कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः फटे हुए कपड़े-सा बादल

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः फटे हुए कपड़े-सा बादल


कर के जल का दान

फटे हुए कपड़े-सा बादल

सूख रहा है आसमान में

रँग कर धरती को

अकेला-सा लगता है


फिर सूर्य-प्रभा रँग रही उसे

सातों रँगों से

रेशे-रेशे में रँग सँजोता

घुलता जाता नील गगन में

फिर छा जाने को व्याकुल-सा


उस एक अकेले बादल के पास

बैठ जाने को स्वर उत्सुक हैं

उसी में घुल जाने को

सात रँग में मिल जाने को

शब्द विकल हैं


उसी एक बादल को

सब वृक्ष हेरते रहते

पत्ते झर-झर कर 

उसी एक बादल को

रोज़ टेरते रहते


बार-बार खिलने को उत्सुक

रँगों में बसी हुई यह मृत्यु

कितनी सुंदर है

जल के दर्पण में प्रतिबिम्बित

ओझल होती छवि-सी निर्भय


किस कवि की कविता है मृत्यु?