II नागरिक जीवन में अनुशासन : कोरोना काल पर प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की विशेष टिप्पणी

II नागरिक जीवन में अनुशासन : कोरोना काल पर प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की विशेष टिप्पणी

    II नागरिक जीवन में अनुशासन II


    • सुभाष मिश्र


      कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने के लिये तीन मई तक देशव्यापी लॉकडाउन के बीच, उन क्षेत्रों के लिए, जहां अभी कोरोना ने अपने पांव नहीं पसारे हैं, 20 अप्रैल से कुछ नियम, शर्ते, अनुशासन के साथ जरूरी काम-काज के लिये छूट देने केंद्र सरकार ने गाईड लाइन जारी की है। ऐसा नहीं है कि ये गाईड लाईन के जरिये सामाजिक और भौतिक दूरी बनाए रखने के ये निर्देश अभी ही जारी हुए हैं। कोरोना संक्रमण की सूचना के बाद से लगातार दी जा रही हिदायतों के बावजूद कहीं सरकारी वितरण व्यवस्था, कहीं सूचना संवाद की, तो कहीं नागरिक दायित्वों के प्रति लापरवाही के अपने मूल भारतीय स्वभाव के कारण हमने, स्वभावगत और कहीं-कहीं अपनी जरूरतों के कारण गाईड लाईन का उल्लंघन करके अपनी और अपने आसपास के लोगों की मुसीबत को बढ़ाया है, उनकी जान सांसत में डाली है।

      छत्तीसगढ़ लगभग कोरोना के संक्रमण से मुक्त होने ही वाला था कि कठघोरा और आसपास के लोगों ने एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिये सील की गई सीमाओं और पाबंदियों की अनदेखी कर सारे शहर में मौत का सन्नाटा पसरा दिया है। कठघोरा जन लापरवाही एक उदाहरण है। तब्लीगी जमात सहित ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जहां कुछ लोगों की लापरवाही की सजा एक बड़ा तबका, नागरिक उठा रहे हैं। मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन में अपने घर जाने इकट्ठे लोगों की भीड़ बड़ौदा, सिवली में एकत्र मजदूर हों या फिर रायपुर के सब्जी मंडी में उमड़ी लोगों की भीड़ या फिर जनधन खातों से पैसा निकालने बैंकों में उमड़ी गरीब लोगों की भीड़, कहीं यह प्रशासनिक लापरवाही, बदइंतजामी का नतीजा था. फिर जिम्मेदारी का अहसास नहीं था कि हमारी वजह से कितने लोगों का जीवन संकट में आ सकता है!

      नागरिक जीवन में अनुशासन की कमी के सैकड़ों उदाहरण हम अपने सामने रोज देखते हैं। बहुत सारे लोग तो कानून इसलिये भी तोड़ते हैं कि उन्हें अपनी ताकत दिखानी है। उन्हें यह मालूम है या गुमान है कि कानून तोड़ऩे से हमारा कुछ नहीं होगा। वे मानकर चलते हैं कि समरथ को नाहि दोष गोंसाई। अधिकांश लोगों के दिलों, दिमाग में कानून का पालन करना, एक सिविल सोसायटी के नागरिक बने रहने का भाव नदारद है। सबसे ज्यादा ईश्वरवादी होने और ऊपर वाला सबको देख रहा है, के संदेश वाहक हम, सब तरह की निगरानी की अनदेखी करते हैं। दरअसल हमारे भीतर खुद की निगरानी, खुद का नागरिक बोध नदारद है।

      सरकारी दफ्तरों, शिक्षा संस्थान या अन्य उपक्रम में सुपरवाइजरी की परंपरा इसलिये बनी हुई है कि हम अपनी निगरानी खुद नहीं करते। हम सौंपे गये अपने दायित्वों, जिम्मेदारियों का निर्वाहन तब तक सही ढंग से नहीं करते जब तक कि हमारा बॉस मालिक न देख रहा हो। यही वजह है कि बहुत सारे संस्थानों में जगह-जगह कैमरे लगाने पड़े हैं, हर स्तर पर निगरानी के लिये सुपरवाईजर रखने पड़े हैं। समय पर आने—जाने के लिये थम मशीन लगानी पड़ती है। हम खुद अपने सपरवाईजर निगरानीकर्ता और निरीक्षक नहीं हैं। निर्धारित समय और अवधि में काम से नदारद रहने, सौंपे गए काम को नहीं करना, कामचोरी करना, हमारे लिये गौरव की बात है। मालिक देखेगा, पूछेगा, सरकार कहेगी, पुलिस रोकेगी तो ही हम सारी बातों का पालन करेंगे।

      ये समय खुद की निगरानी का है। यदि हमने खुद की निगरानी नहीं की तो ऐसी स्थिति में 'हम तो डूबे हैं सनम, तुमको भी ले डूबेगे' वाली बात सही साबित करेंगे। सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा लाकडाउन में 20 अप्रैल से दी जाने वाली रियायतों संबंधी दिशा—निर्देश के अनुसार स्वास्थ्य सेवाएं, खेती से जुड़ी सभी गतिविधियों, अधिकृत मंडियो, वित्तीय संस्थान जिनमें बैंक, एटीएम शामिल हैं, रोजमर्रा से जुड़े छोटे-मोटे कामकाज, उद्योग आदि को जरूरी शर्त के साथ अनुमति दी जा रही है। कार्यस्थल पर थर्मल स्क्रीनिंग और सेनिटाइजेशन, शादी, अंतिम संस्कार में प्रशासन के निर्देशों के अनुसार सीमित लोग, पांच से अधिक व्यक्तियों के एक साथ खड़े होने पर रोक, सार्वजनिक स्थानों पर थूकने पर जुर्माना आदि प्रावधानित है।

