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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ऐसे तो नहीं रूकेगा कोरोना संक्रमण

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ऐसे तो नहीं रूकेगा कोरोना संक्रमण

-सुभाष मिश्र
कोरोना संक्रमण की महामारी को रोकने के व्यवस्थागत और नीतिगत उपायो को लेकर सरकारें न्यायालयों में खड़ी होकर या तो गुहार कर रही है, या फिर सफाई दे रही है। अदालत ने कहा कि आक्सीजन की कमी और जरूरी दवाएं न मिल पाने के कारण हुई मौते सामान्य मृत्यु नहीं है, हत्याएं हैं। अदालत ने इन्हें नरसंहार तक कहा। सरकार न्यायालय की तल्ख टिप्पणियों को विलोपित करने कह रही है। न्यायालय इसे जनमानस की अभिव्यक्ति मानकर यथावत रहने दे रही हैं। राज्यों की सरकारें टीकाकरण में आ रही रुकावट के लिए केंद्र को दोषी करार दे रही है। केंद्र की ओर से भाजपा विपक्ष की राज्य सरकारों के सर ठिकरा फोडऩे पर आमदा है। कोरोना म्यूटेड अपना स्वरूप तेजी से बदल रहा है। मानो कोई गिरगिट अपना रंग बदलता हो या नेता, जनता के सामने अपनी भाव भंगिमा। सब एक दूसरे के दोष गिनाने में लगे हुए हैं, कोई समाधान नहीं बताना चाहता। जो समाधान बताएं भी जा रहे हैं, उनका बहुत से लोग पालन भी नहीं करते। कोई गोबर से नहाकर कोरोना भगा रहा है, तो कभी काढ़ा पीकर, देसी घरेलू उपचार करके कोरोना की जंग लड़ रहा है। इस बीच शादी-ब्याह के लिए दी गई अनुमति नियमो की धज्जियां उड़ाकर कुछ लोग भीड़-भाड़ के साथ खाना-पीना पार्टी पर उतारू हैं। अभी हाल ही में ओडिशा गंजम जिले के सेरागाडा विकासखंड के कृष्णा वाही गांव में मंदिर स्थापना पर निकाली गई कलश यात्रा की हो या गुजरात के अहमदाबाद के साणंद में निकाले गये देवी के ज्वारो का जुलूस। हजरत हाजी अहमदशाह बाबा बुखारी मुक्ती के जनाजे का नजारा हो या फिर उप्र के बदांयू में हजरत अब्दुल हमीद मोहम्मद सालिमुल कादरी के इंतकाल के बाद अंतिम दर्शन को उमड़े उनके भक्तगणों की भीड़। सभी जगहों पर सोशल डिस्टेसिंग के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ी। इसके उल्ट मुस्लिमों के सबसे बड़े तीर्थ मक्का-मदीना में बहुत ही अनुशासित और सीमित संख्या में सोशल डिस्टेसिंग के नियमों का पालन करते अनुनायियो को प्रवेश मिल रहा है। यही अनुशासन हमारे देश के बहुत से बड़े नामी गिरामी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारो, गिरजाघरो में है।

शासन-प्रशासन अपने स्तर पर जो भी थोड़ा बहुत, कम-ज्यादा कर सकता है, कर रहा है। नागरिकों की ओर से जो सहयोग, ऐतिहायत और दायित्व बोध दिखाया जाना चाहिए उसकी कमी भी बहुत जगह दिखाई दे रही है जिसकी वजह से भी संक्रमण फैल रहा है।
एक कहावत है कि हम तो डूबे हैं सनम तुमको भी ले डूबेगें। हमने भी कोरोना महामारी को लेकर यही रवैय्या अपनाया। मार्च की शुरुआत में स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने एलान किया था कि भारत में कोविड-19 महामारी अब ख़ात्मे की ओर बढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ़ करते हुए कहा था कि इसने दुनिया के सामने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की एक नज़ीर पेश की है। भारत ने जनवरी से ही अपनी बहुप्रचारित वैक्सीन डिप्लोमेसी के तहत दूसरे देशों को वैक्सीन की सप्लाई शुरू कर दी थी।

