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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - तुम निर्भय ज्यों सूर्य गगन में

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - तुम निर्भय ज्यों सूर्य गगन में

-सुभाष मिश्र

सुप्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की 13 नवंबर को जयंती है। मुक्तिबोध जी की कविता है तुम निर्भय ज्यों सूर्य गगन में। भाईदूज के बहाने हम उस निर्भया की बात कर रहे हैं जो तमाम बड़े कानूनी प्रावधानों के बावजूद अब तक निर्भय नहीं हो पाई है। देश की आधी आबादी यानि हमारी स्त्रियां अभी भी बहुत सारे मामलो में निर्भय होकर नहीं जी पा रही है। उत्तरप्रदेश चुनाव के लिए कांग्रेस नेत्री प्रियंका गाँधी ने महिलाओं के लिए 40 प्रतिशत सीटों के आरक्षण की बात कही है।

लोकसभा-राज्यसभा में अभी तक महिलाओं की 50 प्रतिशत तो दूर किसी भी तरह का आरक्षण नहीं मिल पाया है। पंचायती राज व्यवस्था और नगरीय प्रशासन व्यवस्था में जरूर उन्हें आरक्षण मिला है, किन्तु महिलाओं के लिए बने तमाम कानून और प्रावधानों के बीच हमारे अपने देश में आज तक उन्हें वह अधिकार नहीं मिला पाये हैं जिसकी वो हक़दार है। देवी पर्व, रक्षाबंधन, भाईदूज जैसे त्यौहारों के बावजूद हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अत्याचारों, शोषण और रोजमर्रा के व्यवहार में उनके साथ होने वाली ज्यादतियों को नहीं रोक पा रहे हैं। देश-दुनिया में महिलाओं के लिए घोषित मानवाधिकारों की तमाम घोषणाओं, प्रावधानों के बीच महिलाएं उस तरह से निर्भय नहीं है जैसा की सूर्य गगन में।

मानवाधिकारों को सार्वभौमिक घोषणा के अंतर्गत महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभावों की समाप्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में 1979 में लिया गया फैसला हो या न हो न्यायालयों द्वारा घोषित महिलाओं के अधिकार हो जमीनी सच्चाई मनुस्मृति में उल्लेखित इस श्लोक की तरह है-
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा: न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति।।

हम अपने रोजमर्रा के जीवनचर्या में देखते हैं कि समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 के तमाम प्रावधानों के बावजूद एक ही कार्य या समान प्रकृति के कार्यो के लिए महिला कामगारों, मजदूरों, रेजा की वह पारिश्रमिक नहीं मिलती जितनी हम पुरुषो को देते हैं। पिता की संपत्ति में पुत्री को बराबरी का अधिकार देने वाले कानून के बावजूद रक्षाबंधन, तीजा और भाईदूज के दिन आने वाली बहनें अपने भाई-भाभी से पिता की पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं मांग सकती। उनकी इस मांग को रिश्तेदार, समाज अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। बहनों को हक नहीं देने के महज में बहुत से तर्क दिये जाते हैं।

भारतीय लोक जीवन का एक महत्वपूर्ण आस्था पर्व है भाईदूज। ऐसा माना जाता है कि इसी तिथि पर बहन यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन पर आने का निमंत्रण दिया था, साथ ही अपनी बहन को अभय होने का आशीर्वाद दिया था। हमारे पौराणिक आख्यानों की अनेक कथाओं में मानव कल्याण के गहरे अर्थ छिपे हैं। उनमें अपने स्वजनों, परिजनों, इष्ट-मित्रों के अलावा पूरे समाज और देश के कल्याण की कामना है।  

किसी त्यौहार को सांकेतिक रूप से रस्म के रूप में मनाना एक बात है वहीं उस त्यौहार के अर्थ को ग्रहण कर उसके भाव या आशय को जीवन में उतरना उस त्यौहार का वास्तविक सम्मान है। आज भाईदूज के बहाने बहुत सारे बिंदुओं पर चर्चा करेंगे। रक्षाबंधन हो या भाईदूज भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है और जीवन पर्यन्त इस संकल्प की मर्यादा के निर्वाह का प्रण करता है। रक्षा का प्रश्न तब उठता है जब एक समाज स्त्री के प्रति आसुरी भाव रखता है, जहां सिर्फ उसके दैहिक शोषण के बारे में सोचा जाता है।   

जो स्त्री किसी के बहन है, वो किसी की पत्नी, बेटी, मां, बुआ या मौसी है। और इसी तरह पुरुष की भी भूमिकाएँ हैं। यदि पुरुष प्रधान एक समाज में कोई स्त्री स्वयं को असुरक्षित महसूस करती है तो वो पूरे समाज के लिए शर्मनाक स्थिति है।  
संस्कृत का एक श्लोक है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: ।।

