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सुरताः घानी मुनी बोर दे पानी दमोर दे -सुशील भोले

सुरताः  घानी मुनी बोर दे पानी दमोर दे  -सुशील भोले


  छत्तीसगढ़ म सांस्कृतिक मंच के जय घोष करइया 'चंदैनी गोंदा' के ए गीत ल तब आकाशवाणी आदि के माध्यम ले अबड़ सुनन. रविशंकर शुक्ला जी बरसा के माध्यम ले हमर देश म सुख अउ समृद्धि के कामना करत कहंय- 

घानी मुनी बोर दे पानी दमोर दे

हमर भारत देस ल भइया दही दूध म बोर दे

दुगना तिगुना उपजय धान

बाढ़े खेत अउर खलिहान

देस म फइले भूखमरी ल, संगी तंय झकझोर दे...

  देश ल दूध दही म बोरे के कल्पना कवि के अतिशयोक्ति हो सकथे, फेर तब हमन पानी म चोरो-बोरो बूड़त ए धरती ल जरूर देखे हावन. हफ्ता दस दिन के झड़ी तो सहज राहय. कभू-कभू पंदरही घलो सुरुज नरायन के दरस नइ हो पावत रिहिसे. तब नरवा-नंदिया म पूरा घलो वइसने आवय, जेला बइहा पूरा अउ उड़ेरा पूरा आदि के नांव के चिन्हारी करे जाय. खंड़ भर पूरा अवई ह तो तब सहज राहय. जहाँ एकाद-दू सरवर पानी गिरतीस, तहांले नंदिया-नरवा उमे ले धर लेवय. 

   अब अइसन नजारा मन के देखई ह दुरलभ होगे हे. जब बरसच ह वइसन नइ होवय, त पूरा घलो कहाँ ले वइसन आही? आज के लइका मन तो झड़ी काला कहिथे? पूरा अउ बइहा पूरा का होथे, उड़ेरा पूरा कइसन रार मचाथे, तेकरो बारे म सुने नइ होही.

   अभी छत्तीसगढ़ म मौसम विभाग के आंकड़ा ल पतियाईन त 120 ले 125 से. मी. तक बरसा हो जाथे. इहाँ सबले कम बरसा मैकल पर्वत श्रेणी के तीर-तखार माने राजनांदगाँव अउ कवर्धा जिला म होथे अइसे बताए जाथे. उहें भानुप्रतापपुर अउ जशपुर जिला मन म सबले जादा बरसा होथे अइसे बताए जाथे. हमर इहाँ के अबूझमाड़ क्षेत्र ल बरसा के मामला म छत्तीसगढ़ के चेरापूंजी घलो कहे जाथे.

   पहिली इहाँ अतेक बरसा होवय, त अब काबर नइ हो पावय? ए विषय ह गुने अउ वोला फेर पहिली जइसन बेरा म लेगे के उदिम करई के होना चाही. एकर सबले बड़का कारन जेन आज जगजग ले दिखथे, तेन ह तो पर्यावरण के दुर्दशा ह चकचक ले देखब म आथे. पर्यावरण ह दुरगत बिगड़े असन दिखही त मौसम के हाल घलो वइसनेच दिखही. 

  अपने तीर-तखार ल देखव, कतका रूख-राई अउ तरिया नंदिया राहय. अउ अब चारों मुड़ा पटपर भांठा अउ सुक्खा सुक्खा भुइयां नजर आथे. छत्तीसगढ़ राज्य के कुल क्षेत्रफल 1,35,191 वर्ग किलोमीटर हे, जेकर कुल 59,772 वर्ग किलोमीटर म जंगल हे. ए ह सरकारी आंकड़ा के मुताबिक हे ना. माने कुल भौगोलिक क्षेत्र के 44.21 प्रतिशत भाग म जंगल हे. 

   का ए आंकड़ा ह आप मनला भरोसा करे असन लागथे? चारों मुड़ा के जंगल मन म घुसरिहव त असलियत के पता चलथे. पक्की सड़क के तीरे-तीर तो मार हरियर हरियर ऊंच ऊंच रूख-राई दिख जाही. फेर जिहां सड़क ल छोड़ के सौ दू सौ फीट भीतर घुसरव त जंगल के असलियत दिखे लगथे. चारों मुड़ा के रूख मन के ठुड़गा ह उंकर मन के अंधाधुंध हत्या करे के गोहार पारत नजर आथे.

   ए दृश्य ह सिरिफ जंगल मन के नहीं, भलुक हमर मन के चातर राज के खेत-खार अउ नान्हे नान्हे झबड़ी मन ल देखव, सब के एके गति दिखही. त भला बतावव अइसन म बरसा के पहिली जइसन रूप कइसे देखे म आही?

   ए समस्या ह सिरिफ हमर छत्तीसगढ़ या भारत भर के नहीं, भलुक पूरा दुनिया के आय. पूरा दुनिया म पर्यावरण के राही छंड़ाए जावत हे. इही सबला देख के सन् 1972 म संयुक्त राष्ट्र संघ ह स्टाकहोम (स्वीडन) म पहला विश्व पर्यावरण सम्मेलन आयोजित करिस, जेमा कुल 119 देश मन वोमा जुरियाए रिहिन. उही सम्मेलन म 5 जून के हर बछर पर्यावरण दिवस मनाए के निर्णय लिए गिस. हमर देश के तब के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ह 'पर्यावरण के बिगड़त स्थिति अउ वोकर विश्व के भविष्य ऊपर प्रभाव' विषय ऊपर अपन विचार रखे रिहिन हें. तभेच ले हमर देश म 5 जून के पर्यावरण दिवस मनाए जाथे. 

  एकर खातिर 19 नवंबर 1986 के पर्यावरण संरक्षण अधिनियम घलो लागू करे गिस, जेमा पानी, हवा अउ जमीन ए तीनों ले संबंधित जम्मो जिनिस के संरक्षण संवर्धन के उदिम करना आय.

   आप सब देखत हव, ए अधिनियम के कतका अकन पालन भुइयां म देखे बर मिलथे? हर बछर 5 जून के सरकारी अउ गैर सरकारी कतकों आयोजन होथे. लोगन वृक्षारोपण के संगे-संग अउ कतकों उदिम करथें. चारों मुड़ा के पेपर अउ मीडिया मन एकरे ले भरे रहिथे. फेर जइसे ए दिन पहाथे, वोकर बाद साल भर तक का हाल होथे? एला जादा फोरियाए के जरूरत नइए.

   संगी हो, जब तक हम ए पर्यावरण संरक्षण के बुता ल सिरिफ देखावा या नेंग छूटे के रूप म करत रहिबो तब तक अपन इहाँ के वो बरखा के जुन्ना रूप अउ वोकर माध्यम ले होवत जम्मो किसम के समृद्धि अउ बढ़वार ल नइ देखे सकन. एकर बर जरूरी हे, के हम ए बुता ल मिशन के रूप म करिन, तभे वो जुन्ना बेरा के दर्शन फेर हो पाही.

धरती दाई गोहरावत हे हरिया दव फेर कोरा

आगी ढिलहू जंगल म त तुंहरोच परही फोरा

देख मौसम के चाल बिगड़गे तुंहरे करनी आय

ठन-ठन भुइयां म लहुटगे सुग्घर धान कटोरा