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लोक की पुनस्र्थापना और हबीब तनवीर

लोक की पुनस्र्थापना और हबीब तनवीर


डॉ. योगेन्द्र चौबे



सचमुच मैं अंधेरे में जी रहा हूं

सीधी सादी बात का मतलब बेवकूफी है

और शापट माथा दर्शाता है, उदासीनता।

वह, जो हंस रहा है,

सिर्फ इसलिये कि भयानक खबरें

अभी इस तर पहुंची नहीं है।


यह बेस्ट की कविता है। समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता व्यापक है। शायद हबीब तनवीर भी इसी संवेदनशीलता की तलाश में भटक रहे थे। लेकिन हबीब के अंदर जो संवेदनशीलता थी, वह अभिजात्य वर्ग की भाषा में मिलना मुश्किल था। अपने एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने इस बात का जिक्र किया था कि शोषण और उत्पीडऩ की पीड़ा मुझे मथती रही है। यह पीड़ा तो उसी शोषित वर्ग की थी, जिससे निकलकर उनके अभिनेता आते हैं और शोषण की यही पीड़ा उनके नाटकों में दिखाई भी पड़ती है।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद अचानक छत्तीसगढिय़ा स्वाभिमान जग उठा, छत्तीसगढिय़ा सबसे बढिय़ा की भावना के साथ। लेकिन हबीब ने तो इसकी शुरुआत बहुत पहले कर दी थी। अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा होने के बावजूद अगर किसी ने पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ को पहचान दी, छत्तीसगढ़ी अस्मिता की बात की, तो वे हबीब तनवीर ही थे। 

नगर और गांव के समाज व जीवन में जो गहरा अंतर पाश्चात्य देशों में दिखाई पड़ता है, वह अंतर हमारे देश में दिखाई नहीं पड़ता है। प्रधानत: भारत गांवों का देश है। इसलिये नगरीय जीवन के साथ-साथ जनपदीय जीवन का महत्व हमारे यही बराबर रहा है। भारतीय परंपरा में हारे ऋषि-मुनि एवं गुरुजन नगर से दूर किसी एकांत ग्राम अथवा वन में बैठकर चिंतन मनन किया करते थे, तथा जीवन का सुखमय संदेश देते थे। अर्थात यह किसी उनकी विचारधारा का भावनात्मक प्रभाव सर्वप्रथम ग्राम्य जीवन पर पड़ता था। तत्पश्चात ही वह विचार अथवा दर्शन नगर के बुद्धिजीवियों की मंडली में आकर टीका-टिप्पणी पाकर परिष्कृत एवं प्रबल होता था। हम देखते हंै कि हबीब के समूचे रंगकर्म में इसी अवधारणा का विस्तार है। हमारा लोक पाश्चात्य देशों का लोक नहीं है। बल्कि देश की समूची संस्कृति एवं सभ्यता ही हमारी लोक सभ्यता है। हबीब तनवीर ने अपनी पूरी रंगयात्रा में लोक की अवधारणा को पुनस्थापित किया। न केवल पुनस्र्थापित किया बल्कि तथाकथित आधुनिक समझे जाने वाले नाटक लिये मजबूर भी किया। नाट्य निर्देशकों के लिए मजबूर भी किया। 

हबीब तनवीर इसी लोक की ताकत को पहचानते थे। वे जानते थे कि लोकचित्त ही नाटक की वास्तविक प्रेरणाभूमि होती है। स्वयं आचार्य भरत ने नाट्यशास्त्र में इस बात का उल्लेख किया है - नाटक वेद से चाहे आध्यात्म से उत्पन्न हो, वह तभी सिद्ध होता है, जब लोक सिद्ध हो क्योंकि नाटक लोक स्वभाव से होता है। इस तरह आचार्य भरत ने इसी रंगचितन की प्रक्रिया से गुजरते हुये अपनी अलग शैली विकसित की।

बोली की ताकत को तुलसीदास, कबीर और मीरा ने अगर साहित्य में पहचाना तो हम कह सकते हैं कि रंगमंच में हबीब तनवीर ने अपने नाटकों में केवल संवाद के स्तर पर ही छत्तीसगढ़ी का प्रयोग नहीं किया, बल्कि बोली के साथ-साथ जो जातीय स्मृतियाँ हैं, जो उनकी समूची लोक संपदा है, जो उनकी मुद्रायें हैं, गतियाँ हैं, लय है, समाज के जो बिम्ब हैं, इन सबों को माला की तरह पिरोकर मंचित किया।

प्रयोगधर्मिता की यही जि़द बोली के स्तर पर स्थानीय होते हुए भी स्थानीयता से कहीं आगे बढ़ जाती है। उनके नाटकों को पूरी दुनिया में प्रसिद्धि मिली। अधिकांश को छत्तीसगढ़ी समझ में नहीं आती, लेकिन इससे उनके नाटकों की प्रसिद्धि में कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