      जब कोई नहीं रोकता, टोकता और देखता है तो हम सब जगह थूकते हैं, पेशाब भी करते हैं, ट्रॉफिक सिंग्लन क्रास भी करते हैं। हम वो सब करते हैं जो एक नागरिक के नाते हमे नहीं करना चाहिए। सवाल यहां हमारी लचर वितरण व्यवस्था, सरकार के नीति निर्देशों की स्पष्टता, व्यवहारिक पक्ष और लोगों की जरूरत और संयम की आदत से जुड़ा है। हमने जनधन योजना, मनरेगा और सामाजिक सुरक्षा पेंशनधारियों से कहा कि सरकार उनके खाते में पैसा जमा कर रही है, वे पैसे निकाल सकते हैं। पाई-पाई को मोहताज लोगों के लिये पांच सौ, हजार रुपये बहुत थे। सोशल डिस्टेंसिंग के निर्देशों की परवाह किये बगैर सब लोग बैंक में इकट्ठे हो गये। बैंक के पास ऐसी अधोसंरचना, व्यवस्था नहीं है कि वह खाताधारकों की भीड़ को संभाल सके।

    • लाकडाउन और कवारंटाइन करने वालें लोगों को खाना खिलाने की व्यवस्था, बदइंतजामी की वजह से अधिकांश जगह चरमराने लगी है। रेलवे ने सभी यात्री ट्रेन सेवाओं का संचालन 3 मई तक निलंबित रखने का फैसला किया है। बावजूद इसके मुंबई के बांद्रा में हजारों लोग, प्रवासी मजदूर इकटठा हो गए। उन्हें हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। मजदूरों को उम्मीद थी कि लॉकडाउन खत्म हो जाएगा। ये सभी मजदूर घर जाने के लिए स्टेशन पर पहुंच गए। इनका कहना है कि इन्हें खाने—पीने की दिक्कत हो रही है। इसी तरह  10 अप्रैल को लॉकडाउन के बीच गुजरात के सूरत शहर में देर रात वेतन और घर वापस लौटने की मांग को लेकर सैकड़ों मजदूर सड़क पर सड़क पर उतर आए थे. इन मजदूरों ने शहर के लक्साना इलाके में ठेलों और टायरों में आग लगाकर हंगामा किया था.

      इससे पहले घर जाने की मांग को लेकर बीते 28 मार्च को विभिन्न राज्यों से हजारों की संख्या में आए प्रवासी मजदूर, नई दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर जमा हो गए थे. लॉकडाउन के बावजूद भी ग्राहक सेवा केंद्र व अन्य कई दुकानों और सब्जी मंडियों पर लोगों की काफी भीड़ लग रही है। ग्राहक सेवा केंद्र पर खासकर महिलाएं व बच्चियां एक साथ लगातार इकटठा हो रही हैं। किराना दुकान खुलते ही भीड़ इकटठा हो जाती है। यही हाल सब्जी बाजार का है। लोगों द्वारा लॉकडाउन का अनुपालन नहीं किया जा रहा है। यही हाल राशन दुकानों, दवा दुकानों, सब्जी दुकानों, दूध के दुकानों का है। दुकानों में लोगों को जरुरी राशन के सामानों की खरीदारी करने के लिए काफी भीड़ देखी जा रही है।

      क्वारेंटाइन पर रहने वाले मजदूरों की क्वारेंटाइन सेंटर्स से लगातार भागने की खबरें भी आ रही थीं. रायबरेली, हरदोई, सुल्तानपुर समेत तमाम जिलों में इनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है. इसके पीछे क्वारेंटाइन सेंटर में सुविधाओं की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है. लोग बिना मास्क और सैनेटाइजर के रह रहे हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का यहां पालन होता नही साथ ही मच्छर भी परेशान करते हैं. ये सारी बातें कहीं ना कहीं हमारे सिस्टम की, हमारी व्यवस्थाओं की और कुछ जगहों पर नागरिक जीवन में अनुशासन की कमी को बताती हैं. हम बहुत सारे कार्य फ़ौरी तौर से करते हैं। यही वजह है कि हमारे यहाँ मामला चाहे विस्थापन का हो, आपदा प्रबंधन का हो या लोगों तक सरकारी पैसा, मदद पहुँचाने का हो, हम बहुत जगह फेल हो जाते हैं।

      दुष्यंत कुमार का एक शेर है :
      यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सैकड़ों नदियाँ
      मै जानता हूँ कि पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा


      हमारे पास खाद्यान्न का पर्याप्त भंडारण है। कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं मर सकता, बाकी सारी व्यवस्थाएं भी हमारे यहां पर्याप्त हैं। बावजूद इसके बहुत सी जगहों पर भगदड़ की स्थिति निर्मित हो रही है। कहीं न कहीं ये सब हमारी वितरण व्यवस्था, कार्यप्रणाली और नागरिक जीवन में अनुशासन की कमी को दर्शाता है। हम आज तक ऐसी डिजीटल पेंमेंट की व्यवस्था, चैन निर्मित नहीं कर पाये जो सरकारी योजनाओं के हितग्राहियों को सीधे भुगतान दिला सके। हम कितने दिनों तक संभावित लोगों को घरों के भीतर रोके रख पायेंगे। हमें जरूरत है कि हम लोक शिक्षण करें, ऐसी व्यवस्था बनाएं जिस पर लोगों को विश्वास हो। इस मनोवृत्ति से भी लोगों को मुक्त होने की जरूरत है कि जब तक कोई निगरानी, निर्देश, कड़ाई, कानूनी कार्यवाही नहीं होगी तो हम काम नहीं करेंगे। यदि हमने खुद की निगरानी नहीं की तो आने वाले समय में सबसे ज्यादा हम ही इसके शिकार होंगे।


    (लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )