breaking news New

यह सच्ची मनुष्यता के असभ्य राजनीति से संघर्ष का समय है - अशोक वाजपेयी

यह सच्ची मनुष्यता के असभ्य राजनीति से संघर्ष का समय है - अशोक वाजपेयी


विद्वानों और सिद्धान्तकारों के लिए मनुष्यता एक अस्पष्ट धारणा है और उसे ठीक से परिभाषित नहीं किया जा सकता. लेकिन साधारण लोगों के लिए उसका अर्थ है, उसकी ज़रूरत है और साधारण जीवन में मनुष्यता अपने को तरह-तरह से व्यक्त करती रहती है. आपसी मदद और सहयोग, गरमाहट और आत्मीयता, संवाद और सहकार, भाईचारा और सद्भाव आदि ऐसे तत्व हैं जो साधारण से साधारण जीवन में मौजूद और सक्रिय रहते हैं. यह कहा जा सकता है कि साधारण जीवन के अनेक दुखों और कष्टों से, उसकी व्यथा और निहत्थेपन से, किसी हद तक, निपट पाने की भावना इसी मनुष्यता से मिलती है. मुनष्य जो कुछ दूसरों के लिए हितकर सोच-कर सकता है वही इस मुनष्यता को रूपायित और सशक्त करता है. एक-दूसरे से मिल-जुड़कर कुछ करने का जज़्बा और उत्साह इसी मनुष्यता के कारण होता है. विशेषज्ञों को भले मनुष्यता अपरिभाषित लगे, वह एक जीवन्त और सशक्त-सक्रिय अवधारणा है जिसकी व्याप्ति है और हो, ऐसा मनुष्य के सभी हितचिन्तक चाहते हैं.

एक-दूसरे से मिल-जुड़कर कुछ करने का एक और क्षेत्र है- राजनीति. उसमें जो ‘नीति’ का पुछल्ला है वह मनुष्यता का ही दूसरा नाम है. आजकल जो सत्तापरक और सत्ताकामी राजनीति चल रही है और जीवन और समाज के अनेक क्षेत्रों में जिसकी घुसपैठ लगातार बढ़ गयी है, उसमें राज इतना प्रधान और सर्वग्रासी हो उठा है कि नीति आचरण में सिरे से ग़ायब हो गयी है. यह दुहराने से वर्तमान को ही सब कुछ माननेवालों को कुछ खीझ हो सकती है कि एक समय ऐसा था जब भारत में राजनीति और मनुष्यता के बीच एक बेहद अनोखा और परस्पर हितकारी संबंध और संवाद, व्यापक रूप से, सम्भव हुआ था. यह समय था महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गये अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम का. यह अकारण नहीं है कि उस संग्राम के बीज शब्द थे- सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, सिविल नाफ़रमानी. सत्य, विनय और सिविल शब्द ही काफ़ी है यह जतलाने के लिए कि इस राजनीति में कितना नैतिक बल था, कितनी मनुष्यता थी.

सत्तारूढ़ राजनीति ने तो इधर खुलकर पूरी बेशर्मी के साथ राजनीति से मनुष्यता के संबंध और संवाद को समाप्त कर दिया या निमर्मता से दबा दिया है. यह राजनीति, जैसा कि पहले भी बार-बार कहा जा चुका है, घृणा, भेदभाव, हिंसा, धनबल, दबंगई, खरीद-फ़रोख़्त षड्यन्त्र, जासूसी आदि पर आधारित है और उन्हें ही फैला रही है. किसी भी तरह की नीचता, झूठ, अभद्रता से उसे कोई संकोच नहीं होता. यह राजनीति स्वयं तो असभ्य ‘अनसिविल’ है ही, वह हमें भी वैसा ही बनाने पर उतारू है. इस समय सच्ची मनुष्यता का संघर्ष इस राजनीति से है और कई बार ऐसा लग सकता है कि यह हारी होड़ है. पर मनुष्यता, अपने तत्व और सत्व में, अपराजेय होती है. उसका संघर्ष अविकल-अविराम होता है और उसे हार-जीत की सपाट पदावली में आंका-समझाया नहीं जा सकता.

सुषमा की बची जगहें

ऐसा माहौल बन गया है जिसमें लगता है कि तरह-तरह की क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी निगरानी बहुतों पर रखी जा रही है और राजनीति हर दिन कोई नया षड्यन्त्र सामने ले आती है. यह सोचना कठिन लगता है कि अब भी हमारे जीवन और समय में, समाज और प्रकृति में ऐसी जगहें बची हैं जिनमें सुषमा है. ऊपर जिस मानवीयता का ज़िक्र किया गया है उसका एक अनिवार्य पक्ष है सत्य और सौन्दर्य की खोज. रवीन्द्रनाथ ने तो आइन्स्टीन जैसे वैज्ञानिक से अपनी बातचीत में इसरार किया था कि सत्य और सौन्दर्य मानवीय ही हो सकते हैं: ऐसा कुछ भी सच या सुन्दर नहीं हो सकता जिसे मनुष्य ने न देखा-महसूस किया हो. इसका अर्थ यह है कि सत्य और सुन्दरता के साथ हमारी मानवीयता का बहुत आवयविक संबंध है. क्या राजनीति-बाज़ार आदि की बढ़ती सर्वग्रासिता के रहते हमारे जीवन में सच और सुन्दर को देख पाना, बचा पाना सम्भव है?


