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साहित्य में अतिशय सामाजिकता के आग्रह ने निजता को देशनिकाला-सा दे दिया है - अशोक वाजपेयी

साहित्य में अतिशय सामाजिकता के आग्रह ने निजता को देशनिकाला-सा दे दिया है - अशोक वाजपेयी


पिछली सदी के अस्सी के दशक में ‘पूर्वग्रह’ पत्रिका के इर्द-गिर्द कुछ ऐसे अधिकांशतः युवा लेखकों की यारी-बिरादरी बनी और विकसित हुई जिसके सदस्यों ने चालू वैचारिकी से अलग राह खोजने का जोखिम उठाया. उन्हें लगा कि साहित्य में अतिशय सामाजिकता के आग्रह ने निजता को देशनिकाला-सा दे दिया है. साहित्य में सामाजिकता अक्सर निजता से वंचित हो जाती है जबकि निज व्यक्त-विन्यस्त होकर अपने आप सामाजिक हो जाता है. उन्होंने इसरार करना शुरू किया कि साहित्य अन्यत्र से आये विचारों और विचारधाराओं का उपनिवेश नहीं होता बल्कि उसकी स्वतन्त्र सर्जनात्मक और वैचारिक स्वायत्तता होती है. उनकी धारणा थी कि भाषा निरा माध्यम साहित्य में नहीं होती बल्कि वह अनुभव का अंग होती है. भाषा में रचने का अर्थ उसमें अन्तर्भूत और अन्तःसलिल अन्तर्ध्वनियों और स्मृतियों को सजीव करना है. उनमें इस सचाई का सहज स्वीकार था कि जीवन, अस्तित्व, समाज, समय, विचार आदि में बहुलता अनिवार्यतः होती है. साहित्य इसका सत्यापन, उत्सव और प्रश्नांकन तो हो सकता है पर इस जीवन्त और समृद्ध बहुलता को दबा-छिपा नहीं सकता. उनका विश्वास था कि यथार्थ को समझने-व्यक्त करने-बदलने-प्रश्नांकित करने की अनेक समान रूप से वैध और मूल्यवान् विधियां होती हैं. उन्होंने किसी एक विधि के वर्चस्व या उसके अधिक सामाजिक या नैतिक होने के पूर्वग्रह का खण्डन किया. साहित्य के अलावा इन लेखकों को उसके पड़ोस में जीवन्त और सक्रिय कलाओं पर ध्यान देना ज़रूरी लगा. उन्होंने बेचैनी से इसका इज़हार किया कि साहित्य एक सभ्यतागत उपक्रम है और उसमें सभ्यता की अपनी लय, अपनी बहुलता और सूक्ष्मता में, विन्यस्त हो सकना चाहिये. सभ्यता की जातीय स्मृतियां उसमें संग्रहीत और पुनर्नवा होती हैं.


यह एक छोटी सी बिरादरी थी जिसमें शामिल लोगों की अलग-अलग रूचियां और पसन्द थीं. उनमें से प्रायः हरेक ने सर्जना की ओर आलोचना भी. बाद में, जब ऐसा अवसर आया तो उन्होंने हर तरह की कट्टरता, भेदभाव, साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, जातिवाद, और अन्य अनेक अतिचारों का नागरिक और बौद्धिक विरोध और प्रत्याख्यान किया. इस बिरादरी ने यह भी माना कि भारतीय चिन्तन और परम्परा में ऐसे अनेक आशय, धारणाएं और प्रत्यय हैं जिनका हम आज अपने साहित्य, सर्जनात्मकता और वैचारिक ऊहापोह आदि को समझने-समझाने के लिए प्रयोग कर सकते हैं. इस बिरादरी को, प्रायः बिना पढ़े, कलावादी, समाज-निरपेक्ष स्वायत्ततावादी, भोपाल स्कूल आदि क़रार देकर लांछित किया जाता रहा है.


सेतु प्रकाशन से इस बिरादरी के चार लेखकों की संचयिताएं ‘प्रतिदर्श’ (वागीश शुक्ल), ‘कांपती सतह पर’ (मदन सोनी), ‘यह दिन सब पर उगा है’ (ध्रुव शुक्ल) और ‘दस्तक’ (उदयन वाजपेयी) प्रकाशित हुई हैं. उम्मीद करना चाहिये कि इस विपुल-विविध सामग्री से कई निराधार पूर्वग्रह झर जायेंगे और इन चार यारों के कृतित्व का वस्तुनिष्ठ आकलन और आस्वादन संभव हो सकेगा.

