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ईश्वर का कोरोनावायरस से कुछ नहीं बिगड़ेगा

ईश्वर का कोरोनावायरस से कुछ नहीं बिगड़ेगा

दिलीप मंडल

ईश्वर ने बड़े-बड़े झंझावात, युद्ध, महामारी, अकाल, भूकंप, सुनामी, बाढ़ को झेला है. पहले भी कई बार भीषण प्लेग, हैजा और कॉलरा आए. इन महामारी में लाखों लोग मर गए, लेकिन ईश्वर जिंदा रहा. इस बात की पूरी संभावना है कि ईश्वर कोरोनावायरस के मौजूदा संकट के बावजूद न सिर्फ बचा रहेगा, बल्कि मुमकिन है कि उसकी सत्ता और मजबूत होकर सामने आएगी.

जब भी ऐसा कोई संकट मानव सभ्यता पर आता है या कोई भयानक त्रासदी होती है तो तर्कवादी और अनिश्वरवादी लोग ये सवाल पूछते हैं कि कहां है ईश्वर और वह अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति इंसानों को बचाता क्यों नहीं है? वह उन लोगों को क्यों नहीं बचाता, जो बरसों से उसकी अराधना करते हैं, उसमें आस्था रखते हैं?

सवाल ये भी पूछा जाता है कि आदमी अराधना तो ईश्वर की करता है, लेकिन संकट आने पर समाधान के लिए अक्सर विज्ञान या किसी ऐसी संस्था की ओर देखता है, जिसे इंसानों ने बनाया है. कोरोनावायरस के मौजूदा कहर में कोई ये नहीं कह रहा है कि ईश्वर हमें दवा या वैक्सिन देगा. ये काम किसी प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों को ही करना होगा. सवाल उठता है कि अगर मनुष्य ईश्वर की संतान है, या उसकी रचना है, तो उसे बचाने या कष्टमुक्त करने का दायित्व वो क्यों नहीं उठाता? ये जिम्मा विज्ञान पर क्यों है?

बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ये कहती हैं कि संकट काल में ईश्वर मनुष्य का साथ नहीं देता. ऐसा कहते हुए वे तमाम धर्मों को निशाने पर लेती हैं. वे कहती हैं कि मनुष्य सालों-साल जिनकी पूजा करता है, वह कष्ट के समय में उन्हीं लोगों के काम नहीं आता.

तर्क और आस्था का संग्राम

जब भी कोई नई दवा या वैक्सिन की खोज होती है या मानव जीवन को संकट में डालने वाली किसी व्याधि का समाधान निकलता है; कोई बांध बनता है, जिससे बाढ़ रुक जाती है; या कोई भूकंपरोधी तकनीक विकसित होती है तो तर्कवादियों को लगता है कि विज्ञान ने एक और मोर्चा फतह कर लिया और अब ईश्वर का मानव जीवन में हस्तक्षेप कुछ और घट गया. उन्हें ऐसा लगता है कि एक दिन ऐसा आएगा, जब विज्ञान का पूरी तरह बोलबाला होगा और लोगों को ईश्वर से मुक्ति मिल जाएगी.

लेकिन अतीत के अनुभव बता रहे हैं कि अभी तक ऐसा कुछ हुआ नहीं है. हर संकट के बाद ईश्वर पहले से कहीं ज्यादा प्रभावशाली, ज्यादा ताकतवर होकर निकलता. ईश्वर की सत्ता को चुनौती देने में कोई भी वैज्ञानिक खोज सफल नहीं रही है.

हर संकट के साथ मजबूत होता गया ईश्वर

एशिया में 2004 में आई विनाशकारी सुनामी के दौरान देखा गया कि पानी उतरने के बाद जब लोग वापस अपने गांव, शहर और कस्बों में लौटे तो उन्होंने अपने घरों के साथ अपने धर्मस्थलों की भी मरम्मत की. बल्कि कई नए धर्म स्थल भी बनाए गए और इसके लिए राहत के लिए आई सामग्री और पैसा का भी एक हिस्सा इस्तेमाल कर लिया गया. ऐसा नहीं हुआ कि सुनामी रोक पाने में ईश्वर की अक्षमता की बात कहकर लोगों ने ईश्वर को विदा कर दिया हो.

