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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - भूख है तो सब्र कर

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  - भूख है तो सब्र कर

-सुभाष मिश्र

दुष्यंत कुमार का एक पुराना शेर है जो आज भी सामयिक है
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ ।

कोरोना महामारी के चलते आज बहुत बड़े पैमाने पर गरीबों के सामने भरपेट भोजन का संकट गहरा गया है। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत 80 करोड़ लोगो को पांच किलो अनाज देने का प्रावधान किया है, राज्य सरकारों ने भी अपनी ओर से अनाज और बाकी चीजें मुहैय्या कराई है। इसके बावजूद अभी भी बहुत से लोग भूखे पेट सोने के लिए विवश है। देश के गरीब आदमी की थाली से दाल, सब्जी, पौष्टिक आहार गायब है। ऊपर से मंहगाई डायन की तरह खाये जा रही है। जिनके पास नौकरियां थी, वह छिन गई है, जो बेरोजगार थे उनके पास रोजगार नहीं है। देश में सबसे बुरा हाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का है। देश में किसानों के लंबे आंदोलन के बावजूद सरकार ने किसानों की समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया। जब से कोरोना महामारी आई है तब से देश में जिस अनुपात में मंहगाई बढ़ी है, उस अनुपात में किसानों की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य जिसे एमएसपी कहा जाता है, नहीं बढ़ा। डीजल, पेट्रोल, गैस और जरूरी सामग्री के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई किन्तु कृषि उत्पाद की कीमतें यथावत रही। लॉगडाउन के चलते बहुत से सब्जी, फल, फूल उत्पादों किसानों की फसल खेत में ही खड़े-खड़े नष्ट हो गई। छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए अपनी ओर से 2500 रुपये क्विंटल में धान खरीदा किन्तु केंद्र की ओर से धान खरीदी की एमएसपी में 4 प्रतिशत तक की वृद्धि नहीं हुई। पिछले साल 1868 रुपये प्रति क्विंटल धान खरीदा गया था। जिसे बढ़ाकर 1940 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। छत्तीसगढ़ जहां धान मुख्य पैदावार है यदि यहां छत्तीसगढ़ सरकार धान खरीदी पर अपनी ओर से किसानों को राहत नहीं देती तो उनकी हालत भी अन्य प्रदेशों के किसानों की तरह ही होती। बहुत से राज्यों में किसानों ने पिछले सालों में बड़े पैमाने पर आत्महत्या जैसा कदम उठाया। 2014 से 2018 तक 53598 किसानों ने आत्महत्या की है, यह आंकड़ा बढ़ भी सकता है। जिस तरह कोरोना में मरने वालों के आंकड़े छिपाये गए है, उसी तरह किसानों के आंकड़ों को छिपाने का काम होता रहा है। यह किसी भी लोकतांत्रिक, जनकल्याणकारी सरकार के शर्मनाक है। सरकार किसी कि भी हो वह कभी भी स्वीकार नहीं करती कि उसके राज्य में भूख से कोई मृत्यु हुई है। यदि कहीं से इस तरह की खबरें आ भी जाए तो पूरा प्रशासनिक तंत्र उसे झुठलाने में लग जाता हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने पिछले साल प्रकाशित एक रिपोर्ट में भारत में 364 मिलियन गरीब लोगों की संख्या का अनुमान लगाया था, जो कि जनसंख्या का 28 प्रतिशत है। अब, कोविड-19 महामारी, राष्ट्रीय तालाबंदी और नौकरी छूटने से पैदा हुए संकट का मतलब है कि कई और लाखों लोग गरीबों की श्रेणी में शामिल हो रहे हैं। देश में बढ़ती बेरोजगारी और कोरोना कालखण्ड में बेरोजगार हुये लाखों युवाओं को तत्काल रोजगार देने की ज़रूरत है। यह काम किसी राजनैतिक निर्णय से नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए अर्थशास्त्र के सलाहकारों से मिलकर तत्काल रणनीति बनाकर उस पर अमल करना होगा। महामारी ने शादियों के व्यवसाय से जुड़े करोड़ों लोगों का रोजगार छीन लिया। शाम को शहरों में सड़कों का लुत्फ उठाते लोगों से कमाने वाले लाखों स्ट्रीट फूड विक्रेताओं का रोजगार बन्द हो गया है। उद्योग बंद हुए तो लोगों का रोजगार छिना, साथ ही उद्योगों के आसपास के हज़ारों सहायक उद्योगों से रोजगार पाने वालों का भी धंधापानी बंद हो गया। उत्तरप्रदेश जैसे बहुत से प्रदेश में लोग भूख के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। पत्नियां पतियों को छोड़ रही हैं। यहां तक कि कई लोग भूख के कारण अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं

क्योंकि वहां खाना मिलता है। वर्तमान में लागू सभी सरकारी योजनाएं लोगों को राहत पहुंचाने के लिए नाकाफी हैं। बहुत सी योजनाएं अभी तक ठीक से लागू नहीं हो पाई हैं। दिल्ली सरकार की घर-घर राशन पहुंचाने की योजना भी फे ल हो गई लगता हैं। अपने हर काम को इवेंट बनाने वाली सरकार शायद भूख की एंट्री को दर्ज करने का कोई पोर्टल बनाने को सोच रही हो तो कोई बड़ी बात नहीं।
राशन को भी मुंह तक पंहुचाने के लिए घर-घर राशन महोत्सव जैसा कोई कदम चुनाव के पहले उठा लिया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसके पहले भी चुनाव गरीबों हटाओ, अच्छे दिन आने वाले है, शाइनिंग इंडिया जैसे नारों के भरोसे जीता गया है। चुनाव के दौरान सरकारें तो मुफ्त में सबसे पहले वैक्सिन बांटने जैसे वायदे करने से पीछे नहीं रही।

विश्व बैंक ने वैश्विक गरीबी पर कोविड-19 के प्रभाव को बताते हुए अधिक लोगों को गरीबी में धकेलने की चेतावनी दी है। यह अनुमान है कि महामारी विश्व स्तर पर कम से कम 71 मिलियन लोगों को गरीबी में धकेल देगी और सबसे खराब स्थिति में यह संख्या 100 मिलियन तक जा सकती है। विश्व बैंक के अनुसार, कोविड-19 ने दशकों में सबसे गहरी वैश्विक मंदी की शुरुआत की है। वैश्विक अर्थव्यवस्था इस साल महामारी के कारण 5.2 प्रतिशत सिकुडऩे वाली है। प्रति व्यक्ति आय में 3.6 प्रतिशत की गिरावट आने की संभावना है, जो इस वर्ष लाखों लोगों को अत्यधिक गरीबी की ओर ले जाएगी। देश के 11 राज्यों में सर्वेक्षण किए गए, लगभग 4,000 कमजोर और हाशिए पर रहने वाली आबादी में से दो-तिहाई ने कहा कि लॉकडाउन से पहले की तुलना में उनके द्वारा खाए जाने वाले भोजन की मात्रा या तो कुछ कम या बहुत कम हुई। इसमें से 28 फीसदी ने बताया कि उनके खाने की खपत काफी कम हो गई है। सर्वेक्षण की गई आबादी के एक बड़े हिस्से को भी भोजन छोडऩा पड़ा। सितंबर और अक्टूबर में, जब भूख निगरानी सर्वेक्षण किया गया था, तो 20 में से एक परिवार अक्सर बिना खाए ही सो जाता था। 56 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें तालाबंदी से पहले कभी भी भोजन छोडऩा नहीं पड़ा। लेकिन इनमें से सात में से एक को लॉकडाउन के बाद के चरण में या तो अक्सर या कभी-कभी खाना छोडऩा पड़ा। कम से कम 53 प्रतिशत ने बताया कि सितंबर-अक्टूबर में चावल, गेहूं की खपत में कमी आई है, चार में से एक के लिए, यह बहुत कम हुआ। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पीडीएस के माध्यम से 67 प्रतिशत आबादी को अत्यधिक रियायती कीमतों पर प्रति व्यक्ति प्रति माह पांच किलोग्राम अनाज की गारंटी देता है। 64 प्रतिशत लोगों ने बताया कि सितंबर-अक्टूबर में उनकी दालों की खपत में कमी आई है, सितंबर-अक्टूबर में लगभग 73 प्रतिशत ने हरी सब्जियों की खपत में कमी की सूचना दी, लगभग 38 प्रतिशत के लिए यह बहुत कम हुआ।

कोरोना महामारी के दौरान सबसे ज्यादा वे लोग प्रभावित हुए है जिनके पास राशन कार्ड नहीं था। पीडीएस के अंतर्गत प्रत्येक कार्डधारी को 10 किलो अनाज, 1.5 किलो दाल और 800 ग्राम खाना पकाने का तेल मिलने की गारंटी हैं। जिनके पास कार्ड नहीं है वे इससे वंचित रहें और जैसे-तैसे, यहां-वहां से अपना गुजारा करते रहे। देश में 9.2 लाख से ज्यादा बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, जिनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में और फिर बिहार में हैं। कोविड वैश्विक महामारी गरीब से गरीब तबके के लोगों के बीच स्वास्थ्य एवं पोषण के संकट को और बढ़ा सकती है। भारत में लगभग 189.2 मिलियन कुपोषित लोग हैं जिनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं। भारत में लगभग आधी महिलाओं, विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं में कुपोषण और एनीमिया की व्यापकता, देश की खाद्य सुरक्षा पर एक गंभीर बोझ डालती है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य के सभी बीपीएल राशन कार्ड धारकों को जुलाई से नवंबर तक चावल मुफ्त वितरण करने की घोषणा की है। सरकारें लाख इस बात के लिए आश्वसत करें कि किसी को भी भूख से नहीं मरने दिया जाएगा, किसान आत्महत्या के लिए विवश नहीं होंगे, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि खेती लाभकारी व्यवसाय के रूप में तब्दील हो। ऐसे लोग जिनके पास किसी प्रकार का कोई राशन कार्ड और सामाजिक सुरक्षा नहीं है, उन्हें भी भरपेट भोजन मिलें।