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ध्रुव शुक्ल की कविताः कल मिलेंगे, आज नहीं

ध्रुव शुक्ल की कविताः कल मिलेंगे, आज नहीं


ये कैसे लोग

जिन्हें ज़िन्दगी पे नाज़ नहीं

कोई सुर नहीं,कोई साज नहीं

वक़्त की आवाज़ नहीं

पर हैं कोई परवाज़ नहीं

अपना कोई अन्दाज़ नहीं


ये कैसे लोग

दूर से हाथ हिलाकर कहते

कल मिलेंगे, आज नहीं


ये कैसे लोग

कोई तो पूछे इनसे

क्या इस दूर के सलाम का 

कोई इलाज नहीं


ये कैसे लोग

तंगदिल हुए इतने

इनमें कोई ग़रीबनवाज़ नहीं


डूबती कश्तियाँ

पानी पे लिखे लफ़्ज़ों-सी

साहिल पर कोई जहाज़ नहीं


कभी उठती है कोई लहर

सुनायी देती हैं कुछ 

दूर जाती हुई-सी आवाज़ें

करीब आने का कोई आग़ाज़ नहीं