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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - निजीकरण का अब नया नाम मौद्रीकरण

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - निजीकरण का अब नया नाम मौद्रीकरण

- सुभाष मिश्र

निजीकरण को अब नया नाम मौद्रीकरण देकर केंद्र सरकार ने कल विभिन्न क्षेत्रों की सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों को सौंपकर कुल छह लाख करोड़ रु. जुटाने के लक्ष्य की घोषणा की है। सरकार का यह क़दम अप्रत्याशित नहीं है। भाजपा की सरकार चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की हो या नरेंद्र मोदी की, निजीकरण को लेकर अतिरिक्त रूप से उत्साहित रही है। वाजपेयी जी के कार्यकाल में बक़ायदा विनिवेश के लिए पृथक मंत्रालय खोल दिया गया था। आर्थिक उदारीकरण के राजनीतिक विचार को राष्ट्रीय उत्थान के सामाजिक दर्शन के रूप में प्रचारित किये जाने के साथ ही निजीकरण को रामबाण नुस्खे की तरह मान लिया गया है। मनमोहन सिंह के दौर में ही इसे लागू किया गया, लेकिन अनेक  कारणों से निजीकरण की रफ़्तार धीमी थी लेकिन वैश्विक पूंजी के द्वारा सुझाये गये इस नुस्खे को भाजपा सरकार ने जिस तेज़ी से और बेझिझक अपनाया है, वह उसके दुस्साहस को ही प्रकट करता है। आर्थिक मुद्दों पर भाजपा ने पहले भी नोटबन्दी और जीएसटी जैसे दुस्साहसिक फैसले लिए हैं और उससे होने वाली राष्ट्रीय क्षति की कतई चिंता नहीं की। उल्टे उन फैसलों पर हुई आलोचनाओं को दृढ़तापूर्वक खारिज भी किया। आज भी अर्थव्यवस्था को इससे हुए नुकसान को मानने को वह तैयार नहीं है। यह हठधर्मिता भाजपा सरकार की चारित्रिक विशेषता है।

सरकारी संपत्ति बेचने की बात को भी वह सिरे से नकारती है और इस पहलकदमी को मौद्रीकरण जैसी शब्दावली में लपेट कर पेश कर रही है। इसकी आलोचना होने पर सरकार का कहना है कि यह संपत्ति बेची नहीं जा रही है, बल्कि लीज पर दी जा रही है और लीज एक तय समय-सीमा के लिए होगी। उसके बाद पूरी सम्पत्ति वापस सरकार के पास आ जाएगी। जिन रोड, रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट्स को लीज पर दिया जाएगा, उनका मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा।

अब सवाल यह उठता है कि यह लीज आखिर कितनी अवधि के लिए दी जा रही है।  दरअसल, एयरपोर्ट को 50 साल के लिए और रेलवे स्टेशन और उससे लगी जमीनों को 100 साल के लिए निजी कंपनियों को लीज पर दिया जाएगा। क्या दीर्घ अवधि की यह लीज संपत्ति बेचे जाने से कम है?

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तावित योजना के अंतर्गत 400 स्टेशन, 90 पैसेंजर ट्रेन, 1400 किमी के ट्रैक को लीज पर दिया जाएगा। साथ ही पहाड़ी इलाकों में रेलवे संचालन भी प्राइवेट कंपनियों को सौंपा जाएगा। इसके अलावा देश भर में रेलवे के 265 गुड्स शेड और 673 किमी डीएफसी भी निजी क्षेत्र को दी जाएगी तथा चुनिंदा रेलवे कॉलोनी, रेलवे के 15 स्टेडियम का संचालन भी लीज पर दिया जाएगा।

केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन प्लान का अनावरण करते हुए जरुर कहा कि केवल कम उपयोग की गई संपत्तियों का मौद्रीकरण किया जाएगा और मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा। नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन मिशन बहुत सारे सेक्टर्स को कवर करेगा, जिनमें रोड, रेलवे, एयरपोर्ट से लेकर पावर ट्रांसमिशन लाइन्स और गैस पाइपलाइंस भी शामिल हैं। वित्तमंत्री ने जोर देकर कहा कि सरकार अपनी कोई भी संपत्ति बेचेगी नहीं, बल्कि इसका बेहतर तरीके से इस्तेमाल करेगी। ब्राउनफील्ड असेट्स का मोनेटाइजेशन (मौद्रीकरण) निजी भागीदारी को लाकर किया जाएगा।  इस प्रक्रिया से हासिल की जाने वालीराशि का इस्तेमाल अधोसंरचना निर्माण में किया जाएगा। राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे रूट, स्टेडियम, वेयरहाउस, पावर ग्रिड पाइपलाइन जैसी सरकारी बुनियादी ढांचा संपत्तियों को निजी क्षेत्र को कमाई के लिए लीज पर देकर केंद्र की मोदी सरकार करीब 6 लाख करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी कर रही है। 