हो सकता है कि कोरोनावायरस का कहर जब थमे तो ऐसा ही कुछ फिर से हो. मतलब ये कि ईश्वर को फिलहाल डरने की जरूरत नहीं है कि कोरोना को रोक पाने में उसकी नाकामी की वजह से उसकी सत्ता कमजोर पड़ जाएगी. न ही लोग ईश्वर से ये पूछने वाले हैं कि जब लोग बीमार हो रहे थे और मर रहे थे, तब उसने ये सब होने क्यों दिया?

तकलीफ से ईश्वर का रिश्ता

मानव सभ्यता के लिखित इतिहास को देखें तो ऐसा लगता है कि मानवीय तकलीफ और ईश्वरीय सत्ता के मजबूत होने के बीच सीधा संबंध हैं. सर्वाधिक धार्मिकता उन समुदायों में मिलेगी, जहां जीवन सबसे कठिन है और तकलीफ, गरीबी, पिछड़ापन सबसे अधिक है. जो विकसित देश और अमीर देश हैं, वहां धार्मिकता उतार पर है. यूरोप और अमेरिका में ये प्रवृत्ति देखी जा सकती है, जहां चर्च में जाने वाली भीड़ में तेज गिरावट आई है और लोगों ने ईश्वर का साथ छोड़ दिया है.

हालांकि ये हमेशा एकरेखीय या लीनियर यानी सीधी प्रक्रिया नहीं है. सोवियत क्रांति के पश्चात आधुनिक शासन प्रणाली अपनाने पर सोवियत संघ ने ईश्वर को अलविदा कह दिया और चर्च में लोगों का जाना बंद हो गया.

ऐसा लगभग सात दशक तक चला. लेकिन कम्युनिस्ट शासन के अंत के साथ ही नवें दशक में रूस में ऑर्थोडॉक्स चर्च की वापसी हो गई. इसका मतलब है कि ईश्वर को अगर लंबे समय कि लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए तो भी वह वहां जिंदा रह सकता है और वापसी कर सकता है!

अगर हम तर्क करने के लिहाज से मान लें कि ईश्वर है तो हमें एक विरोधाभास नजर आता है. ईश्वर ने जिन लोगों को धन-धान्य, शिक्षा, समृद्धि, स्वास्थ्य सेवाएं, अच्छे घर दिए, वे लोग ईश्वर को भुला रहे हैं. जबकि जिनके जीवन में सिर्फ भूख, तकलीफ, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि है, उन्होंने ईश्वर को सीने से मजबूती से चिपका लिया है.

इसका मतलब ये है कि मानवीय तकलीफ से ईश्वर की सत्ता कमजोर नहीं होती, बल्कि मजबूत होती है.

मार्क्स के लिए ईश्वर का मतलब

अनिश्वरवादियों के प्रिय दार्शनिक और विचारक कार्ल मार्क्स के पास इसकी एक व्याख्या है. अनिश्वरवादी मार्क्स की इस उक्ति को बार-बार दोहराते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि धर्म जनता का अफीम है. लेकिन उनकी पूरी उक्ति को देखिए, जो इस प्रकार है – ‘धर्म वंचित लोगों के दिल की आह है. ये निर्दयी दुनिया में दया है. ये बुरी हालत में मिलने वाली सांत्वना है. ये जनता का अफीम है. एक काल्पनिक सांत्वना या खुशी के तौर पर धर्म के अंत की कामना का अर्थ वास्तविक सुख की प्राप्ति की इच्छा है. धर्म से मुक्ति की कामना का अर्थ है उस स्थिति से मुक्ति है, जिसमें काल्पनिक सांत्वना की जरूरत पड़ती है.’ यहां मार्क्स धर्म के महत्व को स्वीकार करते हैं हालांकि वे एक ऐसी स्थिति के बारे में बात करते हैं जहां धर्म की जरूरत नहीं होगी.

ये दिलचस्प है कि मार्क्स ने अपनी सूत्रीकरण में राज्यसत्ता के विलोप की बात की है, लेकिन धर्म सत्ता के विलोप या अंत की बात नहीं की है.

मैं इस आलेख में उन चार कारणों की चर्चा करना चाहता हूं, जिनकी वजह से धर्म की सत्ता को स्थायित्व मिला है और मानवीय त्रासदी को रोक पाने में धर्म की असमर्थता के बावजूद धर्म और ईश्वर टिका हुआ है. इसी से समझा जा सकता है कि कोरोना वायरस भी ईश्वर का कुछ बिगाड़ क्यों नहीं पाएगा.

