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अस्ताचल की ओर

अस्ताचल की ओर

डॉ. भारत कुमार अग्रवाल

वृद्धावस्था का संसार जटिल तानों-बानों की बुनावट है। यह मान -अपमान, जीत-हार, उत्कर्ष और पतन सुख-दुख विश्वास और धोखा, कातरता, विवशता, ममता और प्रेम के रंगों से सरोबार ऐसी अनूठी कहानी होती है, जो आपकी खुद की होती है। इस कहानी के कुछ हिस्सों पर आपको गर्व होता है। कुछ हिस्से स्याह भी होते है। जिनका पछतावा और ग्लानि आपको जीवनभर डंक  मारती रहती है।

बचपन, जवानी और अब प्रौढ़ता अलग-अलग अवस्थाओं से आप गुजरते हैं। इनके बारे में आपके मन में हजारों प्रश्र होंगे, क्या होगा? कैसे होगा?  जबसे दुनिया बनी है, आपके बुजुर्ग भी इन्ही रास्तों पर उन्हीं उत्कंठाओं के साथ इन्हीं प्रश्नों का जवाब ढूढंने निकले थे । कुछ अनुत्तरित प्रश्नों के साथ धीरे -धीरे किनारे लगते रहे, समुद्र की लहर की तरह जब बीच में एक लहर जवान और विशाल होकर गरजती हुई आगे बढ़ती है तभी कहीं कोई लहर धीरे-धीरे बुझती हुई किनारे पर जाकर शांत हो जाती है। यह क्रम निरंत्तर चलता रहता है।

अब जीवन के इस काल खण्ड में जब आप 60-65 वर्ष की आयु में प्रवेश कर रहें। पहले के काल खंडों की तरह ही इसका अुनभव भी आपको स्वयं ही करना होगा। अब आपको समझना होगा कि अब तक मध्यान्ह के प्रखर सूरज की तरह आकाश में चमकने वाले इस सूर्य की रोशनी अब धीरे-धीरे कम होती जाएगी। धीरे-धीरे धुंधलता बढ़ेगा और इसके पहले कि घना अंधकार छा जाए, आपको शारीरिक और मानसिक स्तर पर तैयारी करनी होगी।

इस समय तक आपको दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता, की पीढ़ी अधिकांश जा चुकी होगी। आपके इष्ट मित्र, बाल सखा, संगी-साथी, रिश्तेदार , जिन्हें आप और जो आपको चाहते हैं धीरे-धीरे बिछड़ने लगते हैं। 2-4 साल आगे-पीछे अब आपको अपने आपकी देखभाल करने में कठिनाई होने लगती है। आपके परिवार का ही युवा उछलती लहरों पर सवार होकर अपना भविष्य संवारने की चिंता में लग गया है और आप किनारे की ओर बढ़ रहे हैं। अब पत्नी या पति में से कोई एक साथ छोड़ चुका है। वर्षो का साथ सहारा छूट गया। अब आपके सामने भीषण खाली अकेलापन है। इस निर्जनता एकांतवास और अकेलेपन में कैसे सुखी रहा जाए, यह आपको सीखना होगा।

अब धीरे-धीरे शरीर साथ छोडऩा शुरू करता है। इस उम्र के सौंदर्य प्रतिमान है। हड्डी छोड़ती लटकती त्वचा, झुर्रियां, गंजापन, खिचड़ी बाल, मस्से और काले चकत्ते, धुंधलाती नजर, चश्मा और छड़ी हमारे साथी हो जाते है। बिन बुलाये मेहमान, कार्डियो वेस्कुलर ब्लाकेज, कैंसर, टीबी, बी.पी. आदि कभी भी आपके घर पर आ धमकेगें। मन की गति तो अब भी तेज है, पर पैर लडख़डाते हैं। परिणाम, गिरना, हड्डियों का टूटना, पीड़ा, रोग, अब हमारे अंत तक साथ रहने वाले मित्र हो जाएंगे। यदि आपको अब तक कोई बड़ी शारीरिक बीमारी नहीं है, तो कृपया शेखी  न बघारियेगा, पता नहीं कल कौन मित्र द्वार खटखटा दे। अब सकारात्मक मानस, सही, नियमित और पर्याप्त व्यायाम, नियमित दिनचर्या, संतुलित और पौष्टिक भोजन, "कम खाना और गम खाना" ही आपको लम्बी रेस का घोड़ा बनाये रख सकता है। मेरे पिता को 100 वां वर्ष चल रहा है। दो-चार बार गिर चुके है। कुछ हड्डियां टूटी है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है। इनकी उपलब्धियां ये है कि, उन्हें अबतक कोई बड़ी बीमारी नहीं है। याददाश्त अच्छी है। चलते-फिरते है। कारण जो मुझे समझ में आता है वह है- एकदम नियमित दिनचर्या और संतुलित भोजन और शांत मन। 