रेल मंत्री पीयूष गोयल ने देश के लोगों से लोकभा में सदन के माध्यम से भरोसा दिलाया था कि रेलवे का कभी भी निजीकरण नहीं किया जाएगा लेकिन कुशल कामकाज के लिए निजी निवेश की आवश्यकता है। उन्होंने सदन में कहा कि मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि रेलवे भारत की संपत्ति है और इसका कभी भी निजीकरण नहीं किया जाएगा। यह हर भारतीय की संपत्ति है और रहेगी।

वाराणसी में इसी तरह की बात देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही थी। उन्होंने रेलवे केनिजीकरण से इंकार किया और कहा कि लोगों को विदेशी और निजी पूंजी के इस्तेमाल से सावधान नहीं होना चाहिए, जो राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जो बदले में देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद करेगा। उन्होंने लोगों को अपने बचपन की बात बताते हुए भावनात्मक लहजे में बताया कि जब उन्होंने एक रेलवे स्टेशन के पास चाय बेची थी। उन्होंने कहा कि मेरा रेलवे के साथ एक जुड़ाव है जो कि अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के दावे से पुराना है। उन्होंने यह भी कहा था कि एक गलतफहमी है कि रेलवे का निजीकरण किया जा रहा है। हालांकि, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हम रेलवे का निजीकरण नहीं कर रहे हैं।  

वहीं दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मोनेटाईजेशन और माडर्ननाईजेशन साथ-साथ रहेगा। उन्होंने 24 फरवरी को ही अपने भाषण में साफ कर दिया था कि सरकार का दायित्व है कि देश में बिजनेस को पूरा समर्थन दें। सरकार खुद इंटरप्राइजेस चलाएं यह न आवश्यक है न ही संभव। गव्हर्नमेंट एज नो बिजनेस।

इसके पहले सरकार ने बहुत सारे सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में यह कहकर सौंपा था कि उसमें सरकार की हिस्सेदारी रहेगी। छत्तीसगढ़ का बाल्को इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। 2001 में भारत एल्युमिनियम को वेदांता ग्रुप के अनिल अग्रवाल ने 550 करोड़ में इसकी सबसे बड़ी हिस्सेदारी खरीदी। 700 एकड़ जमीन के 1100 एकड़ में प्लाट और 1700 एकड़ में विकसित कालोनी में सरकार का कहने को 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है किन्तु सारा मैनेजमेंट वेदांता ग्रुप का है। वेदांता समूह के आने के बाद यहां 540 मेगावाट और 1200 मेगावाट का पावर प्लांट बनाया गया। एल्युमिनियम बनाने के लिए 1.5 लाख मीट्रिक टन की क्षमता वाली भट्टी की क्षमता बढ़ाकर 5-7 लाख मीट्रिक टन की गई।

सरकार अब चार साल की अवधि के नाम पर मौद्रीकरण की जो बात कह रही है उसे लेकर लोगों के मन में तरह-तरह के संदेश हैं। इस संदेह की वजह सरकार के पूर्व में दिए गए बयान हैं। जिसके उलट यह सब हो रहा है। अब खेल के मैदान से खेलकर रेल परिवहन पावर सब कुछ निजी हाथों में होगा। बेहतर सेवा के नाम पर निजी क्षेत्र उपभोक्ता रुपी जनता से ही अनाप-शनाप मुनाफाकमायेगी।

कहने की ज़रूरत नहीं कि निजी कम्पनियां जनता से ही ठेके की रकम की वसूली करेगी। इसके लिए मोदी सरकार ने रेलवे के यात्रियों पर यूजर चार्ज लगाने का प्रावधान पहले से ही कर दियाहै। शुरुआत में देश के 15 फीसदी रेलवे स्टेशनों पर यूजर चार्ज लगाया जाना है। दिल्ली में हवाई अड्डा पर देखें तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों से अलग-अलग यूजर चार्ज लिया जाता है। वह करीब 500 रुपये के करीब होता है।

ज़ाहिर है, सरकार को छह लाख करोड़ की एकमुश्त रकम तो मिल जाएगी लेकिन 50 या 100 साल के लिये वह इस सम्पत्ति के मालिकाना हक से वंचित हो उठेगी। उल्टे सारा बोझ जनता पर ही पड़ता है। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह लाभ का सौदा तो कतई नहीं हो सकता। सरकार की यह योजना रेलयात्रा को खर्चीला बनाएगी। सात दशकों में अर्जित राष्ट्रीय सम्पदा को बेचने की यह नीति आर्थिक दुर्दशा को आमंत्रित करती है। रोजग़ार जैसे बुनियादी मुद्दों पर ध्यान न देकर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट जैसी अनावश्यक योजना पर हजारों करोड़ फूँकने वाली सरकार छह लाख करोड़ का आखिर किस तरह उपयोग करेगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। अदूरदर्शिता आखिर और किसे कहा जाता है?