कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः हम क्यों इतने छिप जाते हैं!

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः हम क्यों इतने छिप जाते हैं!


हम अपना-अपना नाम कमा कर

चुप हो जाते हैं

हम अपना-अपना काम बना कर

चुप हो जाते हैं

हम अपना-अपना दाम बता कर

चुप हो जाते हैं

हम अपना-अपना धाम जमा कर

चुप हो जाते हैं


हम अपनी-अपनी वोट डाल कर

चुप हो जाते हैं

हम अपनी-अपनी ओट डाल कर

चुप हो जाते हैं

हम अपनी-अपनी लोट लगा कर

चुप हो जाते हैं




हम दूजे की गोट मार कर

चुप हो जाते हैं

हम दूजे की खोट बता कर

चुप हो जाते हैं

हम अपना-अपना कोट बाँध कर

चुप हो जाते हैं


ढलते दिन में रोज़ अंधेरे

घुप हो जाते हैं

हम सब से छिपते-छिपते

कितने छिप जाते हैं!