आपका अतीत कितना ही यशस्वी, शानदार रहा हो,आप  कितने ही प्रसिद्ध रहे हो । बढ़ती आयु धीरे-धीरे आपको एक वृद्ध पुरूष / महिला में परिवर्तित करती जाती है। समाज को आपकी परवाह धीरे-धीरे कम होती जाएगी । अब आप बैठकों के केन्द्र बिन्दु नहीं होंगे। आपको चुप बैठना सीखना होगा। असहमति के बावजूद अब आपको दूसरों के विचारों की प्रशंसा करना और उन्हें स्वीकार करना सीखना होगा। दूसरों के विचारों के प्रति ईष्यालू दृष्टिकोण या उस पर असंतोष या गुर्राने की आदत आपको छोडऩा होगा। इनमें से है कोई है मेरे जितना पढ़ा लिखा या अनुभवी ? जैसी अकड़ कृपया छोड़े। वैसे भी गंजों की बस्ती में कंघा बेचने का प्रयास करना बुद्धिमानी नहीं है। कृपया विनम्रता न छोड़े । इज्जत मांगने के स्थान पर इज्जत कमायें।

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कई ठग, दुष्ट जो जानते होंगे कि बुढ्ढे के पास बहुत पैसा है । वे आपको लूटने की योजनायें बनायेगे, झूठी बाते, रातों रात अमीर बननेकी योजनायें विश्वासपात्र बनने के पूरे जतन करेंगे। कृपया सावधान रहें। आवश्यकता से अधिक धन-संपत्ति साथ न रखें। सीनियर सिटीजन को घर पहुंच सेवा अनेक बैंक देते हैं इसका लाभ उठाये। अपने जीवन के अंत काल तक किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े यह व्यवस्था अवश्य कर लें। आपके स्वजन भी अंत तक आपका साथ तब देते है जब उन्हें लगता है कि देने को आपके पास बहुत कुछ है।

जब आप नवजात शिशु थे । आपका अधिकांश समय बिस्तर पर कटता था। अब पुन: बिस्तर पर अधिक समय बिताने को तैयार हो जाइये। जब आप 7-8 माह के थे, तब बिना सहारे चलना आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। अब 80 की उम्र में बिना सहारे चलना आपकी बड़ी उपलब्धि होगी। जीवन में न जाने कितने झंझावात उतार-चढ़ाव, सुख-सुख देखने के बाद आप पुन: जीवन की प्रांरभिक अवस्था में पहुंच जाते है।

बचपन में आपकी देखभाल के लिए मां थी, परंतु अब मां तो नहीं होगी। स्वजन आपकी देखभाल करेंगे। परंतु मां जैसी देखभाल कोई कर सकता है क्या ? नाती-पोते, बच्चे होंगे तो भी जरूरी नहीं उपलब्ध होंगे। नर्स या कोई कर्मचारी होगा, जिसका आपसे कोई भावनात्मक संबंध नहीं होगा। चेहरे पर नकली मुस्कान लिए उसका मन गंदगी करने वाले, झुर्रीदार शरीर वाले बुढ्ढे के प्रति ऊब से भरा होगा।

