सच्चाई कितनी बदल गयी होगी इसका अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता

सच्चाई कितनी बदल गयी होगी इसका अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता

अशोक वाजपेयी

काल की अप्रत्याशित छाया में जीवन थम गया है. हर तरफ़ शांति है. पक्षियों तक की आवाज़ें कम हैं. ठंडी हवा है पर नज़र में याने दृश्य में, लोग नहीं हैं. अपनी कष्टदायी उपस्थिति के बावजूद यह अनुपस्थिति का समय है. दूसरे लगभग अनुपस्थित हैं, कम से कम भौतिक रूप से. वे हैं पर स्मृति में, कल्पना में, फ़ोन पर बतियाते-दिखते हुए. पर पास नहीं हैं. हम निर्जन में रह रहे हैं. हम भी हैं इस पर कभी-कभी संदेह होता है. घरबंदी तरह-तरह की बेचैनी उपजा रही है. मित्रों, परिजनों, हज़ारों की संख्या में घर लौटते मजबूर निस्सहाय लोगों की चिन्ता सताती है. पर स्वयं हर हालत में सुरक्षित रहने की नीच इच्छा अधिक कुछ करने से रोकती है. अपनी और अपने परिवार की चिंता तक चिंता का मानवीय भूगोल सिमट गया है. अप्रत्याशित की आशंका हर दम घेरे है, भले जो होगा उस पर हमारा कोई वश नहीं है.

उम्मीद घर में क़ैद है और उसे भी यह भरोसा नहीं कि वह उम्मीद है. घर की सच्चाई बाहर की विशाल सच्चाई से बहुत छोटी है. पर बड़ी सच्चाई बहुत दूर चली गयी लगती है. बंद सच्चाई ही सच्चाई लगती है. सपना देखने से मन घबराता है. हर छोटा-बड़ा सपना यकायक संदिग्ध हो गया है. इस दौर के ख़त्म होने के बाद सच्चाई कितनी बदल गयी होगी इसका अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता. जब सच्चाई ही इतनी अकल्पनीय है तो सपने की क्या स्थिति होगी?

सामुदायिकता, परस्पर व्यवहार, प्रकृति के साथ संबंध, आर्थिक व्यवस्था, राजनीति, धर्म आदि सब बदल जायेंगे? उनमें से कितने घायल होकर बदलेंगे और कितने ज्यों का त्यों रहकर बदल जाने का छद्म करेंगे यह नहीं पता. यह भी, फिलवक़्त, नहीं कहा जा सकता कि हमारे निजी और सामाजिक कर्म कितने रूपांतरित हो जायेंगे. इतना तय है कि हम वही नहीं रह पायेंगे और दुनिया को देखने-समझने की हमारी दृष्टि और विधि में परिवर्तन होगा. इस समय जब सभी कुछ संदेह के घेरे में है, यह कहना भी कठिन है कि जो रचेगा वही बचेगा. हो सकता है बचना रचने को पूरी तरह व्यर्थ कर दे या कि उनमें कोई संबंध ही न रह जाये.

इस समय खुली धूप है और सब कुछ साफ़ नज़र आ रहा है पर मन की धुंध हटती नहीं है. इस अनसुन हाहाकार में इतनी धवल शांति कैसे और क्यों है? हमसे अभी शब्द छीने तो नहीं गये हैं पर उनके इस्तेमाल में इतने सारे संकोच कैसे आड़े आ गये हैं? दिन में भी ऐसे वक्फ़े आते हैं जब कोई आवाज़ नहीं होती, न कोई शब्द, न कोई हरकत. सिर्फ़ बाहर से आ रहा धूप का उजाला और घर का अपना अंधेरा. हम निर्जन में हैं. सब चुप हैं, सब लाचार हैं, सब, फिर भी, निपट और सहज, मानवीय हैं. हैं यही क्या कम है?

नान्त में इन्दराज़

आज से लगभग आठ बरस पहले कुछ दिनों के लिए फ्रांस के नान्त शहर में था. उस समय डायरी में कुछ इन्दराज़ किये थे जो आज मिल गये. सो पेश हैं:

संगीत में कोई जगह क्या खोजी या तामीर की जाती है? क्या स्वर हमेशा किसी जगह की तलाश में रहते हैं जहां वे रह-रम या रह सकें? जहां उन्हें, थोड़ी देर के लिए सही, राहत या ठहरने का ठौर मिल सके?

