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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-गोबर के दीयों से जगमगायेगी दीवाली

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-गोबर के दीयों से जगमगायेगी दीवाली


कहने को चाईना के इलेक्ट्रानिक आयटम सहित बहुत सारी चीजें बैन हुई हैं किन्तु अभी भी बाजार चायना के उत्पाद से भरा हुआ है। इस बीच स्थानीय उत्पाद यानी लोकल को ग्लोबल करने का नारा देकर घरेलू अर्थव्यवस्था को सुधारने की बाते लगातार हो रही है। बिना किसी नारेबाजी के अपने लोकेल को प्रमोट करते हुए छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तीज-त्यौहार खास करके दीपावली में की जाने वाली रोशनी के लिए गोबर के दीये तैयार किये गये हैं। गोठान में खरीदे जा रहे गोबर से बने दीये से इस दीपावली में लोगों के घर जगमगायेंगे। इसके साथ ही दीपावली को ध्यान में रखते हुए दीया, ऊं, स्वास्तिक, शुभ-लाभ, गणेश जी की मूर्ति सहित अन्य सजावटी समान भी बनाये जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग महिला स्वसहायता समूहों द्वारा अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए गोबर से नये विकल्प तलाश किए गये हैं। कभी किसी ने गोबर से इतनी बेहतर उपयोग सामग्री बनाने के बारे में सोचा भी न होगा, जो इन ग्रामीण महिलाओं ने कर दिखाया है। महिलाओं ने अपने हाथों से तराश कर इकोफ्रेंडली गोबर के दीये तैयार किये हैं। गोबर के दीयों को जलने के बाद गमलों में डालकर खाद की तरह भी उपयोग किया जा सकता है।

हिंदू रीति-रिवाज में गाय के गोबर की पूजा होती है। ऐसे में इस बार की दीवाली में गोबर से बनी गणेश और लक्ष्मी की मूर्तियां मिलेंगी। पीओपी वाली मूर्तियों से होने वाले जल प्रदूषण को रोकने के लिए पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए गाय के गोबर के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार के साथ-साथ उपभोक्ता भी लोकल प्रोडक्ट के लिए थोड़ा वोकल हो रहे हैं। चाइना मेड झालर इस दिवाली उपभोक्ता नकार रहे हैं।   

सरकार द्वारा भी स्थानीय उत्पाद की मार्केटिंग कर लोगों को स्थानीय परिधान, जरूरत की स्थानीय सामग्री खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के कोसे की साड़ी जिसका शिल्प हाथकरघा से बनी सामग्री को भी नई क्लेवर नई डिजाइन के साथ प्रस्तुत किया गया है। छत्तीसगढ़ की अर्थ व्यवस्था में नगद पूंजी की निरंतरता को बनाये रखने के लिए मनरेगा के अंतर्गत बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराये गये काम, राजीव गांधी न्याय योजना की तीन किश्तों में 1500 करोड़ रुपए का भुगतान तथा गोधन न्याय योजना में 47.38 करोड़ रुपए का गोबर खरीदा गया है। इसके अलावा लघुवनोपज के रूप में भी बड़ी संख्या में सामग्री की खरीदी और वनोपज समिति के माध्यम से तेंदूपत्ता संग्राहकों को 7.88 करोड़ की बोनस राशि उपलब्ध कराई गई है। ऐसे बहुत सारे कारणों से इस बार बाजार में कोरोना की महामारी और लॉकडाउन के बावजूद रौनक बनी हुई है और बाजारों में सामग्री बिक्री भी तेजी से हो रही है।

तमाम लॉकडाउन और आर्थिक मंदी के बावजूद सराफा कारोबार में 30 फीसद से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। छत्तीसगढ़ की सड़कों पर 50 हजार से अधिक बाइक और 4500 से अधिक कारें उतरी हैं। इनके साथ ही कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट और कमर्शियल वाहनों की भी जमकर खरीदारी हुई है। कारोबारियों का कहना है कि अकेले ऑटोमोबाइल का कारोबार ही 600 करोड़ पार कर गया। ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी पिछले साल की तुलना में 25 से 30 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में कोरोना की तीसरी लहर थोड़ा बहुत असर दिखाती भी है तो कम से कम छत्तीसगढ़ बाकी प्रदेशों की तुलना में बेहतर स्थिति में रहेगा। यहां का गोबर भी अब गुड़ हो गया है। गोबर अब केवल खाद-कंडे और आग तापने, जलाने के अलावा रोशनी फैलाने के भी काम आ रहा है।

