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भूतनाथ रिटर्न्सः एक फिल्म के बहाने

भूतनाथ रिटर्न्सः एक फिल्म के बहाने

ध्रुव शुक्ल, कवि-कथाकार

देश पर दीर्घकाल तक शासन कर चुके विपक्षी राजनीतिक दल के नेता सत्ता से बाहर होने के कारण फुर्सत में हैं। जन आंदोलनों में भी उनका प्रवेश निषिद्ध है। उन्हें इस फुर्सत में अमिताभ बच्चन की फिल्म 'भूतनाथ रिटर्न्स' ज़रूर देखना चाहिए। यह फिल्म उनकी पराजय के कारणों पर कुछ रोशनी डालती है।

सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे लोग भी यह फिल्म देखें तो उन्हें अगले चुनाव में अपने नेता चुनने में कुछ तो वैचारिक मदद मिल ही सकती है। कानून बनाने वाले और प्रशासन चलाने वाले लोग भी देखें। अगर वे बुरा न मानें तो यह फिल्म उन्हें उनका मज़ाक उड़ाकर उनकी सही जगह की थोड़ी-सी याद तो दिला ही देती है।

एक छोटी-सी फिल्म से अगर नेता,जनता और प्रशासकों को अपनी लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी की थोड़ी-सी भी याद आ जाये तो क्या कम है। वैसे दुखदाई राजनीति पर पहले भी कई फिल्में बनीं और लोग उन्हें देखकर भूल गये। 

दरअसल जनता को लगा भूलने का रोग ही कई प्रकार के अत्याचारियों को मनमानी करने की छूट दिए हुए है। जनता को बेखबरी में डाले रखकर ही राजनीतिक गठबंधन सत्ता की सौदेबाजियाँ कर पाते हैं।

इस फिल्म में भूतनाथ इस बात का प्रतीक बनकर भी उभरता है कि सरकार को खुद नहीं दिखना चाहिए,उसके काम दिखना चाहिए। पर दुर्भाग्य है कि चारों तरफ अपना प्रचार करती सरकार ही सरकार दिखती है। उसके काम नहीं दिखते।