रज़ा-प्रसंग

इस 23 जुलाई 2021 को सैयद हैदर रज़ा के देहावसान को पांच वर्ष हो जायेंगे. अपने जीवन के अन्तिम चरण में रज़ा लगभग साढ़े पांच वर्ष ही दिल्ली में रहे. यह वर्ष उनकी जन्मशती का है लेकिन कोरोना प्रकोप और व्याप्ति ने उस सिलसिले में प्रस्तावित बहुत सारी गतिविधियों को विलम्बित या स्थगित कर दिया है. इसमें पेरिस के पोम्पिदू सैण्टर में होने वाली एक बड़ी पुनरावलोकी प्रदर्शनी शामिल है जिसे पिछले 9 जून को शुरू होना था पर अब जिसका स्थगित शुभारम्भ रज़ा के जन्मदिन 22 फ़रवरी 2023 को होगा जब वे 101 वर्ष के हो गये होते. उनकी स्वलिखित रचनाओं के हिन्दी अनुवाद की तीन पुस्तकें और उनकी जीवनी के हिन्दी अनुवाद जल्दी ही प्रकाशित होने जा रहे हैं. बच्चों को रज़ा के चित्र समझाने की एक पुस्तक, उदयन वाजपेयी लिखित, इस बीच प्रकाशित हो गयी है. उसकी प्रतियां निश्शुल्क मण्डला में बच्‍चों के बीच बांटी जा चुकी हैं.


कुछ योजनाओं पर काम चल रहा है. पहली है रज़ा के प्रिय समकालीनों और मित्रों को उपयुक्त सम्माम देने की श्रृंखला. इसके अन्तर्गत कृष्ण खन्ना के जन्मदिन पर 5 जुलाई को एक आयोजन ऑनलाइन हो चुका है. हुसेन, अकबर पदमसी, तैयब मेहता, गायतोण्डे, रामकुमार और बाल छाबड़ा पर ऐसे ही ऑनलाइन आयोजन अगले छह महीनों में करने की योजना है. सूज़ा पर कई व्याख्यानों की एक श्रृंखला और उनको प्रणति देते हुए एक प्रदर्शनी का आयोजन म्यूज़ियम आव् गोवा हमारे सहयोग से कर रहा है. रज़ा शती व्याख्यानमाला के अन्तर्गत सुधीर चन्द्र और गीति सेन के व्याख्यान हो चुके हैं और उस क्रम में रूबीना करोड़े, यशोधरा डालमिया, रणजीत होस्कोटे, होमी भामा, एनी मोन्तो, मिशेल एम्बेयर आदि के व्याख्यान होने जा रहे हैं. रज़ा अभिलेखागार से एक और प्रदर्शनी इसी वर्ष आयोजित होगी और रज़ा पुरस्कार से सम्मानित कलाकारों की एक प्रदर्शनी भी.


युवा प्रतिभा और क्षमता में रज़ा की गहरी रूचि के अनुरूप 2022 में भारत के सौ युवा कलाकारों की एक बृहत् प्रदर्शनी पर काम शुरू हुआ है जो दिल्ली में कई कला-वीथिकाओं में एक साथ आयोजित होगी. चूंकि कोरोना महामारी की तीसरी लहर की प्रबल सम्भावना है, दो बड़े आयोजन कब हो पायेंगे यह कह पाना अभी कठिन है. पहला है रज़ा के चित्रों से प्रेरित शास्त्रीय नृत्यकारों द्वारा नयी कोरियोग्राफ़ी का एक समारोह और दूसरा, विश्व कविता समारोह. संयोगवश, यह भी कि इस वर्ष रज़ा फ़ाउण्डेशन की स्थापना को बीस वर्ष पूरे हो गये हैं और उसकी विशेष और व्यापक सक्रियता के दस वर्ष. जितना हो सकता उतना किया गया है और इस सक्रियता और उपस्थिति को अधिक सघन और सार्थक करना का मंसूबा बना हुआ है. 


