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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - विशेष पिछड़ी जनजातियों की सही देखभाल जरूरी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - विशेष पिछड़ी जनजातियों की सही देखभाल जरूरी

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में रहने वाली विशेष पिछड़ी जनजाति पंडो के बीस सदस्यों की मृत्यु हीमोग्लोबिन की कमी से होने का मामला सामने आया है। संरक्षित जनजाति जिनकी संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है, उनकी असमय मृत्यु इस बात की ओर इशारा करती है की उनकी ठीक ढंग से देखभाल नहीं हो पा रही है। सरकार ने अपनी ओर से इनके विकास, देखभाल के लिए  प्राधिकरण भी गठित कर अच्छा खासा अमला तैनात कर रखा है। छत्तीसगढ़ की कुल आबादी की 30 प्रतिशत से अधिक जनजाति है जिनमें करीब 1 लाख 15 हजार विशेष पिछड़ी जनजाति है, जो राज्य के दस जिलों में निवास करती है।

छत्तीसगढ़ की राजनीति की बात हो या सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक विकास की बात हो वह बिना जनजाति विकास के यह संभव नहीं है। अधिकांश वनांचल में रहने वाली ये जनजाति कभी धर्मातरण का शिकार होती है तो कभी नक्सलाईट घटना का। जनजाति के सीधेपन, अशिक्षा और अज्ञान का फायदा उठाकर बहुत सारे लोग जिसमें सरकारी मशीनरी भी शामिल है, इनका शोषण करती रही है।

ऐसे समय जब छत्तीसगढ़ देश के नक्शों में कुपोषण से लडऩे की जंग में सबसे आगे दिखकर सम्मानित हो रहा हो तब किसी विशेष पिछड़ी जनजाति के लोगों का कुपोषण और हीमोग्लोबिन की कमी से मरना हमारी उपलब्धियां पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। छत्तीसगढ़ में विशेष पिछड़ी जनजातियां की संख्या सात है जिनमें केन्द्र सरकार द्वारा घोषित पांच विशेष पिछड़ी जनजातीय अबुझमाडिय़ा, बैगा, कमार बिरहोर, पहाड़ी, कोरवा शमिल है।

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा घोषित पंडो, भुंजिया विशेष जनजाति है। इन विशेष पिछड़ी जनजातियां को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहते हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूर्व में छत्तीसगढ़ की विशेष पिछड़ी जनजाति के लिए 6 अभिकरण बनाने की घोषणा की है। इसके अलावा सभी स्तर की पंचायतों में विशेष जनजाति के एक प्रतिनिधि का मनोनयन भी करने की बात भी कही है। विशेष जनजाति के लोगों के लिए सरकार सामाजिक भवनों का निर्माण भी करवाएगी।

बलरामपुर जिले में पंडो जनजाति के 20 लोगों की मौत पर राज्य सरकार ने जांच के लिए संयुक्त सचिव की समिति गठित कर जांच के निर्देश दिए है। पंडो जनजाति के लोगों में ज्यादातर हीमोग्लोबिन कम होने का मामला सामने आता रहा है। सरकार ने इसके लिए तत्काल दवा सप्लाई करने का निर्देश दिए गए है। हीमोग्लोबिन कम होने का कारण कुपोषण भी कारण हो सकता है ऐसी आशंका जाहिर की गई है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के इस बारे में आरोप लगाते हुए कहा कि मौत का कारण क्या है, जांच होने के बाद पता चलेगा। अच्छी बात है कि अपनी टीम भेजे है। जांच होनी चाहिए। हीमोग्लोबिन कम होना कुपोषण की ओर इशारा करता है।

बलरामपुर के ग्राम बरवाही एवं दोलंगी में पंडो जनजाति के एक बुजुर्ग और दो बच्चों एवं एक अन्य महिला की मृत्यु एनीमिया (खून की कमी) से हो जाने की घटना के बाद दोनों गांव का छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भानुप्रताप सिंह ने भ्रमण किया। उन्होंने परिजनों को बीमार होने की स्थिति में समय पर इलाज कराने एवं झाड़-फूंक से दूर की रहने की सलाह दी। इस क्षेत्र के 39 गांव में पंडो जनजाति के लोग रहे है। यहां 19 सौ लोगों की स्वास्थ्य जांच हुई है, जिसमें से 1406 पंडो, कोरवा जनजाति के लोग है। पांडो जाति की आजीविका मुख्यत: वनोपज संग्रह, बांस बर्तन निर्माण मजदूरी कृषि पर आधारित है। जंगलों में चिरौंजी, तेंदू, महुआ, आंवला, हर्रा, बहेड़ा, तेन्दूपत्ता, धवई फूल, गोंद, शहद, सूखी लकड़ी आदि एकत्रित कर स्थानीय बाजार में बेचते है। कंदमूल यथा-बहुनी कांदा, बिरालू कांदा बंजागर कांदा, बोड़ा, महुआ आदि का उपयोग भोजन के रूप में करते है। बांस से अनाज रखने की डलिया, टोकरी सूपा आदि बनाते है। पाण्डो जनजाति में दो समूह पाया जाता है सरगुजिया और उत्तरांशा 2011 में छत्तीसगढ़ में इनकी जनसंख्या, भारिया, भूमिया, भूमिहर-भूमिया आदि के साथ शामिल की गई है।
बिलासपुर जिले में स्थित मरवाही ब्लॉक के जंगलों में पंडो आदिवासी विशेष पिछड़ी जनजाति के कंधों पर लटके तीर-कमान इनकी पहचान बन चुके हैं।

समूचे छत्तीसगढ़ के दस जिलो में निवास करने वाली विशेष पिछड़ी जनजातियों की देखरेख में होने वाली कोताही को सरकार ने गंभीरता से लेना चाहिए। शेरो की कम होती संख्या के लिए परेशान होते देश के लोगो को विलुप्त होती जनजातियों, वर्ग समूह की भी उतनी चिंता करनी होगी ये हमारी सभ्यता, संस्कृति और मनुष्यता के लिए भी जरूरी है। केवल आदिवासी के नाम पर घडिय़ाली आंसू बहाने से उनके कथित धर्म परिवर्तन की चिंता से कुछ नहीं होगा। उन्हे शिक्षित और स्वावलंबी बनाना सबसे ज्यादा जरूरी काम है।