हबीब तनवीर की प्रयोगधर्मिता की आधार भूमि छत्तीसगढ़ है। लोक नाट्य नाचा है। लेकिन केवल इस आधार पर ही हम उसे केवल और केवल लोक नाट्य की संज्ञा नहीं दे सकते। जैसा कि मैंने पूर्व में भी उल्लेख किया है कि हबीब लोक की ताकत को पहचानते थे। वे जानते थे कि छत्तीसगढ़ का लोक नाट्य नाचा मात्र मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक मूल्यों, सामाजिक चेतना को जागृत करने में भी अत्यधिक समर्थ है।

नाचा का एक अभिनेता कई पात्रों को अभिनीत करता है। नाचा के कलाकारों में अभिनय के चारों रूप आंगिक, वाचिक आहार्य एवं सात्विक अभिनय का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। संवाद-सम्प्रेषण की शैली, अंग संचालन, नृत्य और गीत में हबीब साहब के अभिनेताओं को दक्षता हासिल है। और पूरी दक्षता के साथ ये कलाकार दर्शकों तक सीधे अपनी बात कहने में सक्षम होते हैं।

एक देखा हुआ यथार्थ होता है और दूसरा भोगा हुआ यथार्थ। वह तोड़ती पत्थर देखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर हम सब जानते हैं, यह निराला की प्रसिद्द कविता की पंक्ति है जिसमें एक यथार्थ को देखने की बात कही गयी है। यह देखा यथार्थ हो सकता है, लेकिन जब लोक की रचना होती है, तो वह भोगे हुये यथार्थ की पीड़ा से गुजऱकर निकलती है, जैसे -नाचा का एक गीत है, जो परी गाती है -

जरें जिनगानी मोरो गा..

जरे जिनगानी मोरो गा ।।

कमाई मा जांगर टुटगे

जरे जिनगानी मोरो ।।

सावन कस चुहथ रहिथे

पानी कस पसीना मोरो गा ।।

कमाई मा जांगर टुटगे

जरे जिनगानी मोरो ।।

यह उस लोक कलाकार की वेदना है, जो दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद शाम को मंच पर नाचा का अभिनेता है। यह वेदना है उस लोक की, जो अब तक निरंतर जारी है। मालूम नहीं, यह रचना कब और किसने लिखी? लेकिन जब भी कोई परी इस गीत को गाती है, वह संवेदना के चरम बिन्दु को छूती है।

छत्तीसगढ़ के नाचा के ये कलाकार दिन-प्रतिदिन की छोटी-छोटी आवश्यकताओं, घटनाओं को, छोटी-छोटी मनोरंजक कथाओं में बदल देते हैं। लोकमानस जिस बात को समूह में नहीं स्वीकार कर पाता, यह कलाकार बड़ी सहजता से उसका मजाक उड़ाते हुये दिखाई पड़ते हैं। यह उनके सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के बेहद करीब होता है, तभी तो उसे लोक स्वीकृति प्राप्त होती है। हबीब तनवीर नाचा की इसी विशेषता से प्रभावित हुये। नाचा को उसके गीत, संगीत, नृत्य, अभिनेताओं की गति, लय के आधार पर तो हम पारंपरिक कह सकते हैं लेकिन कथ्य के आधार पर वह पूरी तरह आधुनिक और समसामयिक है। राजनीतिक स्वतंत्रता के पश्चात जब भारत में हर क्षेत्र में भारतीय अस्मिता और अपने मौलिक स्वरुप की पहचान का प्रश्न प्रारंभ हुआ, तो रंगकर्म कैसे बच सकता था? इसके लिये देशव्यापी पड़ताल शुरू हुई। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना हो चुकी थी, लेकिन प्रशिक्षण के नाम पर हमारा अपना कुछ नहीं था (अभी भी नहीं है)। बल्कि पश्चिम के यथार्थ को हमारे सामने मॉडल के तौर पर परोसा जा रहा था अंतर था तो केवल भाषा का ।

ऐसे समय में हबीब ने भारतीय रंगमंच में तथाकथित पश्चिमी यथार्थवाद की नकल में हो रहे यथार्थवादी आग्रहों से हमेशा अपने आप को मुक्त रखा। अस्वीकार के इसी साहस ने बाद में हबीब को भारतीय रंग परम्परा में स्थापित किया और की रंगयात्रा को लोक स्वीकृति प्राप्त हुई।

बोली को शास्त्र में और परंपरा को आधुनिकता में रूपांतरित करने का साहस हबीब ने किया। शास्त्र परंपरा और आधुनिकता का जो अदभुत सामंजस्य हबीब के नाटकों में दिखलाई पड़ता है, वह किसी और के नाटकों में दिखाई नहीं पड़ता।

अपने नाटकों में परंपरा और प्रयोग के सार्थक संबंध एवं उनके आधुनिक उपयोग के सन्दर्भ में व्यावहारिक और शास्त्रीय दोनों स्तरों पर हबीब साहब ने पड़ताल प्रारंभ की।

लोकधर्मी रंगमच के शिल्प, भाषा और तकनीक का प्रयोग तो हबीब साहब ने नए ढंग से किया ही, साथ ही ठेठ भारतीय लोकपरम्परा, लोकाचार तथा विषय के स्तर पर लोक कथाओं का प्रयोग भी अपने नाटकों में किया।