अनेक वर्षो पहले शारदा चौक पर एक लाटरी टिकिट बेचने वाला लाउडस्पीकर पर प्रचार कर रहा था। आप भी ध्यान से पढ़े तब पकड़ पायेंगे। कह रहा था। भाइयों और बहनों न जाने कौन सी टिकिट आपका भाग्य बदल दे। तुरंत खरीदिये "समय" और "वक्त" को बदलते "टाइम" नहीं लगता।

समय मुठ्ठी में भरी रेत की तरह फिसलता है। दिन की शुरूआत ढंग से हुई नहीं और लो शाम आ गई।सोमवार को करुंगा सोचा था, और लो शुक्रवार आ गया। दिन, हफ्ते, माह गये तो गये, सालों साल निकल गये। कब 60 के होकर रिटायर हुए थे और अब 70 के हो गये। मां नहीं रही। पिता 100 के हो गये। मित्र, संगी एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं।

क्या कोई उपाय है कि हम लौट सकें। यदि नहीं और सिर्फ किनारे की ओर ही आगे जाना है । वह भी पता नहीं कितने पल, कितने दिन बचे हैं तो आइये वह सब करिये जिससे आपको आनंद मिलता है। बचपन के उन दिनों की ओर पुन: लौटे, जब आपमें उत्साह, उछाह, उमंग, फक्कडपन, मौज मस्ती भरी हुई थी। अपने बच्चों और उनके बच्चों की समस्याओं से उलझने के आपके दिन अब नहीं रहे।

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जीवन के इस अंतिम पढ़ाव में अब चित्त की स्थिरता (Equanimity) का अभ्यास करना होगा। जो स्वत: स्फूर्त होगा। यह शांत, स्थिर, स्वच्छ, निर्मल, आकाश के विस्तार की भांति होगा। जो रात में पड़ी ओस की बूंद की भांति आपके जीवन में झिलमिलायेगी । जीवन की धारा को प्रकृति की धारा के साथ एकाकार करने का प्रयास करिये।

आइये "बाद में " को अपने जीवन से बाहर करें। "बाद में " कर लूंगा । "बाद में"  कह दूंगा। "बाद में" सोचूंगा। हर चीज को "बाद में " पर छोडऩे की आदत को छोडऩा होगा। क्योंकि "बाद में " प्राथमिकताये बदल जाती है। रूचि समाप्त हो जाती है। शरीर साथ नहीं देता। बच्चे बड़े हो जाते है। हम बूढ़े हो जाते हैं। लोग वचन भूल जाते है। बाद में दिन के बाद रात आ जाती है। जीवन समाप्त हो जाता है। और हम मर जाते हैं। बाद के चक्कर में जीवन के बहुमूल्य क्षण कोई चमत्कारिक अनुभव, कोई अनमोल दोस्त या कोई बहुत  प्यारे अपनापन लिए किसी परिवार से हाथ धो बैठते है। इसलिए दोस्तो जो पल है वह यहीं क्षण है। जो दिन है वह आज ही है।

किसी शायर ने लिखा है- 

जिंदगी क्यों इतनी अजीज,

मौत से क्यूं इतनी दहशत।

मौत आने को है।

जान जाने को है।

तो मित्रों जिसका आना अपरिहार्य है। अटल है। उससे डरने के स्थान पर उसका स्वागत करने को तैयार हो जाइये। कठोपनिषद की नचिकेता की कथा तो आपने सुनी होगी। जिसके अनुसार आप अपना घर कितनी ही दूर किसी कठिन से स्थान पर बना लो, पर ऐसा कभी नहीं होगा कि मौत आपको ढूंढने निकले और आप उसे न मिलो। तो जो आयेगी ही उसके स्वागत की तैयारी  करो। जो भी नचिकेता की तरह स्वयं यम को खोजने निकलेगा। वह अमृत पा लेगा, और मृत्यु के पार निकल जाएगा।

(सेवानिवृत्त सचिव, छत्तीसगढ़ राज्य वित्त आयोग)