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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - क्या चिंतन से निकलेगा कंचन !

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - क्या चिंतन से निकलेगा कंचन !

- सुभाष मिश्र

उदयपुर में कांग्रेस का चिंतन शिविर चल रहा है लगभग आठ साल बाद कांग्रेस ने चिंतन की जरूरत महसूस की है। इस शिविर के उद्घाटन भाषण में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि इस शिविर में देश की स्थिति के साथ ही आत्मचिंतन भी करना है। इस शिविर के माध्यम से पार्टी में क्या परिवर्तन लाए जा सकते हैं और उनका देश की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है ये बड़ा मुद्दा है। 2003 में जब शिमला में कांग्रेस का चिंतन शिविर आयोजित हुआ था तब भी कांग्रेस सत्ता से दूर थी, लेकिन उस शिविर में बड़ा एजेंडा सेट किया गया। उस पर सोनिया गांधी की अगुवाई में काम हुआ और उसका परिणाम था कि कांग्रेस लगातार दस साल देश की सत्ता पर काबिज रही। तो क्या 2003 में शिमला से चला जादू 2022 में उदयपुर से भी चल सकता है इसे समझने की कोशिश करते हैं। सोनिया गांधी ने जो अहम बात अपने संबोधन में कहीं उन्होंने कहा कि हमें हमारी कमजोरियां पता है, और हम पार्टी को फिर पुरानी स्थिति में खड़े कर देंगे। सोनिया गांधी ने कहा कि हम विशाल प्रयासों से ही बदलाव ला सकते हैं, हमें निजी अपेक्षा को संगठन की जरूरतों के अधीन रखना होगा। पार्टी ने बहुत दिया है। अब कर्ज उतारने की जरूरत है। एक बार फिर से साहस का परिचय देने की जरूरत है। हर संगठन को जीवित रहने के लिए परिवर्तन लाने की जरूरत होती है। हमें सुधारों की सख्त जरुरत है। ये सबसे बुनयादी मुद्दा है।

सोनिया गांधी ने कहा कि आज देश को बांटने की कोशिश हो रही है, अल्पसंख्यकों डराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दर्दनाक ढंग से यह स्पष्ट हो चुका है कि प्रधानमंत्री मोदी और सरकार में उनके सहयोगियों की 'मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंटÓ से क्या आशय है। सोनिया ने कहा कि लोगों को लगातार डर और असुरक्षा के माहौल में रहने को बाध्य किया जा रहा है।  

इस दौरान एक सवाल ये उठता है कि आज भाजपा या मोदी सरकार को आड़े हाथ लेने से कांग्रेस को कितना लाभ होगा। अल्पसंख्यकों को लेकर कांग्रेस की चिंता जायज है, लेकिन भाजपा के बुलडोजर वाले आक्रमक पैटर्न का कांग्रेस के पास क्या जवाब है ये देखना होगा। आज जहां हर दिन देश को बांटने की कोशिश हो रही है फिर वो कश्मीर पंडित का मुद्दा हो या फिर ताजमहल, ज्ञानवापी, कुतुबमीनार को लेकर विवाद हो। ऐसे में कांग्रेस को बड़े परिवर्तन के साथ देश के लोगों के साथ खड़े होने की जरूरत है, देखना है कि वो इसमें कितना कामयाब हो पाती है।

एक ओर कट्टरता की बात हो रही है उस दौर में सभी तरह की कट्टरता का जवाब और उदारता के प्रतिक नेहरू की बात कांग्रेस क्यों नहीं कर पाती। पंडित नेहरू के 125वीं जयंती खामोशी से निकल जाती है। कांग्रेस क्यों नहीं देशभर में नेहरू के विचारों पर गोष्ठियां आयोजित कर पाती है। आज के युवाओं को क्यों नहीं इस महान स्वपनद्रष्टा के बारे में बताया जाता, जबकि सोशल मीडिया पर विरोधी सबसे ज्यादा निशाना ही नेहरू को लेकर कांग्रेस पर साधते हैं।

