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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - विविधता वाले देश में अलग-अलग चुनाव जरुरी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  विविधता वाले देश में अलग-अलग चुनाव जरुरी

- सुभाष मिश्र

लोगों को अब एक देश, एक चुनाव नहीं चाहिए। उन्हें बार-बार होने वाले चुनाव फायदे के दिखने लगे हैं क्योंकि जो राजनीतिक दल अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, चुनाव आते ही वे बहुत लचीले होकर क्षमायाचना भी करने लगते हैं और अपनी गलती भी स्वीकार करते हैं। हाल ही में देश के प्रधानमंत्री ने तीन कृषि कानूनों को लेकर जो कुछ कहा उससे पूरे देश को समझ में आ गया कि चुनाव ही वो ताकत है जो किसी भी दमखम वाले नेता और पार्टी को अपने ही फैसले पर सोचने के लिए मजबूर कर सकते हैं। तीनों विवादित कृषि बिल वापसी के साथ ही कई सवाल तैरने लगे हैं कि आखिर जिस बिल को लेकर करीब 14 माह तक केन्द्र सरकार और भाजपा किसी से भी लडऩे किसी को भी छोडऩे को तैयार थे लेकिन ऐसा क्या हुआ कि प्रधानमंत्री अचानक तीनों बिलों की वापसी की घोषणा कर देते हैं। जानकार इसके पीछे इस फैसले को अगले साल होने वाले 5 राज्यों के चुनावों को मान रहे हैं। खासतौर पर उत्तर प्रदेश और पंजाब राज्य के किसानों को ध्यान में रखते हुए लिया गया फैसला माना जा रहा है।   

अगर हम जानकारों की इस थ्योरी को मानकर चलें तो ये साबित होता है कि देश में हर साल होने वाले विधानसभा चुनाव फायदेमंद हैं और लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले हैं क्योंकि इन चुनावों के चलते ही सरकारों को अपने फैसलों पर पुर्नविचार करना पड़ जाता है और जनता के मूड के हिसाब से फैसले होते हैं। किसान नेता योगेन्द्र यादव ने तीन कृषि बिल वापसी की घोषणा के बाद लखनऊ में आयोजित किसान महापंचायत में कहा कि प्रधानमंत्री को अहंकार की बीमारी है। बंगाल में छोटा इंजेक्शन दिया था अब यूपी में बड़ा वाला लगाएंगे। दरअसल, राजनीतिक दल चुनाव और उसके परिणाम को देखते हुए ही अपने फैसले लेते हैं, नीतियां बनाते हैं और घोषणाएं करते हैं। राजनीतिक लाभ से लिए गए फैसले अंतत: जनता के लिए फायदेमंद होते हैं। यदि राजनीतिक दलों को वोट मांगने के लिए जनता के पास जाने की जरुरत न हो तो वे कभी भी ऐसे फैसले नहीं लेंगे जो उन्हें पसंद ना हों।

जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता है-
अखबार का हाकर सड़क पर चिल्ला रहा था
कि सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है
अब कड़े परिश्रम, अनुशासन और दूरदर्शिता के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचाहै
एक रास्ता और है कि सरकार इस जनता को भंग कर दे
और अपने लिए नई जनता चुन ले।  

कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने एक राष्ट्र एक चुनाव पर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। एक साथ चुनाव का तात्पर्य पांच साल में एक बार होने वाले चुनावों में लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों में एक साथ चुनाव कराने से है।
इस बैठक के जरिए यह बात सामने आई कि अलग-अलग चुनावों के संचालन के लिए वर्तमान में बड़े पैमाने पर खर्च होता है। चुनाव के समय आदर्श आचार संहिता लागू होने  नीतिगत निर्णय लेने में आवश्यक सेवाओं के वितरण पर इसका प्रभाव पड़ता है। बार-बार होने वाले चुनाव नीति निर्धारण और शासन व्यवस्था को प्रभावित करते हैं क्योंकि सरकार अल्पकालिक सोच में फंस जाती है। यह भी कहा जाता है कि बार-बार चुनाव होने से सत्तारूढ़ दल हमेशा के लिए अभियान मोड में रहने के बजाय कानून और शासन पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होते हैं। इससे शासन में स्थिरता आती है।  