एक अमरीकी उपन्यासकार की नयी पुस्तक के बारे में एक लम्बा लेख पढ़ने का सुयोग हुआ. अमरीका में दबे-छुपे ऐसे बम बनाने की सफल कोशिश होती रही है जिनसे एक तरह का जैविक युद्ध छेड़ा जा सके, जिसमें ये बम तरह-तरह की बीमारियों के रोगाणु बड़ी संख्या में शत्रु-प्रजा में फेंक सकते हैं जिनसे उसकी बड़ी संख्या रोगग्रस्त होकर मर जाये. इसका कोई पुख़्ता साक्ष्य तो उपलब्ध नहीं है कि अमरीका ने पिछले कुछ दशकों में तरह-तरह के जो युद्ध लड़े हैं उनमें इस तरह के बमों का उपयोग किया है या नहीं. उपन्यासकार यह जिज्ञासा करता है कि अगर नहीं किया है तो उन्हें बनाया-विकसित क्यों किया गया और जा रहा है. वियतनाम युद्ध में तो लाप्लाम बम का उपयोग किया गया था और उस समय के अनेक हृदय-विदारक फ़ोटो याद आते हैं. उपन्यासकार इस मरणान्तक स्थिति और साधनों के बरक़्स जीवन की छोटी-छोटी चीज़ों को रखता है. एक तरफ़ मनुष्यता को नष्ट करने का पूरा क्रूर इन्तज़ाम और दूसरी तरफ़ लिखने के समय उपन्यासकार के एक पालतू कुत्ते का उसका हाथ सहलाना.

सच तो यह है कि बहुत कुछ नष्ट होते रहने के बावजूद ऐसी बहुत सारी साधारण सी चीज़ें हैं जिसमें सुषमा बची है और एक तरह से वे ही इस अभागे समय में हमारा सहारा है. दिल्ली में अभी सुबह की तेज़ बारिश हो चुकी है और बालकनी से दिखते हरे वृक्षों की हरीतिमा अपनी विविधता में चमक रही है: जैसे किसी ने हरे की कई रंगतों में वृक्षों को बहुत जतन से रंगा हो. बरामदे में पानी भर गया है जिसे थोड़ी देर बाद किसी तरह उलीचकर हटाना होगा. चिपचिपी सी उमस है और पंखे के नीचे न बैठे हों तो शरीर बहुत पसीज जाता है. मैं सोच रहा हूं कि इस समय हमारी एक खिड़की के नीचे बसनेवाले कबूतर कहां हैं- क्या दाना-पानी की खोज में पानी थमते ही उड़ गये. जीवन इन नन्हीं छबियों में घटित हो रहा है- जैसे कोई धीमे-धीमे कोमल स्वरों में गा रहा है. जीवन की इस अदम्य सुषमा के गान को क्या हम सुन पा रहे हैं?

कविधर्म

कविधर्म पर अपने निबन्ध का आरम्भ रवीन्द्रनाथ ठाकुर से इस वाक्य से किया था: ‘भद्रता आचरण की सुन्दरता है.’ अपनी उत्कृष्टता के लिए उसे धैर्य, आत्मसंयम, और अवकाश के परिवेश की दरकार होती है. सच्चा सौजन्य रचना होती है, चित्रों की तरह, संगीत की तरह.

एक ऐसे समय में जब हमारा ज़्यादातर प्रकृति से संवाद बन्द हो चुका है, इसी निबन्ध में आगे रवीन्द्रनाथ याद दिलाते हैं कि कविता और कलाएं अपने में मनुष्‍य की यह गहरी आस्था संजोये रखती हैं कि समूचे अस्तित्व से वह तदाकार है जिसका सत्य उसके व्यक्तित्व में होता है. यह एक ऐसा धर्म है जो सीधे अनुभव किया जाता है और वह किसी आधिभौतिक व्यवस्था के विश्लेषण और तर्क पर आधारित नहीं होता.

आधुनिकता का एक बड़ा अभिशाप यह है कि जहां उसने हमें कई तरह की मुक्ति दी, उसने अस्तित्व से तादात्म्य को अनावश्यक बना दिया, उससे भी हमें मुक्त कर दिया. एक तरह से आधुनिक साहित्य और कलाओं का एक ज़रूरी संघर्ष इस तादात्म्य के पुनर्वास का है. यह एक लम्बा संघर्ष रहा है और कई बार उसने इस लांछन का सामना भी किया है कि तादात्म्यवादी सामाजिक-आर्थिक सचाइयों से पलायन करते हैं. क्या ऐसा पलायन हमें कभी-कभी अपनी मनुष्यता को उद्दीप्त करने के लिए ज़रूरी नहीं लगता? क्या कई बार यही उपयुक्त कविधर्म नहीं लगता?