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मियावाकी रोपण का प्रयोग सफल : परंपरागत वृक्षारोपण का बन सकता है विकल्प-मनीष कश्यप

 मियावाकी रोपण का प्रयोग सफल : परंपरागत वृक्षारोपण का बन सकता है विकल्प-मनीष कश्यप


भानुप्रतापपुर। पूर्व भानुप्रतापपुर वनमण्डल में 2020 में राज्य का प्रथम मियावाकी तकनीक से वृक्षारोपण किया गया था। डीएफओ मनीष कश्यप की पहल से इस जापानी तकनीक का प्रयोग पहली बार राज्य में किया गया था। एक वर्ष से भी कम समय में इसके बहुत अच्छे परिणाम आ गए है। 

सितंबर 2020 में कुल 30 प्रजाति के  11 हजार पौधों का रोपण 0.56 हेक्टेयर क्षेत्र में किया गया था। तब पौधों की औसत ऊंचाई 50 cm था। आज इसकी ऊंचाई 2.5 गुना बढ़कर 125 cm  हो गई है और जीवित प्रतिशत 95% है। शहर के बीचों बीच वन विभाग  डिपो के खाली पड़े अतिक्रमित जमीन में किया गया यह रोपड़ आज हरा भरा घना जंगल बन गया है। नगर वासियों के सुबह घूमने का यह स्थान बहुत सुहावना हो गया है। 

                       मियावाकी रोपण आज देश के बड़े  शहरों में प्रचलित हो रहा है। बैंगलोर, हैदराबाद और मुंबई जैसे बड़े शहरों में इस तकनीक से बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण हो रहे है। यह रोपण हमारे परंपरागत वृक्षारोपण से 30 गुना ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है और  धूल और ध्वनि प्रदूषण को 3000 गुना तक कम करता है। छोटे से क्षेत्र में किए गए रोपण से तुलनात्मक अधिक फायदे है।  इस वजह से यह भविष्य का वृक्षारोपण बन सकता है । खासकर शहरों में जहां वृक्षारोपण के लिए जगह की किल्लत होती है और प्रदुषण बहुत ज्यादा होता है। 


इस तकनीक में पौधों को बहुत पास पास रखा जाता है। परंपरागत तकनीक से किए गए वृक्षारोपण में प्रति हेक्टेयर 1000 पौधे लगाए जाते है 3x3 मीटर के अंतराल में। जबकि मियवाकी तकनीक से रोपण में लगभग 20,000 पौधे 0.75x0.75 मीटर के अंतराल में लगाए जाते है। जमीन में गड्ढेे करने से पहले जुताई की जाती है और मिट्टी में खाद के साथ  भूसा  मिलाया जाता है। वृक्षारोपण करने के बाद नमी बचाने हेतु  पूरे क्षेत्र में पैरा छिड़क दिया जाता है और बरसात के बाद पूरे वृक्षारोपण की सिंचाई की जाती है ।  माना यह जाता है कि कम अंतराल में पौधे होने और अच्छी देखभाल होने से पौधो में कॉम्पटीशन से जबरदस्त विकास होता है। तीन साल में पौधे 5 मीटर तक पहुंच जाते है और घना जंगल तैयार हो जाता है जिसको अतिरिक्त सुरक्षा और देखभाल की जरूरत नहीं होती। जंगल की तरह अधिक घना होने से जमीन कि नमी और उपजाऊ बनी रहती है। इसलिए इसे मिनी फॉरेस्ट कहते है। परंपरागत तकनीक से 3x3 में किए गए रोपड़ से जंगल बनने में 100 से अधिक वर्ष लग जाते है।  अब पूरे वन विभाग में बड़े पैमाने पर  इस पद्धती से वृक्षारोपण करने की जरूरत है। इस रोपण को 5x5 मीटर के छोटे से क्षेत्र में भी किया का सकता है जैसे घर के गार्डन, सरकारी ऑफिस के कैंपस, या 3 मीटर की चौड़ी पट्टी में रोड किनारे वृक्षारोपण के तौर पर भी।


 वन विभाग के परंपरागत वृक्षारोपण को स्थापित होने में 5 साल तक लग जाते है। अधिकारी और कर्मचारी के स्थानांतरण 2-3 वर्षों में हो जाने के कारण वृक्षारोपण का ठीक से ध्यान नहीं हो पाता। 5 साल तक मुश्किल ही कोई वृक्षारोपण का फेंसिंग बच पाता है। आने वाले नए स्टाफ का रुचि पुराने वृक्षारोपण में कम होने से  चौकीदार भी ढीले पड़ जाते है। इसलिए वन विभाग के परंपरागत वृक्षारोपण ना ही ज्यादा बच पाते है और ना ही ज्यादा विकास होता है। मियावकी वृक्षारोपण छोटे से क्षेत्र में होने के कारण देखभाल अच्छा होता है। 2-3 वर्षों में ही स्थापित और घने हो जाते है जिसके बाद ना ही फेंसिंग की जरूरत पड़ती है ना ही चौकीदार की। इससे अधिकारी और कर्मचारी के स्थानांतरण से पहले ही यह वृक्षारोपण स्थापित हो जायेगा। मियावाकी की कीमत परंपरागत वृक्षारोपण से 5-6 गुना ज्यादा जरूर होगा पर पर्यावरण को छोटे से क्षेत्र में उससे भी कई गुना ज्यादा  फायदे होंगे। जमीन भी बचेगी। भविष्य में मियवाकी पद्धिती से वृक्षारोपण वन विभाग का परंपरागत वृक्षारोपण का स्थान ले सकता है।