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परसाई की मखमल की म्यान धारदार रही

परसाई की मखमल की म्यान धारदार रही

० महाविज्ञ ने बताया सब कुछ सबके लिए नहीं होता

रायपुर। सुयोग पाठक और साथियों ने गाया रंग संगीत। जनमंच रायपुर में आज विवेचना रंगमंडल की ओर से दो नाटकों का मंचन किया गया। हरिशंकर परसाई की रचना पर आधारित पहला नाटक मखमल की म्यान को गीत-संगीत व अपने अभिनय से आशुतोष द्विवेदी ने जीवंत कर दिया। संतोष राजपूत द्वारा निर्देशित ये नाटक आाज भी प्रासंगिक है। दूसरा नाटक महाविज्ञ था जो कि जापानी कथाकार नाकाजिमा अत्सुशी की कथा पर आधारित है जिसका निर्देशन प्रगति विवेक पांडे ने किया। कहानीकार जितेन्द्र भाटिया ने इसे हिन्दी में अनुवादित किया है।  

मखमल की म्यान में कालजयी रचनाकार हरिशंकर परसाई जी ने उन सभी छद्म आचरण (हिप्पोक्रेट्स) करने वालों पर करारा व्यंग्य किया है जो विनय की रेशमी म्यान में अपनी दम्भ की तलवार छिपाकर रखते हैं। निजी जीवन में बहुत अहंकारी और दम्भी लोग सार्वजनिक जीवन में विनम्रता की नकली चादर ओढ़ लेते हैं। ऐसे लोग हमें जगह-जगह दिखलाई पड़ते हंै।
परसाई के व्यंग्य लेखन की धार को उजागर करते हुए इस नाटक के कुछ संवाद-विनय की मुलायम मखमली म्यान के भीतर हम दम्भ की प्रखर तलवार रखे रहते हैं। कितने लोग मंच से घोषणा करते हैं- मैं जनता जनार्दन का सेवक हूं! इस मखमली म्यान के भीतर अक्सर यह तलवार होती है- मूर्खों! मैं तुम्हारा भाग्य-विधाता हूॅं। कितने ही लोगों के अहं का भालू मंच पर एकदम मेमना हो जाता है।
विनय के रेशमी पर्दे के पीछे अहं की कुरूपता छिपी नहीं रह सकती। अहं की प्रकृति ही प्रदर्शन की है, वह नकते की तरह आईना देखने को उत्सुक रहता है। कुछ नकटों को आईना देखकर भी यह समझ में नहीं आता कि नकटापन कुरूपता है। वे समझते हैं कि कट जाने से नाक सुडौल हो गयी। बिरले होते हैं, जो कटी नाक को विकृति स्वीकार कर लेते हैं।

दूसरा नाटक प्रगति विवेक पांडेय द्वारा निर्देशित नाटक महाविज्ञ था जिसके कथा का नायक हानतान शहर में रहने वाला चाईचांग विश्व का सबसे महान धनुर्धर बनने की इच्छा से कई बरसों की कठोर साधना और दो महागुरुओं के सानिध्य से गुजरता है। कई बरसों के अविश्वसनीय अभ्यास और साध के बाद वह अपने दूसरे गुरु कान यिंग की गुफा तक पहुंच सका था, मगर बूढ़े कान यिंग ने उसके आसक्ति के केंद्र को ही ध्वस्त कर दिया। गुरु से मिलने के बाद ही चाईचांग का असल जीवन प्रारंभ होता है।
     महत्वाकांक्षा के शिखर पर ले जाकर जीवन की नींव की ओर धकेल देने वाली ऐसी गहन कथा अन्यत्र ढूंढे नहीं मिलती। भरमाये मन पर नरमाये फूल की मार सी पडऩे वाली यह कथा अहं को सीधी चोट देती है। सादगीपूर्ण शिल्प में गढ़ी यह कथा सोचने के लिए विवश करती है कि तुम जो कर रहे हो, वह क्यों कर रहे हो। इसलिए यहां यह कहना उचित होगा कि यह सबके लिए नहीं है यूं भी सब कुछ, सबके लिए नहीं होता। दोनों नाटकों में ध्वनि संकलन शुभम-शिवम द्वारा तथा संगीत संयोजन अभिनव-शिवम द्वारा किया गया। नाटक में प्रकाश संचालन संतोष-अभिनव ने किया। इस पद्धति में मार्गदर्शन-श्री अरूण पांडेय, श्री नवीन चौबे, श्री सीताराम सानी, श्री तपन बैनर्जी का रहा।
नाटक के प्रारंभ में डॉ. सुयोग पाठक, श्रीमती रचना मिश्रा, मिजान अहमद खान, गौरव मुजेवार, हेमंत यादव, संध्या वर्मा,आकाश वैष्णव ने रंग संगीत प्रस्तुत किया। इन्होंने अमीर खुसरो, गुलजार, अरूणकमल, राजेश जोशी ज्ञानेन्द्रपति, पवनकरण की कविताएं संगीत के साथ गाइं।
दर्शकों ने नाटक और रंग संगीत को बेहद पंसद किया। जनसंचार 3-4 मार्च को हीरा मानिकपुरी द्वारा निर्देशित नाटक टैक्स फ्री का मंचन होगा। 7-8 मार्च को योग मिश्रा द्वारा निर्देशित नाटक बइहा-सागर का मंचन किया जायेगा।