– ईश्वर की भूमिका ये नहीं है वह लोगों को तकलीफों से आजाद करे. लोगों की समस्याएं हल करना उसका काम नहीं है. वह लोगों को तकलीफों के बीच जीना सीखाता है. जब मानव जाति का बड़ा हिस्सा भूख, तकलीफ और त्रासदियों में जी रहा है, तब उन लोगों को जीवन के प्रति विश्वास और आस्था बनाए रखने के लिए एक सांत्वना का कोई स्रोत चाहिए. ईश्वर करोड़ों दीन-हीन और लाचार लोगों के जीवन की वही सांत्वना, वही उम्मीद है.

– अज्ञात का असीम विस्तार और विज्ञान की सीमाएं: विज्ञान के आगे बढ़ने के साथ कई अबूझ पहेलियों का समाधान हुआ है. कई ऐसी चीजों के बारे में हम अब जानने लगे हैं, जो हमारे पुर्वजों को डराती थीं, उन्हें अचंभित करती थीं. लेकिन विज्ञान की सीमाओं के परे बहुत कुछ ऐसा है, जिसकी व्याख्या अभी विज्ञान के पास नहीं है. जब विज्ञान की सीमा आगे बढ़ जाएगी और उन अनजानी चीजों के बारे में लोग जानने लगें तो उसके परे भी शायद ऐसा कुछ होगा जिसे जानना बाकी होगा. अमेरिकी विदेश मंत्री डोनल्ड रम्सफेल्ड ने 2002 में रक्षा विभाग के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक अन्य संदर्भ में ये कहा था कि हम जानते हैं कि बहुत कुछ अनजाना है. लेकिन ऐसा भी बहुत कुछ है जिनके बारे में हम नहीं जानते और जो अनजाना है. इसके लिए उन्होंने ‘अननोन अननोन्स’ का इस्तेमाल किया था. विज्ञान की व्याख्याओं से परे पराविज्ञान और ईश्वर की सत्ता है. चूंकि ऐसा बहुत कुछ है, जिसे जानना अभी बाकी है, इसलिए कहा जा सकता है कि ईश्वर की उम्र लंबी साबित होने वाली है.

कोरोनावायरस के मौजूदा प्रकोप से ईश्वर की सत्ता मजबूत होकर उभर सकती है, क्योंकि विज्ञान इस प्रकोप के बारे में पहले से बताने में नाकाम साबित हुआ है. कहा जा सकता है कि ऐसी अनजानी और अनहोनी चीजें आगे भी होंगी, जिनके बारे में विज्ञान को पता नहीं होगा. ईश्वर के लिए इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है?

– पाप और कर्म फल सिद्धांत : करोना या किसी भी तकलीफ की एक धार्मिक व्याख्या ये है कि दुनिया में पाप बढ़ गया था, इसलिए ईश्वर लोगों को सजा दे रहा है या फिर ये पिछले जन्म के कर्मों का फल है. चूंकि ईश्वर ही तकलीफ दे रहा है, इसलिए उस तकलीफ से बचने के लिए ईश्वर से सिर्फ प्रार्थना की जा सकती है. उसे दोष नहीं दिया जा सकता कि वह तकलीफ का अंत क्यों नहीं कर रहा है. 1934 में बिहार में आए भीषण भूकंप के बाद मोहनदास करमचंद गांधी ने कहा था कि चूंकि लोग अस्पृश्यता का पालन करते हैं, इसलिए ईश्वर ने भूकंप लाकर उन्हें सजा दी है. तकलीफ को दैवी मानने और कई बार तो ईश्वर की अराधना में खुद को चोट पहुंचाने तक की प्रथाएं समाज में हैं. कोरोना वायरस के संदर्भ में कोई मुस्लिम धर्मगुरु या कोई व्यक्ति से व्याख्या दे सकता कि सीएए और एनआरसी के माध्यम से लोगों को सताने के कार्यक्रम से ईश्वर नाराज है और लोगों को सजा दे रहा है. या कोई हिंदू या अन्य धर्म का गुरु ये कह सकता है कि धरती पर पाप बहुत बढ़ गया है और ईश्वर लोगों को सजा दे रहा है.

– इन सबसे परे, व्यक्ति के जीवन में ईश्वर की एक सामाजिक भूमिका भी है. उसकी उपयोगिता है. धर्म समाज में अक्सर एक व्यवस्था देता है. जीने के तरीके को भी कई तरीके से संचालित करता है. ऐसे ईश्वर के लिए दयालु और करुणाशील होना जरूरी नहीं है. ऐसा ईश्वर इसलिए नहीं मर जाएगा कि उसने किसी महामारी से लोगों के नहीं बचाया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह लेख उनका निजी विचार है.)