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स्मरण: छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रमुख ध्वज वाहकः दाऊ दुलार सिंग 'मंद्राजी'

स्मरण: छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रमुख ध्वज वाहकः दाऊ दुलार सिंग 'मंद्राजी'

योग मिश्र

छत्तीसगढ़ी नाचा ने कला जगत को विश्वस्तरीय कलाकार भी दिए हैं । उनकी अभिनय क्षमता किसी भी सर्वश्रेष्ठ कलाकार से जरा भी कम नही आँकी जा सकती, लेकिन नाचा के न जाने कितने कलाकार उच्चकोटि की कला क्षमता रखते हुए भी व्यापक रूप में नही जाने जाते और गुमनाम रह जाते हैं या अपने क्षेत्र तक ही जाने जाते हैं । लोकप्रियता और कीर्ति के नागर प्रतिमानों से वे परखे नही जा सकते । उनकी गुमनाम रचनाशीलता इतिहास के अँधेरे में गुम जाने के लिए अभिशप्त है । सदियों से ऐसे अनगिनत कलाकार हमारे समाज में जन्म लेते रहे हैं पर हम उन्हें नही जानते जिन्होंने अपना सर्वस्व कला और संस्कृति की सेवा में होम कर दिया । हमारे संस्कृति बोध को जिन्होंने परिष्कृत किया है, हमें परम्पराएँ दी। सच कहा जाए तो हमारी परम्परा हमारे पुरखों का दान है और हमारी लोक कलाएँ और लोक परम्पराएँ ऐसे ही अज्ञात पुरखों की देन है । नाचा के अनगढ़ स्वरूप को रूप देने वाले और छत्तीसगढ़ी नाचा के खड़े-साज परम्परा के जनक स्व. मंदराजी दाऊजी की 1 अप्रेल को जयंती है । इस अवसर पर उनके गृहग्राम रवेली में उनके साथी कलाकार हर साल प्रदेश भर से जुटते हैं और अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर दाऊजी का पुण्य स्मरण करते रहे हैं । 


दाऊ स्व. दुलार सिंह 'मंद्राजी' अपने नाचा कार्यक्रम में तत्कालीन समाजिक बुराइयों को गम्मत के माध्यम से मनोरंजक तरीके से समाज के सामने उजागर करते थे । उनके गम्मत में प्रमुख हैं -

 "मेहतरीन" जो छूआछूत पर था जिसे बाद में हबीब साहब ने "पोंगा पंडित" के नाम से किया,  जिस पर काफी विवाद भी मचा था । 

"बुढ़वा विवाह" नकल जिसमें वृद्ध व्यक्ति से बालिका का विवाह रोकने का संदेश था । बाद में हबीब साहब ने "बुढ़वा बिहाव" और "देवारिन" व "छेरछेरा" नकल को मिलाकर "मोर नाम दमाद गांव के नाम ससुराल" नाटक बनाया था। छत्तीसगढ़ी नाचा ने भारतीय रंगमंच को नई दिशा दी है। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी नाचा में ब्रतोल्त ब्रेख्त का अलगाववाद का सिद्धान्त मौजूद पाया और छत्तीसगढ़ी नाचा के कलाकारों के साथ भारतीय रंगमंच को पाश्चात्य के प्रभाव से बाहर लाया और हिन्दी रंगमंच का ध्यान भारतीय लोक विधाओं की ओर आकर्षित किया। उसके बाद तो केवलम नारायण पण्णीक्कर, बी वी कारंत, रतन थियम जैसे निर्देशकों ने अपने प्रदेशों कीं लोक कलाओं को रंगमंच का आधार बनाकर विश्व को भारतीय रंगमंच से परिचित कराया।