कांग्रेस हाल ही में नए बदलाव की ओर बढऩे के लिए प्रशांत किशोर जैसे इलेक्शन मैनेजर की मदद लेने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के गढ़ में जहां प्रवेश वर्जित था वहां प्रशांत किशोर की दस्तक बताती है कि कांग्रेस अब नया सोच रही है। प्रशांत किशोर ने कांग्रेस कुछ फार्मूले पर काम करने के जो टिप्स दिए थे उनमें पार्टी को पुराने सिद्धांतों पर लौटने की बात कही गई है। अगर गांधी परिवार से कोई अध्यक्ष बनता है तो एक गैर गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष या पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया जाए। जमीनी कार्यकर्ताओं को मजबूत करने की सलाह है। पार्टी के कम्युनिकेशन सिस्टम में बदलाव करने और स्थायी पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करने को कहा है। यूपी, बिहार, ओडिशा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, गोवा, छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों में अकेले चुनाव लडऩे पर फोकस करने की बात है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों में गठबंधन को मजबूत करने की बात है। प्रजेंटेशन में गठबंधन के साथियों के साथ सीट बंटवारे का फार्मूला भी शामिल किया गया है। पार्टी के अंदर चापलूसी की भावना को खत्म करने की जरूरत भी पीके प्रजेंटेशन में शामिल था।  
जरूरत है कि आज चिंतन चुनाव जीतने पर नहीं बल्कि देश की खुशहाली के लिए रणनीति बनाने के लिए होना चाहिए। क्योंकि देश के सबसे पुरानी पार्टी की ये बड़ी जिम्मेदारी है। इस चिंतन शिविर में कांग्रेस कई बड़े बदलाव पर विचार कर सकती है। जिस तरह सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस में ढांचागत सुधार की बहुत जरूरत है। जिन बदलावों की संभावना है उनमें प्रमुख है-
कांग्रेस एक परिवार एक टिकट फार्मूला को लागू कर सकती है। जिसे भी टिकट दिया जाए उसने कम से कम 5 साल पार्टी में काम किया हो। इसके अलावा पार्टी में लगातार किसी को 5 साल के बाद पद नहीं दिया जाए। इसके अलावा उम्र का फार्मूला भी चुनाव के मद्देनजर लाया जा सकता है। इसके अलावा चुनावी रणनीति के तहत जमीनी स्तर पर ढांचे में क्या बदलाव आ सकता है। 

कांग्रेस ने इससे पहले सोनिया गांधी की अगुवाई में 1998, 2003 और 2013 में भी बैठकें हो चुकी हैं। एक बार इन शिविरों के इतिहास पर नजर डालते हैं।
1998, में सोनिया गांधी के नेतृत्व में पहला चिंतन शिविर मध्य प्रदेश के पचमढ़ी में आयोजित किया गया है। उस दौरान भी कांग्रेस आज की तरह कई चुनौतियों का सामना कर रही थी। सत्र के दौरान गठबंधन पार्टियों को अपना गढ़ नहीं सौंपने के फैसले के साथ हुआ। इसके बाद 2003 में शिमला में पचमढ़ी शिविर के पांच सालों के बाद कांग्रेस को गठबंधन की अहमियत का एहसास हुआ। पार्टी ने प्रगतिशील सोच वाले पुरुषों और महिलाओं, संस्थानों और सियासी आंदोलन के साथ गठबंधन की राह पर जाने का फैसला किया।  

साल 2003 के शिविर ने कांग्रेस को एक दशक तक सत्ता में बने रहने में मदद की। पार्टी ने अधिकारों पर आधारित शासन मॉडल तैयार किया, जिसमें मनरेगा, खाद्य सुरक्षा, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण और आरटीई शामिल थे। इसके बाद 2013 में जयपुर में चिंतन शिविर का आयोजन हुआ इस सत्र को औपचारिक रूप से उपाध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के कद बढऩे के तौर पर देखा गया। तब शिविर में 2014 चुनाव का खाका तैयार किया गया था। लेकिन इसके बाद पार्टी को केन्द्र और कई राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है, पार्टी लोकसभा में 53 सीट पर सिमट कर रह गई है। कई राज्य उसके हाथ से छिटक गए हैं। ऐसे में इस शिविर से बड़ी उम्मीद कांग्रेस को जरूर होगी। ग्रामीण इलाकों में अपनी साख फिर से बनाने के लिए छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार का मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है।