हमारे देश में सितंबर के मध्य में देश में दैनिक कोरोना संक्रमण की रफ़्तार उच्चतम स्तर थी। हमारे देश में फऱवरी के मध्य तक हर दिन सिर्फ 11 हज़ार मामले आ रहे थे। हर दिन मरने वालों का साप्ताहिक औसत भी घट कर 100 के नीचे पहुँच गया था। लेकिन सितंबर आते-आते संक्रमण की रफ्तार 93 हजार प्रतिदिन पहुंच गई। दिसंबर में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के अधिकारियों ने भी कहा था कि भारत अब कोरोना संक्रमण के ख़ात्मे की ओर बढ़ रहा है। रूपकों का सहारा लेकर कहा गया की इस बात के सबूत मिलने लगे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब जाड़े के मौसम की लंबी छाया से निकल कर चमचमाते रोशन दिनों की ओर बढ़ रही है। इसी समय पीएम नरेंद्र मोदी को वैक्सीन गुरु तक कहा गया।

फऱवरी के आखिर में चुनाव आयोग ने पाँच राज्यों में विधानसभा चुनावों का ऐलान कर दिया। चुनाव क्षेत्रों में न तो कोई सेफ़्टी प्रोटोकॉल अपनाया गया था और न सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हुआ, जिसका नतीजा हमे आज कोरोना संक्रमण के रूप में दिखाई दे रहा है। इस बीच, मध्य मार्च में गुजरात के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच दो अंतरराष्ट्रीय एक दिवसीय मैचों को देखने के लिए एक लाख 30 हज़ार दर्शकों को इजाज़त दे दी। इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी रोड सेफ्टी के नाम पर क्रिकेट मैच हुआ। इस तरह के आयोजनों ने आग में घी का काम किया। बहुत सारे लोगों ने कोरोना प्रोटोकाल जैसे मास्क, सेनीटाइजर, सोशल डिस्टेंसिंग आदि का सही ढंग से पालन नहीं किया। संक्रमित होने के बाद भी आइसोलेशन में नहीं रहे। बाजारों, समारोहो, चुनाव रैलियों, क्रिकेट मैच, सब्जी बाजार, सार्वजनिक स्थलों पर सोशल डिस्टेसिंग का पालन नहीं हुआ। अब लोग लकड़ी के अभाव में नदियो में शव बहा रहे हैं। लाकडाउन के समय जिस गंभीरता से भविष्य के लिए कार्ययोजना बनाकर पूर्व में की गई घोषणा, कमियों का आकंलन कर जो कदम उठाए जाने थे वह नहीं उठाये गए। कोरोना को लेकर यह प्रचारित प्रसारित किया गया की हमने कोरोना की जंग जीत ली है। यह जानते हुए की कोरोना संक्रमण मैन टू मैन कान्टेक्ट से फैलता है, हमने उस बात को नजर अंदाज कर लोगों से मिलना-जुलना जारी रखकर कोरोना केरियर की मदद से उसके वायरस का विस्तार किया। कोरोना संक्रमण के दौरान बाहर से आये सामानों को बिना सेनेटाईज किये हमने इस्तेमाल किया, जिससे बहुत से घरो में कोरोना पहुंचा। कोरोना से लडऩे के लिए अपनी इम्युनिटी बढ़ाना जरूरी है। इम्युनिटी बढ़ाने नियमित व्यायाम, योग के साथ-साथ घरेलू उपाय जिसने गर्म पानी, भाप, हल्दी, तुलसी, विटामिन सी डी आदि का सेवन जरूरी था। हमने उस पर भी उतना ध्यान नहीं दिया। कोरोना के मामले में डाक्टर से सलाह मशविरा की बात को भी बहुत लोगों ने नजर अंदाज किया और कर रहे है। हम जानते हैं कि कोरोना वायरस से हमारा इम्यून सिस्टम ही कारगर ढंग से लड़ सकता है। इसके लिए जरूरी है कि हम संक्रमित होने से बचे और कोरोना का टीका लगवाएं।

यह सही है कि केंद्र सरकार जिसे इस मामले में आपदा प्रबंधन की राष्ट्रीय नीति बनाकर सतत मानिटरिंग और समन्वय करके इस महामारी से लडऩे के लिए काम करना था, उसने ऐसा नहीं करके देश को बड़ बोलेपन में उलझा दिया। राज्य सरकारों ने भी अपने दायित्वों का उस तरह से पालन नहीं किया जो अपेक्षित और जरूरी था। देश की उत्सवधर्मि जनता हमेशा की तरह लापरवाह होकर किसी चमत्कार किसी मसीहे का इंतजार करते हुए बिना मास्क के एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर आपसी भाईचारा निभा रही थी। कोरोना वायरस स्वभावगत इस भाईचारे को पसंद करके एक से दूसरे से और फिर हजारो, लाखों में जाने बेकरार है। यदि हम अभी भी नहीं चेते तो फिर एक दूसरे पर दोषारोपण करते तीसरी-चौथी लहर देखते रहेंगे।