छत्तीसगढ़ी नाचा मंडलियाँ अपने गम्मतों के माध्यम से विशेष रूप से पहचानी जाती थीं। मंद्राजी दाऊ की रवेली समाज नाचा मंडली भी अपने नये-नये गम्मतों के कारण 1928 से 1953 तक छत्तीसगढ़ में खूब नाम कमा रही थी। रवेली साज के सबसे चर्चित गम्मत रहे हैं- "ईरानी" गम्मत जिसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश होता था । "मरारिन" गम्मत जिसमें देवर-भाभी के पवित्र रिश्ते को समाज के सामने माँ-बेटे के रूप में रखा जाता था । इसके अलावा रवेली साज के साधु , पंडित, देवार, भाई बंटवारा, साहब, मौसी माँ, शराबी, छेरछेरा, महाप्रसाद, मढुवा (जोरु का गुलाम), बुढ़वा-बिहाव, सतनामी, सिका जोती आदि हास्य प्रहसन भी छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय बने रहे हैं।

दाऊजी ने १९४२ के स्वतंत्रता आन्दोलन के समर्थन में भी  कुछ राष्ट्र-भक्ति के गीतों को अपने कार्यक्रमों में शामिल किया था । उनकी नाचा पार्टी में तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आंदोलन का प्रभाव भी था । इसलिए  कई स्थानों पर इनके नाचा प्रदर्शन पर प्रतिबंध भी लगाया गया था । मँदराजी दाऊ ने खड़े-साज की नाचा परम्परा  को बैठक-साज में तब्दील कर, हारमोनियम और चिकारा को नाचा में शामिल कर नाचा के संगीत पक्ष को सबल किया और नाचा को समय-समय पर परिष्कृत कर एक नई ऊंचाई पर ला खड़ा किया था। नाचा में उनके प्रयोगों से व्यापक लोक-प्रसिध्दि प्राप्त हुई जिसका श्रेय मंद्राजी दाऊ की मेहनत लगन और जुनून और समय के साथ-साथ नाचा में बदलाव लाने की दाऊजी के नवाचार को दिया जाता है।

उनके साथी बताते थे कि उनकी पार्टी का नाचा देखने आस पास के गांव के गांव उमड़ पड़ते थे, ऐसे में चोरों की बन आती थी। 

एक बार दाऊजी को भी चोरों से सांठगांठ के संदेह में पकड़ा गया था फिर बाद में असलियत सामने आने पर छोड़ भी दिया गया था । दाऊजी के नाचा पार्टी के कार्यक्रमों की पूर्व सूचना पुलिस को देनी पड़ती थी और गांवों में पुलिस गस्त लगाई जाती थी ताकि सूने गांव का फायदा चोर न उठा सकें । नाचा के विकास पुरूष मंदराजी दाऊ ने अपनी सारी धन-संपत्ति नाचा के जुनून को भेंट कर दी । अपना सब कुछ खोकर उन्हें लोक कला कि यह सिद्धि हासिल की थी । धन ने साथ छोड़ा तो साथी संगी भी साथ छोड़ गए । उनकी रवेली पार्टी धीरे-धीरे इतिहास के गर्त में खो गई । वे मान सम्मान से वंचित होते चले गए । फिर भी अपने अंतिम दिनों तक वे असंगठित नाचा पार्टियों में संगत शिरकत करते ही रहे । आज उनके बाद अब गाँव में उनका परिवार बड़ी तंगहाली में गुजर कर रहा है । रवेली ग्राम में स्व खुमान सावजी के जीवित रहते तक मंद्राजी महोत्सव बड़े गरिमामय ढंग से समारोह पूर्वक मनाया जाता रहा मंद्राजी महोत्सव में प्रस्तुति देना छत्तीसगढ़ और आस पास के प्रदेशों के कलाकारों के लिए प्रतिष्ठा का अवसर समझा जाता था। विगत वर्षों से लाक डाऊन व अन्य कारणों से यह महोत्सव नहीं हो पाया है। मंद्राजी महोत्सव अब 1 अप्रेल को छत्तीसगढ़ सरकार के माध्यम से प्रतिवर्ष ग्राम रवेली व मुक्तांगन रायपुर में आयोजित कर छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रमुख ध्वज वाहक दाऊ दुलार सिंग मंद्राजी के प्रति कृतज्ञता प्रगट करनी चाहिए।


(लेखक, रंगकर्मी व फिल्म लेखक, निर्देशक हैं)