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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ये हिंसा रुकनी चाहिए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ये हिंसा रुकनी चाहिए

-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ एक बार फिर सुर्खियों में है। ये सुर्खियां नक्सलाईट हिंसा में बड़ी संख्या में मारे गये जवानों की वजह से है। अभी कुछ दिन पहले ही नक्सलवादियों ने गश्त से लौट रही जवानों के एक बस को टारगेट करके पांच जवानों को मार दिया था। अभी इन जवानों के परिवार में दुख के आंसू और मृत्यु उपरांत की रस्म भी खत्म नहीं हुई थी कि कल फिर बस्तर के बीजापुर-नारायणपुर की सीमा के समीपवर्ती गांवों में हुई मुठभेड़ में 22 जवान शहीद हो गये। 9 नक्सली भी इस मुठभेड़ में मारे गये हैं।  

नक्सली हिंसा में लगातार जवानों का मारा जाना दुखद है। नक्सली नेता एक ओर शांतिवार्ता की बात करते हैं और दूसरी ओर एम्बुश लगाकर गश्ती दल पर हमला कर रहे हैं। जितने जवान देश की सीमा की चौकसी करते शहीद नहीं हो रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा देश के भीतर नक्सली हिंसा में शहीद हो रहे हैं। नक्सली समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है इसलिए बीजापुर-सुकमा की घटना को केवल छत्तीसगढ़ से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े लोग कभी आंध्रा, कभी तेलंगाना, कभी महाराष्ट्र तो कभी उड़ीसा, झारखंड, मध्य प्रदेश, बिहार, केरल और यूपी के कुछ क्षेत्र में आवाजाही करते हैं। जब एक राज्य में ट्रेन पर दबाव बढ़ता है तो ये दूसरे राज्य की सीमा में चले जाते हैं। चूंकि, ये सभी राज्य जंगल, नदी के रास्ते, एक दूसरे से जुड़े हैं। इसी वजह से यहां से नक्सलाईट का आना-जाना आसान होता है। देश के नक्सल प्रभावित राज्यों के वे जिले जो वनाच्छादित हैं, यहां उतना विकास नहीं हुआ जितना आधुनिक तकनीक और सुविधाओं की दृष्टि से होना चाहिए था, इन सारी बातों का फायदा उठाकर नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े लोग अलग-अलग दलम के माध्यम से ग्रामीणजनों को अपना कैरियर बनाकर हिंसा को अंजाम देते हैं। अब तक की सबसे बड़ी नक्सलवादी वारदात ताड़मेटला में हुई थी जहां नक्सलियों ने 75 सुरक्षाकर्मियों को घात लगाकर हमला कर मार दिया था। इसी तरह मार्च 14 में झीरम घाटी में बहुत से बड़े नेताओं सहित 12 जवान भी शहीद हुए थे।  

छत्तीसगढ़ के नक्सल विरोधी अभियान के तहत शुक्रवार रात बीजापुर के जंगल में नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना थी। इसके बाद उसी रात बीजापुर और सुकमा जिले से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन, डीआरजी और एसटीएफ के संयुक्त दल को नक्सल विरोधी अभियान में रवाना हुए थे। जिनमें करीब 2 हजार शामिल थे। शनिवार दोपहर करीब 12 बजे बीजापुर-सुकमा जिले की सीमा पर जोनागुड़ा गांव के करीब सुरक्षाबलों की नक्सलियों से मुठभेड़ हो गई। मुठभेड़ में नक्सलियों के पीएलजीए समूह के लोग शामिल थे। यह मुठभेड़ करीब 3 घंटे से अधिक समय तक चला। जिसमें अब तक 22 जवानों के शहीद होने की सूचना है। इस घटना में 30 जवान भी घायल हो गए हैं।

बीजापुर एनकाउंटर में 22 जवानों की शहादत पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ट्वीट के जरिये संवेदना जताकर कहा है कि छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह से जूझते हुए सुरक्षाकर्मियों की हत्या गहरी पीड़ा का विषय है।

