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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-पुरुषों के दीर्घायु जीवन की कामना का पर्व

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-पुरुषों के दीर्घायु जीवन की कामना का पर्व

 
अभी हमारे ईश्वर सो रहे हैं। देवउठनी एकादशी को ईश्वर जागेंगे और उसके साथ शुरू होगा शादी-ब्याह का सिलसिला। फिलहाल ये समय उत्सवों का है। विशेषकर स्त्रियों से जुड़े उत्सव का। अभी थोड़े दिन पहले ही हमने नवरात्रि के जरिये देवी शक्ति की आराधना कर उत्सव मनाया। अब दीपावली के समय लक्ष्मीजी की पूजा करेंगे, किन्तु इसके पहले हमारे घरों की स्त्रियां करवा चौथ का व्रत रखेंगी।

करवा चौथ के पर्व पर उन सभी पुरूषों को बधाई जिनके दीर्घायु जीवन के लिए स्त्रियां सज-धज के उपवास रखती हैं, फिर चांद को चलनी के पीछे से पति को सामने रखकर व्रत तोड़ती हैं। बचपन से अपने घर आस-पड़ोस, जान-पहचान की स्त्रियों को पति और बेटे के लिए व्रत रखते देखकर मन में ख्याल आता रहा है कि पति या पुत्र अपनी पत्नी, मां के लिए तो कोई उपवास नहीं रखते। यमराज के पास से अपने पति को जीवित ले आने वाली सावित्रियों के लिए अधिकांश सत्यवान वो साहस नहीं दिखाते जो सावित्री ने दिखाया था। ज्यादातर सत्यवान अपनी सावित्री के ओझल होते ही किसी नई मेनका, रम्भा की तलाश में जुट जाते हैं। अधिकांश अकेली हो गई सावित्रियों से सत्यवान की अनुपस्थिति में उसके सारे कलर, तीज-त्यौहार तक छिन लिए जाते हैं। वे समाज के बनाये नियम, परंपरा में अकेले अभिशप्त जीवन जीने को विवश होती हैं।

भारत में बाजार भारतीय संस्कृति, उसके संस्कार और तमाम धार्मिक रीति-रिवाज और पर्व आदि का गहन अध्ययन करने के बाद दाखिल हुआ है। उसने पर्व को प्रदर्शन प्रियता से जोड़ा और ऊबे हुए, थके हुए मध्य वर्ग को धार्मिक पर्व में रंगीन उत्सव सा अवसर और उल्लास नजर आया। धार्मिक पुरोहित और पंडितों ने इस धार्मिक आपदा को अवसर में बदला और इस उत्सव प्रियता को बढ़ावा दिया। इस तरह धर्म में एक नए अर्थशास्त्र का दखल बढ़ा। धार्मिक पूजा और पाठ के पैकेज बनने लगे हैं। मध्यवर्ग से आए नव धनाढ्य वर्ग ने पूजा-पाठ के नए अर्थशास्त्र को उत्सव के उल्लास के साथ स्वीकार किया। मंदिरों के बाहर चाय-चाट के ठेले बढऩे लगे हैं। मंदिर अब अधिकांशत: पर्यटन स्थल में बदलने लगे हैं। मंदिर से निकलकर बाहर खड़े होकर चाट खाने में धर्म की दखलअंदाजी खत्म हो गई। गरबा अब आस्था और प्रार्थना की लय से बाहर आकर युवाओं के लिए एक रंगीन उत्सव बनकर रह गया है, और अब इसमें बाजार शामिल हो गया है जिससे नित नए ड्रेस कोड शामिल होते जा रहे हैं। गरबा उत्सव में अब नित नए ड्रेस के अलावा डीजे और फिल्म कलाकारों का आगमन बाजार की ही आहट है। रंगीन पंडाल में बड़े-बड़े रंगीन टेलीविजन पर गरबा का लाइव प्रदर्शन अब सामान्य बात होती जा रही है। आज का युवा वर्ग धार्मिक रीति-रिवाज और पर्व को आस्था के साथ निभाने और जीने की अपेक्षा उसमें बाजार की रंगीनियत का आनंद उठाने लगा है।

हमारी धार्मिक और पौराणिक कथाओं में प्रचलित कथा, विधानों और परंपरा के कारण हिन्दू स्त्रियां विशेषकर उत्तर भारत की स्त्रियां साल में कम से कम चार बार पति के दीर्घायु जीवन और बेहतर दाम्पत्य के लिए कड़ा उपवास रखती हैं। इसके अलावा अच्छे पति के लिए सावन सोमवार से लेकर न जाने कितने उपवास भारतीय स्त्री के खाते में आते हैं, ये नहीं जानती है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियां ज्यादा कुपोषण का शिकार होती हैं।
बहुत सारी खांटी घरेलू स्त्रियां अक्सर पूरे घर को खिलाकर ही जो शेष बचा होता है, वह खाती हैं। दरअसल, स्त्रियों की समूची दिनचर्या और सोच में उनका अपना घर-परिवार होता है, जिसके मंगल के लिए वे सब तरह का त्याग करने तत्पर रहती हैं। पुरुष सत्तात्मक समाज इसे बनाये रखना चाहता है।