अर्थात जहां स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवताओं का निवास होता है और जहां ऐसा नहीं है वहां हर कार्य निष्फल होता है। हमारे यहाँ स्त्री को ही शक्ति का रूप माना जाता है। उसकी पूजा की जाती है लेकिन शक्ति के उसी रूप स्त्री का शोषण होता है उस पर अत्याचार किये जाते है। हर दूसरे चौराहे पर हमारे देश में किसी न किसी देवी का मंदिर मिल जायेगा और हर चौराहे अनगिनत दु:शासन। रोज़ाना हमारे आसपास स्त्री के शील अंग की, चीर हरण की उसकी हत्या की ख़बरे आती हैं और समाज में थोड़ी से हलचल के बाद सब शांत हो जाता है। स्त्री के सम्मान को आहत करने वाले भी किसी के पिता, पति, बेटे या भाई हैं। इनकी मानसिकता को बदलने की जरुरत है और इसमें सबसे बड़ी भूमिका एक माँ एक जननी निभा सकती है। यदि कोई स्त्री घर में, दफ्तर में, या बाहर असुरक्षित है तो इसका अर्थ ये हुआ की वो समाज बीमार है, विक्षिप्त या विकृत है।

सन् 2009 में सी.बी.आई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 30 लाख लड़कियों की तस्करी की गई जिनमें से 90 प्रतिशत लड़किया देह व्यापार में धकेल दी गई। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक हर साल 50 लाख कन्या भ्रूणों का गर्भपात होता है, यानी 50 लाख बालिकाएं जन्म ही नहीं ले पाती। भ्रूण परीक्षण संबंधी अधिनियम 1994 में लागू किया गया था लेकिन इसका पालन कागज़ो तक ही सीमित है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक दुनिया में है 15 सेकंड में कोई न कोई महिला अत्याचार की शिकार होती है। 16 दिसंबर 2012 में हुए एक लड़की के साथ चलती बस में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना ने दिल्ली और देश को हिलाकर रख दिया था। लड़की के साथ इतनी बेरहमी से रेप हुआ था कि उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। निर्भया कांड के सात साल बाद कोर्ट ने दोषियों को फांसी की सजा सुनाई।

निर्भया कांड के बाद देश में ऐसा जनाक्रोश उपजा कि इसने सरकार को कानून में बड़े बदलाव करने पर मजबूर कर दिया। निर्भया कांड से पहले सेक्सुएल पेनिट्रेशन  को ही रेप माना जाता था लेकिन इस कांड के बाद देश में रेप की परिभाषा बदल गई। गलत तरीके से छेड़छाड़ और अन्य तरीके के यौन शोषण को भी रेप की धाराओं में शामिल किया गया।

पॉश कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार की यौन हिंसा और प्रताडऩा से स्त्रियों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए बनाया गया कानून है। 3 सितंबर, 2012 को यह लोकसभा से और 26 फरवरी, 2013 को राज्यसभा से पारित हुआ। 9 दिसंबर 2013 से यह कानून प्रभाव में आया। इस कानून के तरह कोई भी सरकारी या गैरसरकारी दफ्तर, जहां दस से ज्यादा कर्मचारी हैं और जहां महिलाएं काम करती हैं, वहां पॉश कमेटी बनाना अनिवार्य कर दिया गया। यह कानून विशाखा गाइडलाइंस से आगे का कदम है।

2018 में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क बताया गया था। 193 देशों में हुए इस सर्वे में महिलाओं का स्वास्थ्य, शिक्षा, उनके साथ होने वाली यौन हिंसा, हत्या और भेदभाव जैसे कुछ पैमाने थे। भारत हर पैमाने में पीछे था। वहां औरतों के स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति सबसे खराब थी। आईएनसीआरबी ने की रिपोर्ट्स से पता चला कि औरतों के साथ हिंसा और बलात्कार की घटनाएं 13 फीसदी बढ़ चुकी थीं। उसके बाद से यह ग्राफ लगातार बढ़ता ही गया है। 2016-17 में अकेले देश की राजधानी में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में 26.4 फीसदी का इजाफा हुआ था।

केवल कड़े कानून से नहीं मानसिकता बदलने से ही स्त्री के साथ बार-बार होने वाला बलात्कार रुकेगा। बहुत सारे पुरुष के लिए एक महिला उसकी रसोईया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौंदर्य बोध को संतुष्ट करने के लिए एक सुंदर ढंग से सजी गुडिय़ा है। जब तक हम अपनी जेंडर की समझ को साफ नहीं करेंगे और लैंगिक आधार पर भेदभाव कम नही करेंगे तब तक महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, घरेलू हिंसा और हमारी सोच नहीं बदलने वाली हम चाहे रक्षाबंधन का पर्व मन लें, भाईदूज पर बहनों से टीका लगवा लें किन्तु यदि हमारी सोच एक स्त्री, एक लड़की को लेकर सामंती है, पुरुषवादी है तो मौजूदा हालात में निर्भया प्रकरणों की सतत पुनरावृत्ति होती रहेगी।