शास्त्रीय नाटकों को जब हबीब साहब के नाचा के कलाकार प्रस्तुत करते थे, तो लगता था कि जैसे लोक शास्त्र को चिढ़ा रहे हों। हो भी क्यों न स्वयं भरतमुनि का यह आदेशात्मक वाक्य है कि लोक गुरुओं का गुरु है।

हबीब साहब ने आधुनिक भारतीय रंगकर्म में लोक नाट्यों की परंपरा से प्रभावित होकर उसके विकास के नए द्वार खोले, एक नयी शैली विकसित की और हमेशा लीक से हटकर नयी संभावनाओं से हमारा साक्षात्कार कराया। हबीब साहब के नाटकों की प्रस्तुति उन्हीं के नाट्यालेख की प्रक्रिया से गुजरकर ही पूरी होती थी। घंटो अपने अभिनेताओं के साथ पूर्वाभ्यास करते, चर्चा करते और फिर नाट्यलेख तैयार होता नाट्यालेख, प्रस्तुति और निर्देशन को हम उनकी रंगयात्रा में अलग-अलग करके नहीं देख सकते।

भारतीय मनीषियों ने नाट्य शास्त्र को पंचम वेद कहा है, क्योंकि यह जन शिक्षण का एक सशक्त माध्यम है। इसी परंपरा को हबीब आगे बढ़ाते हैं। लोक मानस के भीतर समाज सत्ता के प्रति उपज प्रतिरोध को 'Óनया थियेटर'Ó के अभिनेता बड़ी सहजता से प्रस्तुत करते हैं। हबीब तनवीर के नाटकों चरणदास चोर, मोर नांव दामाद गांव के नांव ससुराल, सड़क, जमादारिन, पोंगा पंडित, हिरमा की अमर कहानी या फिर जिस लाहौर नई देख्या को देख व समझ चुके हैं। जैसे नाटकों के माध्यम से हम नया थियेटर की सार्थकता उनके नाटकों में गंभीर विमर्श है। स्थानीयता का आग्रह होने के बावजूद वे सार्वदेशिक (सार्वभौमिक) हैं। 

उनकी रचनात्मकता प्रतिबद्धता का एक उदाहरण में देना चाहूँगा। उन्होंने पंडवानी पर आधारित वेणीसंहार नामक नाटक किया। इस नाटक में उन्होंने दिखाया कि दुशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और द्रोपदी ने उसी समय प्रण किया कि वह जब तक दुशासन के खून से वह सिर नहीं धोयेगी, तब तक वह बाल नहीं बाँधेगी। उसके कठोर निर्णय से मानवता थरांती है, क्या हथियारों की इस होड़ में मनुष्य इतना बौना हो गया कि वह विषम परिस्थितियों में बदले की आग को नहीं बुझा सकता? हबीब साहब ने इस नाटक के माध्यम से यह सन्देश दिया युधिष्ठिर के मुख से

धरती अन्न से परिपूर्ण हो

युद्ध धरती से समाप्त हो।

दूसरी ओर पूर्वक मारा जाता हुआ दुर्योधन धरती को ही श्राप देता है 

जा तू कभी रितुमती न हो।

तुममें कोई वनस्पति पैदा न हो।

यह श्राप आगे चलकर हिरोशिमा और नागासाकी में फलीभूत हुआ। हबीब की रंगयात्रा को देखें तो वे वेणीसंहार तक ही सीमित नहीं रहे बल्कि 'Óजहरीली हवा'Ó और अपने अंतिम नाटक राजरक्त में भी उन्होंने अपनी वही प्रतिबद्धता दोहराई। आधुनिकता का ऐसा बोध वह भी इतिहास को साथ लिये हुये कम ही दिखाई पड़ता। ऐसे संक्रमण के दौर में जब आधुनिकता के नाम पर हम आचार्य भरत को भूल चुके थे, भारतेन्दु के रंगचिन्तन को हम याद नहीं करना चाहते थे, हबीब साहब भारतीय रंगपरंपरा या देशज रंगमंच को पुनर्स्थापित करते हुये आचार्य भरत और भारतेन्दु के रंगचिन्तन को समसामयिक बनाया। वास्तव में हबीब साहब या नया थियेटर के अभिनेता भारतीय रंगपरंपरा के ध्वजवाहक है। हबीब तनवीर के निधन ने भारतीय रंगमंच में एक सवाल भी खड़ा किया है।

क्या हबीब की परंपरा का विस्तार होगा, या हबीब साहब के साथ ही उस युग का भी अवसान हो गया? क्या कोई दूसरी पीढ़ी है जो इस रंग परंपरा को अपनाना चाहती है? वैसे कोई भी परम्परा हो उसका विस्तार तो होता ही है। हबीब साहब की रंगपरंपरा का भी ठीक हबीब की तरह विस्तार भले ही न हो (यह होना भी नहीं चाहिये), किंतु उनकी परंपरा बदले हुए रूप में निश्चित तौर पर विकसित होगी, और उसका विस्तार होगा इन संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।

व्याख्याता, नाट्य विभाग

इं.क.सं.वि.वि. खैरागढ़ (छ.ग.)