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ध्रुव शुक्ल की कविताः हमें चाहिए रोटी सुकून से

ध्रुव शुक्ल की कविताः हमें चाहिए रोटी सुकून से


जैसे कोई साहूकार

करता हो कागज़ी कारोबार

मण्डी में बैठी है सरकार


नीतियाँ ले लो! कानून ले लो!

मच रहा है शोर

मानकर कानून को

आना पड़ेगा मानसून को


बैठे हैं नीतियों के ढेर पर

विक्रेता और ज़मींदार

राजनीतिक दलों के आढ़तिए

कानून का ढोल पीटते पत्रकार

चक्कर काट रहे दलाल

किसी तरह पट जाये सौदा

बिछा ऊँची बोलियों का जाल


भरती जा रही मण्डी

उबल रही है गरम चाय

बलबला रही हैं नीतियाँ

उफन-उफनकर कानून

चूल्हा बुझाते बार-बार

देसी-परदेसी व्यापारी

ले रहे चाय की चुस्कियाँ

पाले में दुबके किसान


मण्डी से दूर

ठिठुरती धरती से

उठ रही है भाप

मन में दबी हुई हूक-सी

हो रही ऊबी हुई-सी भोर


पीछा कर रही सरकार

नीतियाँ ले लो! कानून ले लो!


हमें चाहिए रोटी सुकून से

नहीं किसी कानून से