भारतीय तीज-त्यौहार की परंपरा और स्त्रियों के उपवास रखने को सही ठहराने वाले लोगों का मानना है कि हमारे यहां साल में दो बार स्त्री के पक्ष में नवदुर्गा के दो बड़े त्यौहार होते हैं। जिसमें पुरुष स्त्री शक्ति की आराधना करते हैं। लक्ष्मी पूजा के बहाने दरअसल पुरुष अपने घर की गृहलक्ष्मी की ही पूजा करते हैं। शरद ऋतु के आरंभ के बाद करवा चौथ का पहला त्यौहार होता है। जिसके साथ ही मौसम परिवर्तित होता है। खेत-खलिहान और खुले में काम करने वाले पुरुष के लिए ये रातें कठिन और बड़ी होती हैं। ऐसे समय में प्रकृति के साथ तादात्म्य की मंगल कामना के लिए स्त्रियां पुरुषों के लिए उपवास रखती हैं। धार्मिक संस्कारों की वकालत करने वाले लोगों का यह भी मानना है कि हमारी भारतीय संस्कृति एक गूंथी हुई संस्कृति है। स्त्रियों की पूजा की सारी तैयारी पुरुष करवाते हैं। स्त्री के सारे वैभव, सुख और समृद्घि के पीछे अंतत: पुरुष ही होता है। ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि जब इसी प्रकृति में बाकी धर्मावलंबी रहते हैं तो उनके यहां पुरुषों के लिए स्त्रियां इस तरह का उपवास क्यों नहीं रखती?
यहां फिर वही सवाल है कि जब हर साल करवा चौथ पर सभी पत्नियां अपने पति की लंबी आयु के लिए कठिन व्रत रखती हैं, किन्तु क्या ये व्रत पति को भी अपनी पत्नी की दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए नहीं रखना चाहिए? कुछ पति आजकल देखा-देखी इस तरह के उपवास रखकर सोशल मीडिया पर अपनी पत्नी निष्ठा का प्रदर्शन कर पोस्ट करने लगे हैं, ताकि बाकी पुरुष इससे प्रभावित हों। लोग कहते हैं मैन विल भी मैन।
बहुत सी आधुनिक कामकाजी महिलाएं भी बड़े मनोयोग और दिखावा पसंद संस्कृति के चलते पूरे व्रत के विधि-विधानों को चुपचाप ढोती हैं। नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकलकर एक तरफ तो उसने स्त्री के लिए बनाए दायरे को तोड़ा, किन्तु ऐसे रिवाज स्वेच्छा से अपने ऊपर लादे रहती हैं। जब कुल, परंपरा और पति की उम्र की दुहाई दी जाती है, तो भारतीय नारी हर तरह के व्रत या पूजा करने के लिए तैयार हो जाती है। उसने बचपन से यही तो देखा और सीखा है। क्या पति के मन में भी अपनी पत्नी के स्वास्थ्य और लंबे जीवन की कामना रहती होगी? यदि हां तो इसकी अभिव्यक्ति के लिए कोई त्यौहार या अनुष्ठान क्यों नहीं है?

हमारे देश में जहां बच्चियों की भ्रूण हत्या हो जाती है, वहां शायद यह भाव भी गहरे अर्थ में छिपा होगा कि पुरुष जिएं, स्त्री के मरने जीने से समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता और ना पड़ेगा। एक ही पुरुष की लम्बी उम्र के लिये मां जितिया करती है और पत्नी तीज।
अक्सर यह कहा जाता है कि रीति-रिवाज आपस में प्रेम बढ़ाने और मिलकर रहने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन देखा जाता है कि ऐसे व्रत सिर्फ महिलाएं ही करती हैं। किसी पुरुष को अपनी पत्नी के लिए उपवास रखते और पूजा करते नहीं देखा जाता। बदलते परिवेश में करवा चौथ व्रत का भी अब ग्लोबलाइजेशन हो गया है। अब करवा चौथ का पर्व देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मनाया जाने लगा है। करवा चौथ के दिन सुहागिन स्त्रियां पति की दीर्घायु और खुशहाल दाम्पत्य जीवन की कामना के लिए बुधवार को सदियों पुराना करवाचौथ का पारंपरिक व्रत रखेंगी। करवा यानी मिट्टी का बरतन और चौथ यानि चतुर्थी। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा-अर्चना करने का विधान है। माना जाता है करवा चौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है। उनके घर में सुख, शान्ति, समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है। जब किसी सुहागन का पहला करवा चौथ होता है तब उसके मायके पक्ष द्वारा सास के लिए सरगी, सुहाग का सामान और उपहार स्वरूप साड़ी भेजी जाती है। इसके बाद सास अपनी बहू को सरगी देती है। करवा चौथ की बहुत सी पौराणिक कथा है पर इस व्रत की शुरुआत सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण वापस लाकर की थी। तभी से सभी सुहागिनें अन्न-जल त्यागकर अपने पति के लम्बी उम्र के लिए इस व्रत को श्रद्धा के साथ करती हैं।

महिला सशक्तिकरण के इस दौर में जहां महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। घर-परिवार की जिम्मेदारी के साथ परिवार के आर्थिक पक्ष को मजबूत करने घरेलू कामकाज के साथ-साथ बाकी क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं, तो ऐसे समय में पुरुष वर्ग को भी स्त्रियों को लेकर नई सोच विकसित करने की जरुरत है। अकेले दीर्घायु होने से कुछ नहीं होगा। स्त्रियां सुखी, समृद्घ और स्वस्थ होंगी तो हमारा यह संसार भी रंगीन, खुशहाल और जीने लायक बना रहेगा।