देश के प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रमों का निर्माण हो जहां परिवार से त्याग दिये गये वरिष्ठ नागरिक सम्मान के साथ जिंदगी गुजार सकें।

सीनियर सिटीजन कानून के प्रावधानों के अनुसार 1. कोई भी वरिष्ठ नागरिक, जिसकी आयु 60 वर्ष अथवा उससे ज्यादा है इसके अंतर्गत माता-पिता भी आते हैं, जो कि अपनी आय या अपनी संपत्ति के द्वारा होने वाली आय से अपना भरण पोषण करने में असमर्थ हैं, वो अपने वयस्क बच्चों या रिश्तेदारों से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। अभिभावक में सगे और दत्तक माता-पिता और सौतेले माता और पिता भी शामिल हैं । 2. इस अधिनियम में ये भी प्रावधान है कि अगर रखरखाव का दावा करने वाले दादा-दादी या माता-पिता हैं और उनके बच्चे या पोता-पोती अभी नाबालिग हैं तो वो अपने रिश्तेदार जो उनकी मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी होगा पर भी दावा कर सकते हैं।  3. ऐसी परिस्थिति में जब वरिष्ठ नागरिक इस शर्त पर अपनी संपत्ति अपने उत्तराधिकारी के नाम कर चुका है कि वो उसकी आर्थिक और शारीरिक जरूरतों का भरण-पोषण करेगा और ऐसे में अगर संपत्ति का अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो माता-पिता या वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति वापस ले सकता है । 4. वरिष्ठ नागरिक, माता-पिता अपने क्षेत्र के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के पास लगा सकते हैं। अनुविभागीय अधिकारी(राजस्व) न्यायालय द्वारा अधिकतम दस हजार रूपये तक प्रतिमाह का भरण-पोषण खर्च वरिष्ठ नागरिक, माता पिता को दिलाया जा सकता है। 5. वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के प्रावधान के तहत भी न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी के न्यायालय में भरण-पोषण का आवेदन पेश कर सकते हैं। 6. कानून में ये भी है कि राज्य के हर जिले में कम से कम एक वृद्धाश्रम हो ताकि वो वरिष्ठ नागरिक जिनका कोई नहीं है, इन वृद्धाश्रमों में उनकी देखभाल हो सके। अमेरिका में नए गर्भपात कानून पर विवाद 7. सरकारी अस्पतालों में बुजुर्गों के उपचार का अलग से प्रावधान है उन्हें ज्यादा वक्त तक इंतजार ना करना पड़े इसके लिए अलग से लाइन की व्यवस्था होती है। 8. वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा या फिर उन्हें घर से निकाल देना एक गंभीर अपराध है और इसके लिए पांच हजार रुपये का जुर्माना या तीन महीने की कैद या दोनों हो सकते हैं। देश के कई राज्यों में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण व कल्याण अधिनियम 2007 लागू है लेकिन असम विधानसभा ने 2017 में बुजुर्गों के हित में एक नया बिल पास किया। असम एम्प्लॉयीज पैरंट्स रेस्पॉन्सिबिलिटी एंड नॉर्म्स फॉर अकाउंटैबिलिटी एंडमॉनिटरिंग बिल-2017 के मुताबिक, अगर कोई नौकरीपेशा शख्स अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल ठीक से नहीं करता है तो हर महीने एक तयशुदा रकम उसकी तनख्वाह से काटकर उसके मां-बाप को दी जाएगी। ये कानून फिलहाल असम में सरकारी कर्मचारियों के लिए है।

तमाम कानूनी व्यवस्था और प्रावधानों के बीच समाज परिवार में वृद्घों की देखभाल को लेकर बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। रायपुर के कोटा रोड, गुढिय़ारी स्थित संजीवनी वृद्धाश्रम में जहां 30 बुजुर्गों के रहने की व्यवस्था है वहां 12 वर्ष की व्यवस्था के उपरांत जो 24 बुजुर्गों की ताजिंदगी सेवा के सफर को किराये के भवन में पूरा करने के पश्चात अब अंवति विहार स्थित स्वयं के भवन आनंद आश्रम में स्थानांतरित किया गया। यह संस्था और मानवता की दृष्टि से बड़ा कदम है ।

मौजूदा हालात को देखकर प्रसंगवश शायर मित्र सूरज राय सूरज का यह शेर याद आ गया-

चेहरों पर मुस्कान, दिलों में लेके खाई बैठे हैं।
कर के सारे लोग, हिसाब-ए-पाई पाई बैठे हैं।
आज वसीयत करने वाले हैं बाबूजी, दौलत की
पहली बार इकठ्ठे घर में सारे भाई बैठे हैं।