देश के गृहमंत्री अमित शाह ने मृतकों के प्रति संवेदना जताई हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों से लड़ते हुए शहीद हुए हमारे बहादुर सुरक्षाकर्मियों के बलिदान को नमन करता हूं। राष्ट्र उनकी वीरता को कभी नहीं भूलेगा। हम शांति और प्रगति के इन दुश्मनों के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बीजापुर मुठभेड़ में शहीद हुए जवानों को लेकर कहा है कि सुरक्षाबल के जवानों की शहादत बेकार नहीं जाएगी। अभी भी हमारे जवानों का मनोबल ऊंचा है। हमारे जवान नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देंगे।  उन्होंने कहा कि बीजापुर में मुठभेड़ नहीं युद्ध हुआ है, यह नक्सलियों की अंतिम लड़ाई है। सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि हमने नक्सलियों की मांद में जाकर हमला किया है। यह नक्सलियों की अंतिम लड़ाई है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सोमवार सुबह बीजापुर जाएंगे। रायपुर पुलिस लाइन से 8.30 बजे रवाना होंगे। 10 बजे पुलिस लाइन में शहीद जवानों को सलामी देंगे, जिसके बाद जगदलपुर के शौर्य भवन में बैठक लेंगे।

ठीक एक साल पहले 21 मार्च को नक्सलियों ने ऐसा ही हमला सुकमा में भी किया था। इसमें 17 जवान शहीद हो गए थे। सुकमा जिले के चिंतागुफा इलाके में डीआरजी और एसटीएफ जवान सर्चिंग पर थे। एलमागुंडा के आसपास नक्सलियों के मौजूद होने की सूचना मिली थी। कोरजागुड़ा पहाड़ी के पास छिपे नक्सलियों ने चारों ओर से जवानों पर गोलियों की बौछार कर दी। जवानों ने भी जवाबी फायरिंग की, जिसके बाद नक्सली जंगल के अंदर भाग निकले थे। नक्सली चूंकि बस्तर के अंदरुनी इलाके से पूरी तरह से वाकिफ हैं और उन्हें मालूम है कि सर्च पार्टी को किस तरह अपने जाल में फंसाकर घेरना है इसलिए हर बार वे ऐसा जाल बिछाते हैं कि पुलिस गश्ती दल, मुठभेड़ के लिए गये जवान अधिक संख्या में होते हुए भी नक्सली हिंसा के शिकार हो जाते हैं।

बस्तर के वारजोन विशेषज्ञों के अनुसार, जोनागुड़ा का एक इलाका गुरिल्लावार जोन के अंतर्गत आता है। इसमें गुरिल्लावार अर्थात छिपकर हमले की रणनीति ही कारगर होती है। यहां कभी भी एक साथ फोर्स नहीं जाती, छोटी-छोटी टुकडिय़ों में जाती है लेकिन सभी फोर्स को इनपुट मिल रहे थे कि नक्सली यहां है, लिहाजा एक के बाद एक फोर्स की टुकडिय़ां यहां पहुंचती रही। पहले से  शेप में घात लगाकर बैठे नक्सली इसी इंतजार में थे। फोर्स जैसे ही इस जोन में बड़ी संख्या में घुसी एंबुश में फंस गई। नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग की मुठभेड़ करीब तीन घंटे चली। नक्सली ऊपरी इलाकों थे, फोर्स के एंट्रेंस पर नजर रखे हुए थे, लिहाजा उन्होंने फौज का बड़ा नुकसान किया। कुछ जवानों ने यहां से लगे गांव की ओर पोजिशन के लिए वहां जाने की कोशिश की, लेकिन नक्सलियों ने वहां भी उनका पीछा कर फायरिंग की। नक्सली हमला कर हथियार, सामान लूटते गए और पीछे जंगलों में भागते गए।

नक्सली हमले और कोरोना की दिन-प्रतिदिन भयावह होती स्थिति को लेकर राजनैतिक दल एक दूसरे पर हमला करने से नहीं चूक रहे हैं जबकि सभी जानते हैं कि ये दोनों स्थितियों से निपटने के लिए केन्द्र-राज्य सभी का आपस में समन्वय जरुरी है। चाहे विश्वव्यापी बीमारी कोरोना हो या बढ़ती आतंकवादी घटनाएं या नक्सली वारदात। इन सब पर किसी एक राज्य या केन्द्र की सरकार अकेले नियंत्रण नहीं कर सकता। वहीं दूसरी तरफ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के नेता, कुछ बुद्घिजीवी अफसर, व्यापारी, नक्सलियों के लिए कैशियर का काम करेंगे और अपना स्वार्थ सिद्घ करते रहेंगे तो यह समस्या यूं ही हल नहीं होगी। हम हर घटना के बाद घडिय़ाली आंसू बहाने की औपचारिकताओं का निर्वाह करते रह जायेंगे।