अमित गौतम : लॉकडाउन का दंश झेल रहा मध्यमवर्ग

अमित गौतम : लॉकडाउन का दंश झेल रहा मध्यमवर्ग

राजनांदगांव, 16 अप्रैल | हमारे देश में मध्यमवर्गीय परिवारों की बहुत बड़ी संख्या हैं और मैं भी उन्हीं में से एक हूँ। सर्वविदित है कि आज वैश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण काल से समूचा विश्व गुजर रहा है । हमारे भारत देश में भी विगत 22 दिनों से लगातार लॉकडाउन चल रहा है। प्रधानमंत्री जी के अनुसार 3 मई तक भारत में लॉकडाउन बना रहेगा ताकि कोरोना से हमारे देश के नागरिकों को कम से कम नुकसान पहुंचे । प्रधानसेवक जी का निर्णय बिल्कुल सही है.

और मैं उनके निर्णय का पूर्ण समर्थन करता हूँ इस लॉकडाउन में सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) का पालन होने की वजह से ही आज भारत को अत्यधिक नुकसान कोरोना नहीं पहुंचा सका है । 1 अरब 31 करोड़ की जनसंख्या होने के बाद भी केवल कुछ हजार ही इस कोरोना वायरस से संक्रमित हुए हैं। इसका कारण है कि हम सभी ने अपने घरों में सुरक्षित रहकर लॉकडॉउन का पालन किया है ।अब मैं देश के मध्यमवर्गीय परिवारों की बात करना चाहता हूँ.

कि विगत 22 दिनों से लोकडॉउन की स्थिति बनी हुई है जिसके चलते मध्यमवर्गीय परिवार जो किराए के मकान में है या जिन्होंने बैंक से कर्ज लेकर अपना छोटा-मोटा आशियाना बना रखा है उनका कर्ज किस तरह अदा होगा या कैसे वह किराया अदा कर सकेंगे? घर में रहने की वजह से अतिरिक्त आय का कोई जरिया नहीं बन पा रहा है और जो सीमित आय है उसमें आगे किस तरह गुजारा हो पाएगा? देश के प्रधानमंत्री सहित किसी भी नेता ने अब तक मध्यमवर्गीय लोगों की चिंता नहीं की है।

वही एक ओर गरीबों को 3 महीने का राशन, मुफ़्त गैस की टंकी, उनके खातों में पांच पांच सौ रुपए सहित सारी सुविधाएं मुहैया करा दी गई। समाजसेवियों ने भी जमकर फोटो खींचा-खींचाकर गरीबों को थैलियों में भर-भर कर राशन बांटा। पूंजीपतियों की बात करें तो दो-चार महीने लॉकडाउन से कोई खास फर्क उन्हें नहीं पड़ जाएगा लेकिन हाँ फर्क पड़ेगा तो मध्यमवर्गीय परिवारों को जो अपने जमीर के साथ खुद्दारी से जीता है.

ना वह गरीबों को बंटने वाले खाने में लाइन लगाकर खाना ले सकता और ना वह किसी के सामने हाथ फैला सकता बस केवल वोट देने, आधार कार्ड बनवाने, पैन कार्ड बनवाने और अगर ठीक-ठाक इनकम होने लगे तो टैक्स देने के लिए ही मध्यमवर्गीय परिवार हिंदुस्तान का सभ्य नागरिक है इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं......रोजमर्रा की जरूरतों के सामान में लगने वाला पैसा, पर्सनल लोन से लेकर कई तरह की दिक्कतें कैसे निपटारा होगा बेहद चिंतनीय है।

इस लॉकडॉउन में कोई काम न कर पाने वाले को भुगतान आखिर कौन करेगा? बैंक के द्वारा या मकान मालिक द्वारा बाद में लेने की बात कही गई है लेकिन आखिरकार आपको बाद में तो देना ही होगा अभी हुए काम के नुकसान की भरपाई किस तरह होगी ? सर पर चिंता तनाव और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है, रातों की नींद हराम है।आने वाले 3 मई के बाद भी कोई भरोसा नहीं की लॉकडाउन खुले और कोरोना 4 मई की सुबह पहली फ्लाइट पकड़कर वापस चीन चला जाएगा । बेहद असमंजस की स्थिति है की मध्यमवर्गीय परिवार बच्चों को कैसे पढ़ाएगा? शादी योग्य बच्चों की शादी कैसे हो पाएगी? इस तरह घर बैठे-बैठे कब तक राशन सब्जी, दवाइयों का खर्चा कर सकेंगे? सरकार को इस दिशा में बेहद संवेदनशील होकर सोचने की जरूरत है।

देश मे गरीबों को चहुँ ओर से सहानुभूति और व्यवस्था मिल गई हजारों टन अनाज बंट गया सरकारी खजाने से करोड़ो रूपये दे दिए गए सही माने तो उन्होंने कोरोना से जंग जीत लिया। लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि मध्यमवर्गीय परिवार जंग न जीत पाये और आर्थिक समस्या के चलते अपनी खुद्दारी के साथ आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाए, बेहद चिंतनीय और सोचनीय विषय है यह। मेरे इस पोस्ट को पढ़कर ज्यादा से ज्यादा वायरल करें ताकि देश के भ्रष्ट अंधे और बहरे नेताओं को भी पता चले कि मध्यम वर्ग भी कोई चीज है ।इस पोस्ट द्वारा मैं किसी की भावनाओं को आहत नही करना चाहता पर पत्रकार होने के नाते जो स्थिति समाज में देख और समझ पा रहा हूँ वही यथार्थ लिख रहा हूँ।