आस्था और आचरण


भारत में पिछले कुछ बरसों से आंकड़ों में हेरा-फेरी करके उन्हें किसी झूठ को छुपाने या उसे सच में तब्दील करने के लिए इतने धड़ल्ले से इस्तेमाल किया गया है कि सारे आंकड़े, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर, व्यापक रूप से, अविश्वसनीय और अप्रामाणिक माने जाने लगे हैं. इसलिए अमरीका के एक प्रतिष्ठित संस्थान पीईडब्ल्यू ने जब भारत में धार्मिक विश्वासों और सामाजिक आचरण का एक सर्वेक्षण प्रकाशित किया तो उसके आंकड़ों और निष्कर्षों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ. लेकिन लगभग 30 हज़ार भारतीय व्यक्तियों को लेकर किये गये इस सर्वेक्षण की पद्धति और प्रक्रियाओं में इतनी पारदर्शिता है कि विश्वास करना पड़ता है.


पीईडब्ल्यू सर्वेक्षण का एक निष्कर्ष यह है कि 91 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि वे अपना धर्म पालने के लिए स्वतंत्र हैं और 84 प्रतिशत यह मानते हैं कि सभी धर्मों का आदर करना सच्चा भारतीय होने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. 80 प्रतिशत यह मानते हैं कि दूसरे धर्मों का आदर करना उनकी धार्मिक अस्मिता का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है. पर अधिकांश भारतीय, अलगाव के साथ, साथ रहने के पक्षधर हैं. यह एक अन्तर्विरोध है पर, जैसा कि एक बातचीत में प्रताप भानु मेहता ने कहा, सामान्य जीवन और नागरिकों में अन्तर्विरोधों के साथ जी सकने की क्षमता होती है, बुद्धिजीवियों में नहीं. यह एक और अन्तर्विरोध है कि इस सर्वेक्षण के अनुसार हिन्दुओं और मुसलमानों का एक बड़ा प्रतिशत, क्रमशः 60 और 70 प्रतिशतों से अधिक, अन्तधार्मिक विवाहों को रोकने को उच्च प्राथमिकता देते हैं. अधिकांश भारतीय यह भी मानते हैं कि लोगों को अपनी जाति से बाहर विवाह करने से रोकना चाहिये. ‘भारतीय लोग भले श्रेष्ठ न हों पर भारतीय संस्कृति सबसे बेहतर है’ की धारणा को मुसलमान भारतीयों का बहुमत सही मानता है.


खान-पान को लेकर ख़ासी कट्टरता है. 70 प्रतिशत से अधिक हिन्दू मानते हैं कि गोमांस खाने वाला हिन्दू नहीं हो सकता, 60 प्रतिशत से अधिक का मत है कि ईद और 50 से अधिक की राय में क्रिसमस मनानेवाला हिन्दू नहीं हो सकता. लगभग 50 प्रतिशत हिन्दू सोचते हैं कि ईश्वर में आस्था न रखने वाला हिन्दू नहीं हो सकता. 75 प्रतिशत से अधिक मुसलमान भारतीय मानते हैं कि सूअर का गोश्त खाने वाला, 65 प्रतिशत से अधिक नमाज न पढ़ने वाला, 60 प्रतिशत ईश्वर में आस्था न रखने वाला, 55 प्रतिशत से अधिक क्रिसमस और दीवाली मनाने वाला मुसलमान नहीं हो सकता. सभी धार्मिक सम्प्रदायों के लोगों का बहुत छोटा प्रतिशत यह मानता है कि भारत में धार्मिक भेदभाव की अधिकता है.


इस सर्वेक्षण को जानने के बाद, साहित्य और कलाओं को लेकर, कुछ प्रश्न उठते हैं. साहित्य में, हिन्दी साहित्य में, धर्मनिरपेक्षता की व्याप्ति के बावजूद, अल्पसंख्यक धर्मों की रचना और वृत्तान्त के स्तरों पर इतनी क्षीण उपस्थिति क्यों है? भारतीय समाज इतना बड़ा धार्मिक समाज है पर धर्मों की साहित्य में, विचार और रचना दोनों स्तरों पर, इतनी क्षीण उपस्थिति क्यों है? क्या यह सामाजिक यथार्थ के बड़े और निर्णायक हिस्से की अवज्ञा नहीं है? आस्था और अलगाव की विडम्बना का कोई साक्ष्य या अन्वेषण हमारे साहित्य में है? नहीं है तो क्यों?