कोरोना संक्रमण के दौरान हुई ऐतिहासिक तालाबंदी से उपजी आर्थिक मंदी में देश को निकालने के लिए मोदी सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत पहले दौर में 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज दिया। ये आर्थिक पैकेज कुटीर, उद्योग, गृह उद्योग और लघु-मंझले उद्योगों के लिए था जिसे लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। मोदी जी ने इस पैकेज की घोषणा के साथ कहा था कि भारतवासियों को अपने लोकल के लिए वोकल बनाना है। हमें न सिर्फ लोकल प्रोडक्ट्स खरीदने हैं बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना है। इसके अलावा सरकार द्वारा सूक्ष्म, लघु और मंझले उद्यमों (एमएसएमई) को तीन लाख करोड़ का लाभ दिया गया। यह लोन 4 साल के लिए शत-प्रतिशत की गारंटी पर है। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की लिक्विडिटी की समस्या को दूर करने के लिए 30 हजार करोड़ रुपए की सोशल लिक्विडिटी स्कीम भी शुरू की गई। मेक इन इंडिया के नाम से शुरु आत्मनिर्भर भारत के इस अभियान के अभी रिजल्ट आना शेष है। स्थानीय उत्पादकों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने उत्पाद के प्रचार-प्रसार के साथ उसे देश और विश्व के बाजार में पहुंचाने की है। स्थानीय बाजार में उत्पादित चीजों के वैसे मूल्य नहीं मिल पाते जो मिलने चाहिए। यही वजह है कि बड़ी पूंजी के इस खेल में स्थानीय उत्पादक अपनी चीजों को औने-पौने में बेचने मजबूर हैं। पूरे देश को यह चिंता सता रही है कि कहीं बड़ी पूंजी और बड़ी कंपनियों की आक्रमक और प्रचारात्मकता के चलते कहीं लोकल सिमट कर न रह जाये। इस सब बातों के बीच लोकल से ग्लोबल की वकालत करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उम्मीद जताई है कि जब प्रत्येक व्यक्ति गर्व के साथ स्थानीय उत्पादों को खरीदेगा, स्थानीय उत्पादों के बारे में बात करेगा, उनकी जय करेगा और दूसरों को संदेश देगा कि हमारे स्थानीय उत्पाद बहुत अच्छे हैं, यह संदेश बहुत दूर तक जाएगा। ऐसा करने से न केवल स्थानीय पहचान को मजबूत किया जाएगा, जो लोग इन स्थानीय उत्पादों को बनाते हैं, उनकी दिवाली भी अधिक उज्जवल होगी। स्थानीय लोगों के लिए जाने का मतलब केवल दीया खरीदना नहीं है, बल्कि आपके द्वारा दीवाली में उपयोग की जाने वाली सभी चीजें हैं। यह उन्हें बनाने वालों को प्रोत्साहित करेगा। इस बार गांधी जयंती पर, लोगों ने दिल्ली के कनॉट प्लेस में खादी की दुकान से 1 करोड़ से अधिक मूल्य की खरीदारी की। इसी तरह, कोरोना महामारी के दौरान खादी मास्क भी बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं।

छत्तीसगढ़ जहां के ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए छोटे-छोटे प्रयासो के जरिये बड़ी पहल की गई है। वहां कृषि को बढ़ावा देने के लिए संचालित समुदाय आधारित संवहनीय कृषि परियोजना से बड़ी संख्या में महिलाओं को जोड़ा गया है। यहां की तीन लाख 76 हजार महिलाएं खेती और पशुपालन कर रही हैं। महिलाओं को इन कार्यों में सहायता और मार्गदर्शन के लिए 4110 कृषि सखी एवं 4052 पशु सखी को प्रशिक्षित किया गया है। छत्तीसगढ़ की महिलाओं ने अपने समूह के जरिये से अब तक पांच करोड़ 65 लाख ईंटों का निर्माण किया गया है। इन ईंटों का उपयोग प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत निर्माणाधीन मकानों और विभिन्न शासकीय भवनों में किया जा रहा है। सरकार की ओर से महिलाओं को प्रोत्साहित करने स्वसहायता समूहों की महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों की बिक्री के लिए राज्य एवं जिले के मुख्य बाजारों में 125 बिहान बाजारों की स्थापना की पहल की गई है।

छत्तीसगढ़ के स्वसहायता समूहों से जुड़कर 12 लाख 31 हजार से अधिक परिवार कृषि एवं पशुपालन आधारित आजीविका गतिविधियां संचालित कर रहे हैं। वहीं 3 लाख 85 हजार से अधिक परिवार गैर कृषि आधारित लघु उद्यम आजीविका गतिविधियों से जुड़कर काम कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में आजीविका गतिविधियों को और सुदृढ़ करने के लिये एक वर्ष में रू.1400 करोड़ बैंक ऋण समूहों को उपलब्ध कराने का लक्ष्य प्रदेश सरकार द्वारा निर्धारित किया गया है। साथ ही मुख्यमंत्री ग्रामीण पथ विक्रेता योजना के अंतर्गत भी 10 हजार रूपये तक का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है।
गांधी की ग्राम स्वराज की कल्पना और आत्मनिर्भरता के सिद्धांत का पालन करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने बहुत से उपक्रम किये जा रहे हैं। यह सारे प्रयास तभी सफल होंगे जब इसे अमलीजामा पहनाने वाली सरकारी मशीनरी, सहकारिता और स्वसहायता समूह के संचालन से जुड़े लोग ईमानदारी से अपना काम करते हुए लोकल को ग्लोबल बनाने में सहयोगी बनें।