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रत्येक वर्ष कम-से-कम एक चुनाव होता है। दरअसल, प्रत्येक राज्य में प्रत्येक वर्ष चुनाव भी होते हैं। उस रिपोर्ट में नीति आयोग ने तर्क दिया कि इन चुनावों के चलते विभिन्न प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नुकसान होते हैं। चुनाव की अगणनीय आर्थिक लागत बिहार जैसे बड़े आकार के राज्य के लिये चुनाव से संबंधित सीधे बजट की लागत लगभग 300 करोड़ रुपए है। हालांकि, इसके अलावा अन्य वित्तीय लागतें एवं अगणनीय आर्थिक लागतें भी हैं।
एक राष्ट्र एक चुनाव के विचार से असहमत लोगों का मानना है कि एक साथ चुनावों को लागू करना लगभग असंभव है क्योंकि इसके लिये मौजूदा विधानसभाओं के कार्यकाल में मनमाने ढंग से कटौती करनी पड़ेगी या उनकी चुनाव तिथियों को देश के बाकी भागों हेतु नियत तारीख के अनुरूप लाने के लिए उनके कार्यकाल में वृद्धि करनी पड़ेगी। ऐसा कदम लोकतंत्र और संघवाद को कमज़ोर करेगा।

एक साथ चुनाव कराने के लिये मजबूर करना लोकतंत्र के विरुद्ध है क्योंकि चुनावों के कृत्रिम चक्रको थोपने की कोशिश करना और मतदाताओं की पसंद को सीमित करना उचित नहीं है। एक राष्ट्र एक चुनाव से क्षेत्रीय दलों को नुकसान पहुंचेगा क्योंकि एक साथ होने वाले चुनावों में मतदाताओं द्वारा मुख्य रूप से एक ही तरफ वोट देने की संभावना अधिक होती है जिससे केंद्र में प्रमुख पार्टी को लाभ होता है।

एक देश एक चुनाव की मांग चुनावों को लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। अगर हम देश में होने वाले चुनावों पर नजऱ डालें तो पाते हैं कि हर वर्ष किसी-न-किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। चुनावों की इस निरंतरता के कारण देश लगातार चुनावी मोड में बना रहता है। इससे न केवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं बल्कि देश के खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता है।  हाल ही में हुए 17वीं लोकसभा के चुनाव में एक अनुमान के अनुसार, 60 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक का खर्च आया  और लगभग तीन महीने तक देश चुनावी मोड में रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक देश-एक चुनाव को लेकर कई बार बातें कह चुके हैं। इसको लेकर जानकारों की अपनी अपनी राय है। कई इसके नफा को लेकर वकालत करते नजर आते हैं तो कुछ इसके नुकसान को लेकर ज्यादा सजग हैं। हालांकि साल 1952, 1957, 1962, 1967 में देश में राज्यों की विधानसभाओं और लोकसभा का चुनाव एक साथ हुए थे। यह क्रम तब टूटा जब वर्ष 1968-69 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं विभिन्न कारणों से समय से पहले भंग कर दी गईं।

भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी ताक़त ही नहीं, एक राष्ट्र के रूप में उसकी खूबसूरती भी है। विविधता की यह शक्ति और उसका सौंदर्य जातीय परम्परा, इतिहास और स्मृतियों में अन्र्तध्वनित होता हुआ हमारे वर्तमान को भी झंकृत करता है लेकिन लगभग सौ बरस से कुछ ऐसी ताकतें भी सक्रिय हैं जो बहुसंख्यकवाद के दबाव के चलते विविधता को नष्ट कर उसे मनचाही एकरूपता में जकड़ देना चाहती हैं। कथित हिन्दू राष्ट्र का स्वप्न सदियों से पोषित इस विविधता के सामने आज एक भीमकाय अवरोध की तरह खड़ा है। देश की सत्ता पर काबिज होने के साथ ही धार्मिक बहुसंख्यकवाद पर आधारित एकरूपता को पोसने में लगी ये ताकतें अन्य धर्मों और संस्कृतियों को विद्वेष और गहरी घृणा के साथ देखती हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान जातीय घृणा के निर्लज्ज प्रदर्शन के अनेक प्रसंग घटित हुए हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं।

कौन नहीं जानता और इतिहास साक्षी है कि किसी भी तरह की एकरूपता की परिणति तानाशाही और फासीवाद में हुई है जो लोकतंत्र को सबसे पहले कुचलता है। भारत जैसे विविधता वाले देश में एकरूपता की दिशा में बढ़ा हुआ हर कदम तानाशाही की ओर जाता है। समान नागरिक संहिता, एकदलीय तथा अध्यक्षीय शासन प्रणाली, एक देश एक चुनाव जैसे मुद्दों के ज़रिए भारतीय दक्षिणपंथ वस्तुत: एकरूपता और शक्ति की अधिकाधिक केंद्रीयता को हमारी राजनीतिक संस्कृति पर आरोपित कर देश की सामासिकता और विविधता को नष्ट करने को उतारू है। इसके लिए लगातार दमन का सहारा लिया जा रहा है जो चिंता का विषय है।