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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - किसान आंदोलन: क्या खोया, क्या पाया

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - किसान आंदोलन: क्या खोया, क्या पाया

- सुभाष मिश्र

अंतत: किसानों की जीत के साथ एक साल से अधिक समय से चल रहा आंदोलन समाप्त हो गया। आजादी के बाद सबसे लंबे समय तक शांतिपूर्वक चला आंदोलन तीन कृषि बिलों की वापसी और आंदोलनकरी किसानों के विरूद्घ दर्ज प्रकरणों की वापसी के आश्वासन के बाद समाप्त हुआ।

कोरोना जैसी महामारी, आंधी-तूफान, बरसात, गर्मी को झेलते हुए देश के  किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे रहे। किसानों के इस आंदोलन को किसानों के साझा संघर्ष की जीत के रूप में देखा जा रहा है। यह आंदोलन आने वाले समय में सामूहिक रूप से प्रतिरोध करने वालों, गांधीजी के मार्ग पर शांतिपूर्वक आंदोलन करने वालों को हौसला देगा। यह लोकतंत्र की जीत है, जिसके चलते हठधर्मी सरकार को अंतत: वोट के लिए ही सही कृषि बिलों को वापस लेने के लिए बाध्य होना पड़ा। मोदी सरकार कृषि बिलों को लेकर लागू कराने को लेकर जिस तरह हठधर्मितापूर्ण रवैया अपनाये हुए थी, उसकी कृषि बिलों की वापसी के निर्णय से करारी हार हुई है। किसान एमएसपी पर कानूनी गांरटी चाहते हैं, जो उन्हें अभी नहीं मिली है।

सरकार और किसान संगठनों के बीच जब संवादहीनता की स्थिति बनी हुई थी और प्रधानमंत्री किसानों से सीधी बात नहीं कर रहे थे, उन्होंने देश को चौंकाते हुए गुरुनानक जयंती के अवसर पर टीवी पर आकर ऐलान कर दिया कि उनकी सरकार तीन नए कृषि कानून वापस ले रही है।
तीन कृषि कानूनों की वापसी के अलावा एमएसपी पर कानून, किसानों की दूसरी सबसे प्रमुख मांग थी जिस पर सरकार ने कमेटी का गठन कर दिया। इसमें संयुक्त किसान मोर्चा के नेता भी शामिल हैं। ये कमेटी तय करेगी कि एमएसपी किसानों को किस तरह से दी जाये, क्योंकि किसानों की शिकायत रहती है कि उन्हें एमएसपी मिल ही नहीं पाती। पराली जलाने को लेकर सख्ती पर भी किसानों को राहत मिली और आपराधिक मुकदमों से छुटकारा मिल गया।

किसान आंदोलन को उतार-चढ़ाव, आरोप-प्रत्यारोप और सरकार की तमाम दमनकारी राजनीति के बावजूद जनता का भरपूर समर्थन मिला। आंदोलन में बैठे किसानों के लिए यूपी और उत्तराखंड से लोग लगातार खाने का सामान भेजते रहे। इतना ही नहीं इस आंदोलन में बच्चों और महिलाओं का भी खूब समर्थन मिला।
किसान आंदोलन को विदेशी हस्तियों का भी साथ मिला। पॉप स्टार रिहाना से लेकर ग्रेटा थनबर्ग तक ने किसान आंदोलन को समर्थन दिया और इसके अलावा विदेशों में रहने वाले भारतीयों से भी किसानों को समर्थन मिला। इसके अलावा ब्रिटेन में लेबर पार्टी, लिबरल डेमोक्रेट और स्कॉटिश नेशनल पार्टी के सांसदों ने किसानों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और कंजऱवेटिव विपक्ष के नेता एरिन ओ टूले ने भी इन विरोध प्रदर्शन पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर चिंता जताई थी। किसान आंदोलन ने एक ऐसी मिसाल पेश की है जो वर्षों तक दी जाएगी। एक साल से ज्यादा चला ये आंदोलन बड़ी संख्या में और कई जगह होने के बावजूद नियमों से बंधा रहा। 26 जनवरी की घटना को छोड़ दिया जाये तो ये आंदोलन शांत रहा। हालांकि कई वजहों से करीब 700 किसान इस दौरान मौत के मुंह में समा गए।

सरकार द्वारा इस संबंध में किये गये नए प्रस्ताव के अनुसार: एमएसपी कमेटी में केंद्र सरकार और संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि होंगे ये कमेटी 3 महीने के भीतर रिपोर्ट देगी। ये कमेटी किसानों को एमएसपी किस तरह मिले, यह सुनिश्चित करेगी। किसानों पर दर्ज सभी केस तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाएंगे। यूपी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा सरकार ने इसके लिए सहमति दे दी है। केंद्र सरकार, रेलवे और अन्य केंद्रशासित प्रदेशों की तरफ से दर्ज केस भी तत्काल वापस लिए जाएंगे। हरियाणा और उत्तर प्रदेश पंजाब की तरह किसानों को मुआवजा देंगे। बिजली बिल पर किसानों पर संयुक्त किसान मोर्चा से चर्चा होगी, उससे पहले इसे संसद में पेश नहीं किया जाएगा। पराली के मुद्दे पर केंद्र सरकार के कानून की धारा 15 के प्रावधान से किसान मुक्त होंगे।
शांतिपूर्ण किसान आंदोलन में जब-जब हिंसा की वारदातें हुई है तब-तब सत्ता पक्ष या शरारती तत्वों का हाथ सामने आया है। उत्तरप्रदेश लखीमपुर खीरी की ताजा घटना जिसमें 8 लोगों की हत्या हुई और बहुत से लोग घायल हुए हैं उसमें भी केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के बेटे की संलिप्तता सामने आई है। किसान आंदोलन को भटकाने में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा और हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर जैसे के बयान से आग में घी डालने का काम करते हैं।
कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को यह कहना पड़ा की हमारी ही तपस्या में शायद कोई कमी रह गई। मैं किसानों से क्षमा माँगता हूं कि मैं किसानों को इतनी पवित्र बात नहीं समझा पाया।

हालांकि बहुत सारे किसान संगठन आंदोलन को समाप्त बताने की बजाय स्थगित बता रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि किसानों पर जबरिया थोपे गए कृषि कानूनों के बदले सुधार के लिए अच्छी नियत से कानून लाया जाना चाहिए।  किसानों ने मोदी जैसे शासक से अक्सर रेडियो के जरिए अपने मन की बात कही है, अपने मन की मनवाली। किसान आंदोलन 378 दिन बाद इतिहास में खुद को दर्ज कराकर आखिरकार समाप्त हो गया और प्रधानमंत्री मोदी को टीवी पर आकर माफी मांगनी पड़ी।