संगीत अकसर हमें अपनी भौतिक जगह से अलग कहीं ले जाता है. यह अलग जगह, जब तक संगीत चलता है, तब तक होती है और फिर स्मृति में ही रह जाती है. इस जगह की सच्चाई किन्हीं पदार्थों पर पदार्थमय संसार पर निर्भर नहीं होती. यह तो पदार्थमयता का अतिक्रमण करके ही पायी या रची जाती है.


क्या कोई जगह होती है भौतिक संसार से परे जहां संगीत हमें ले जाता है? या कि वह जगह संगीत ही रचता है और वह उसके समापन के साथ, लगभग क्रूरता से, ग़ायब हो जाती है.

संगीत यह जगह स्वरों के माध्यम से, उनके संयोग-वियोग से, उसकी संगत-विसंगति से खोजता-रचता है. यह जगह आवाज़ों से बनी-रची जगह होती है. ज़रूरी नहीं कि उसमें हमारा पार्थिव संसार झलके या अनुगूंजे ही. संगीत इस सच्चाई का साक्ष्य और सत्यापन है कि हम इस पार्थिव संसार में रहते हुए उससे स्वतंत्र-मुक्त-स्वायत्त एक दूसरा संसार रच सकते हैं. वह हमें अपने पार्थिव संसार में वापस जाने से नहीं रोकता. शायद उसके अनुभव से हमें अपनी पार्थिवता, उसकी निपट पदार्थमयता अधिक सह्य लगने लगती है.

कई बार लगता है कि जैसे सारी कविता अन्ततः प्रार्थना होती है, वैसे ही सारा संगीत विलाप. पर दोनों ही प्रथमतः संसार का गुणगान. जो संसार से अपार अनुराग न करे उससे न कविता कुछ कह सकती है, न संगीत उसके लिए कोई अर्थ रखेगा.

प्रार्थना दिये गये संसार से बेहतर, वैकल्पिक, अधिक सुन्दर, अधिक न्यायसंगत संसार के लिए. विलाप व्यतीत होते संसार की भंगुरता, उसके उदात्त सौन्दर्य, वैभव और लालित्य के लिए.

दैनंदिन जीवन में हम पहले क्या अधिक सुघर और कल्पनाशील थे? क्या उसमें सुंदरता देख और रच पाने की हमारी इच्छा और क्षमता में कमी आयी है? हमारे आस-पास सब कुछ ज़्यादा साफ़-सुथरा है पर हमें सुंदर क्यों नहीं लगता! क्या सीधे-सादे रोज़मर्रा के जीवन में अब सुंदर नहीं बचा? क्या हमने उसे वहां रचना, तलाश करना छोड़ दिया? क्या सुंदर हमें वहां नीरस-उबाऊ बनाकर चला गया?

ऐसा क्यों लगता है कि हम एक ओछे समय में रह रहे हैं. सब कुछ बड़ा हो रहा है, विराट् के आयाम में जा रहा है पर आदमी छोटा हो रहा है? साहित्य और कलाओं में, विचार में जो कुछ श्रेष्ठ है वह हमसे पहले कहीं हो चुका! क्या हमारे हिस्से श्रेष्ठता का सिर्फ़ मरणोत्तर जीवन हो आया है?

जीवन की सार्थकता के जो सामाजिक पैमाने हैं उनसे बिलकुल अलग निजी पैमाने भी हो सकते हैं. जिनका जीवन सामाजिक दृष्टि से व्यर्थ पर निरर्थक माना जाता है, हो सकता है उन्हें वह अपने ढंग से सार्थक लगता हो. सार्थकता के क्षेत्र में भी निजी और सामाजिक का द्वन्द्व और द्वैत होता है.

कविता अगर मेरे याने कवि के जीवन को कुछ सार्थकता दे लेकिन और के जीवन को नहीं तो भी क्या वह सार्थक मानी जा सकती है? कितना जीवन कविता में अन्तर्ध्वनित हो कि वह सार्थक मानी जाये? कविता का अपना जीवन क्या उसके व्यापक जीवन से संबंध की सघनता और प्रगाढ़ता पर निर्भर करता है?

जिसके पास एक भी उत्तर न हो उसे कितने और कब तक प्रश्न पूछने का अधिकार है? क्या प्रश्न पूछना उत्तर पाने का आरम्भ है, हर बार?