क्या ये लोग कर पाएंगे कोरोना के डर के बिना सारे काम

क्या ये लोग कर पाएंगे कोरोना के डर के बिना सारे काम

महेश झा

कोरोना का कहर दुनिया भर में जारी है. भारत सहित बहुत से देशों में राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन है. कोरोना वायरस का फिलहाल कहीं कोई अंत नहीं दिखता. लेकिन कामकाज फिर से शुरू हो सकता है. जानिए कैसे.

कोरोना से लोग संक्रमित हो रहे हैं, बीमार हो रहे हैं और मर भी रहे हैं. ये आंकड़े हर जगह प्रकाशित हो रहे हैं, लेकिन संक्रमण के बाद जो लोग ठीक हो जा रहे हैं, उनकी बात कोई नहीं कर रहा है. वे लोग जिन्हें कोविड 19 था, वे बीमार थे, अब ठीक हैं और अब वायरस के लिए इम्यून हो गए हैं. उन्हें कोरोना फिलहाल दोबारा बीमार नहीं करेगा. ऐसे लोग सामान्य जनजीवन को वापस पटरी पर लाने के प्रयासों में बहुत मूल्यवान साबित हो सकते हैं.

जर्मन समाचार पत्रिका डेय श्पीगेल के अनुसार इस समय जर्मनी में एक ऐसे सर्वे की तैयारी चल रही है जिससे पता चल सके कितने लोगों को कोरोना वायरस लगा, वे हल्के बीमार हुए, लेकिन उन्हें बीमारी का पता ही नहीं चला. रिसर्चरों का मानना है कि 80 प्रतिशत मामलों में कोरोना का प्रकोप बहुत हल्का होता है. मौसम बदलने के समय होने वाले फ्लू की तरह, गले में थोड़ा दर्द, खांसी, हल्की झुरझुरी या बुखार, कभी कभी तो कोई लक्षण ही दिखाई नहीं देता. आम तौर पर युवा लोगों पर इसका असर मामूली होता है. हो सकता है कि बहुत से लोगों को संक्रमण हुआ लेकिन उन्हें इसका पता नहीं चला.

बड़े सर्वे की योजना 

इस सर्वे में रॉबर्ट कॉख संस्थान, संक्रमण शोध संस्थान और बर्लिन के वायरलॉजी संस्थान सहित जर्मनी के कई संस्थान शामिल होंगे. इसके लिए अप्रैल से 100,000 लोगों का ब्लड सैंपल लेने की योजना है जिसमें कोविड 19 विरोधी एंटीबॉडी की जांच की जाएगी. इस टेस्ट के जरिए महामारी के फैलने पर भी नजर रखी जा सकेगी. इस व्यापक सर्वे से पता चल सकेगा कि महामारी के फैसले की गति क्या है और कितने लोगों की जान जा रही है. अप्रैल के अंत तक सर्वे के नतीजे आने की संभावना है. सर्वे के नतीजे स्कूलों को खोलने या बड़े आयोजनों की अनुमति देने के फैसले को आसान बनाएंगे.

जर्मनी के प्रमुख संक्रमण विशेषज्ञ क्रिस्टियान ड्रॉस्टेन का कहना है, "यदि सर्दियों तक जर्मनी में 1 करोड़ से डेढ़ करोड़ लोग संक्रमित होते हैं, तो फिर हमारे यहां एंटीबॉडी वाले भी बहुत से लोग होंगे." उनमें बहुत से डॉक्टर और नर्स भी होंगे जो बिना किसी मास्क के काम कर पाएंगे. हालांकि इस बात का खतरा है कि कोरोना का वायरस अपना रूप बदल सकता है और आने वाले समय में उसका म्यूटेशन हो सकता है, लेकिन संक्रमण विशेषज्ञों का मानना है कि एंटीबॉडी वाले लोग कुछ सालों तक इम्यून रहेंगे. जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के अनुसार 28 मार्च को 12 बजे तक जर्मनी में 53,340 लोग संक्रमित हुए हैं और इनमें से 6932 लोग ठीक हो चुके हैं.

एंटीबॉडी टेस्ट

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 6 लाख से ज्यादा लोग संक्रमण का शिकार हुए हैं जबकि 133,000 लोग ठीक हो चुके हैं. ये संख्या बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन बहुत से लोगों को टेस्ट भी नहीं किया गया है. जर्मनी में हर हफ्ते करीब 300,000 टेस्ट किए जाते हैं, लेकिन वायरस के प्रसार को देखते हुए सरकार इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह पर्याप्त नहीं है. वायरस का शिकार होने वालों की सही जानकारी के लिए भरोसेमंद टेस्ट की जरूरत होगी. फ्रांकफुर्टर अलगेमाइने साइटुंग अखबार के अनुसार वायरलॉजिस्ट फ्लोरियान क्रामर की टीम ने खून में एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए एक टेस्ट डेवलप किया है, लेकिन बड़े पैमाने पर उसके उत्पादन के लिए उसकी दूसरी प्रयोगशालाओं में भी पुष्टि जरूरी है.

जब यह पता चल जाएगा कि कितने और कौन से लोग कोरोना इम्यून हैं, फिर उन्हें हर उस जगह पर काम पर लगाया जा सकेगा, जहां इंसानी संपर्क के बिना काम नहीं चलता. आम जीवन के लिए जरूरी दुकानों में लोग अभी काम कर रहे हैं, लेकिन डर डर कर. साथ ही इस समय जर्मनी में फसल कटने का मौसम है, लेकिन किसान परेशान हैं क्योंकि उन्हें काम करने वाले लोग नहीं मिल रहे हैं. इसके अलावा वायरस से इम्यून लोग चिकित्सा सेवा में भी डॉक्टरों और नर्सों की मदद कर पाएंगे.