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वैलेंटाइन डे पर विशेष: हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय

वैलेंटाइन डे पर विशेष: हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय

आज पूरी दुनिया में प्रेम दिवस यानी वैलेंटाइन डे मनाया जा रहा है। नफरत से भरी इस दुनिया में प्यार के लिए थोड़ी सी जगह बनाने की चाहत हर किसी में होती है। हमारे बहुत से कवि, शायर ने प्रेम को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। 

प्रेम गली अति सांकरी

संत कबीर साहब

प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय !

राजा पिरजा जेहि रुचे, शीश देई लेजाए !!

प्रेम पियाला जो पिये शीश दक्षिणा देय !

लोभी शीश न दे सके,नाम प्रेम का लेय !!

जब मैं था तब गुरु नहीं,अब गुरु हैं हम नाय !

प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय !!

जा घट प्रेम न संचरे,सो घट जान मसान !

जैसे खाल लुहार की,सांस लेतु बिन प्रान !!

 

प्रेमभाव एक चाहिए,भेस अनेक बनाय !

चाहे घर में बास कर ,चाहे बन को जाय !!

कबीरा यह घर प्रेम का,खाला का घर नाहीं,

सीस उतारे भुइं धरे,तब पैठे घर माहीं !!


हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय

मीरा बाई

हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।

दरद की मारी बन बन डोलूं बैद मिल्यो नही कोई॥


ना मैं जानू आरती वन्दन, ना पूजा की रीत।

लिए री मैंने दो नैनो के दीपक लिए संजोये॥


घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।

जौहरि की गति जौहरी जाणै की जिन जौहर होय॥


सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।

गगन मंडल पर सेज पिया की, मिलणा किस बिध  होय॥


दरद की मारी बन-बन डोलूं बैद मिल्या नहिं कोय।

मीरा की प्रभु पीर मिटेगी जद बैद सांवरिया होय॥


जो इश्‍क को काम समझते थे

फैज अहमद फैज


वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत थे

जो इश्‍क को काम समझते थे

या काम से आशिकी रखते थे

हम जीते जी नाकाम रहे

ना इश्‍क किया ना काम किया

काम इश्‍क में आड़े आता रहा

और इश्‍क से काम उलझता रहा

फिर आखिर तंग आकर हमने

दोनों को अधूरा छोड़ दिया


उसका हाथ

 केदारनाथ सिंह


उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.


क्योंकि तुम हो 

क्योंकि तुम हो शब्द छू पाते हैं अर्थ 

धूप बिछती है सीढ़ियों पर 

चिड़िया उड़ जाती है नीलिमा में 

गान लेकर 


क्योंकि तुम हो 

हरी पत्ती होती है लज्जारुण 

ठंड में सिहरती है देह 

कामना में आत्मा 


क्योंकि तुम हो 

आकाश भर जाता है 

बच्चों की किलक से 

और पृथ्वी 

फूलों और फलों से 

क्योंकि तुम हो


क्या सच में वह वसंत था ? 

 आलोक श्रीवास्तव 


वसंत मैंने तुम्हारी आंखों में देखा था 

बरसों से नहीं देखीं 

तुम्हारी आंखें 

देखा है 

बस एक उदास मौसम 

जो सहमा - सा आता है 

और आहिस्ता से गुजर जाता है ! 

क्या सच में वह वसंत था ? 

कहां से आया था वह तुम्हारी आंखों में ? 


थोड़ी - सी 

 अशोक वाजपेयी

अपने पास थोड़ी - सी जगह दे दो जरा 

 सी जगह जहाँ मैं ये शब्द रख सकूँ 

भले ही ये सूखे फूलों और पत्तियों 

जैसे लग रहे हैं । तुम रहो धूप में, हरियाली में,

अपने यौवन के वैभव में, मुझे थोड़ा सा स्थान दे दो 

जहाँ मैं अपनी कामना चित्रित कर सकूँ । 

तुम हरी घास हो मैं उड़ती हुई ओस 

मुझे एक जरा - सी नोक दे दो 

जहाँ मैं विलीन होने के पहले ठहर सकूँ।


प्रतीक्षा में प्रेम में

अशोक वाजपेयी

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मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ प्रेम में प्रेम 

तुम्हारी प्रतीक्षा करता है मुझ में 

सुखद सूर्य ओस और आँसू से भीगी हरी दूब 

भोर से ही सक्रिय पक्षी तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं 

पृथ्वी आकाश मैं प्रतीक्षा के ही नाम हैं प्रेम में

 प्रतीक्षा करती है प्रेम प्रेम करता है 

प्रतीक्षा मैं प्रेम करता हूँ और प्रतीक्षा ।


एक सभ्यता : प्रेम के विरुद्ध 

 आलोक श्रीवास्तव 

दुनिया में सबसे कठिन चीज है प्यार करना 

एक मरुस्थल आ जाता है सबसे पहले 

न जाने कहां से अगम्य पर्वत श्रेणियां एक खारा दरिया 

एक नगर एक समूची सभ्यता

प्रेम के विरुद्ध अपना ही साहस 

अपनी ही हंसी उड़ाता लगता है

 वह तुम्हारी शत्रु हो जाती है 

चली जाती है तुम्हारे ख्वाब से भी दूर

जीवन तुम्हें भी हांक देता है 

किसी रेगिस्तान में 

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दुख , प्रेम और समय

आलोक श्रीवास्तव 

बहुत से शब्द बहुत बाद में खोलते हैं अपना अर्थ 

बहुत बाद में समझ में आते हैं दुख के रहस्य 

ख़त्म हो जाने के बाद कोई संबंध

 नए सिरे से बनने लगता है भीतर 

... और प्यार नष्ट हो चुकने टूट चुकने के बाद

पुनर्रचित करता है ख़ुद को 

निरंतर पता चलती है अपनी सीमा 

अपने दुख कम प्रतीत होते हैं तब 

और अपना प्रेम कहीं बड़ा 


कहानी हमारे प्रेम की 

आलोक श्रीवास्तव 

तुमने रंग कहा मैंने राग

बहुत अलग थी तुम्हारी भाषा 

मैं सोचने लगा उन तमाम सपनों के बारे में 

चुपचाप जिनकी पदचाप मेरी नींद में दाखिल होती थी हर रात ! 

तुम्हारी आंखें बंद थीं धूप की एक पतली लकीर

 चुपचाप उतर रही थी तुम्हारी पलकों से 

शाम की दहलीज़ पर एक सूखा पत्ता रखा था 

बरसों पुरानी कोई धुन गल रही थी हवा में 

तुम बहुत खुश थीं मैं बहुत उदास 

बस , इतनी सी कहानी थी हमारे प्रेम की