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नक्सली वर्दी और हथियारों के आकर्षण से युवाओं को संगठन में करते हैं शामिल

 नक्सली वर्दी और हथियारों के आकर्षण से युवाओं को संगठन में करते हैं शामिल

जगदलपुर ।  नक्सली ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीण युवाओं को अपने साथ बंदूक उठाकर लडऩे के लिए कैसे तैयार करते हैं? इसे लेकर अनुसंधानकर्ता डॉ.गिरीशकांत पांडे की अगुवाई में वर्ष 2018 में आत्मसमर्पित 25 नक्सलिायों के साक्षत्कार से उन्हे यह पता लगा था कि नक्सली दो हथकंडों को अपनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले युवाओं को लडऩे के लिए उकसाते हैं। पिछड़े ग्रामीण इलाकों के युवाओं को लुभाने के लिए नक्सली अपनी विचारधारा का नहीं बल्कि अपनी काली वर्दी और अपने हथियारों का प्रयोग करते हैं।
अनुसंधानकर्ताओं से प्राप्त जानकारी के अनुसार नक्सल संगठन में 12-13 वर्षों तक काम करने के बाद आत्मसमर्पित 25 नक्सलियों के साक्षात्कार से चौंकाने वाली बात यह थी कि इन सभी आत्मसमर्पित 25 नक्सलियों को इतने वर्षों में कभी भी नक्सली विचारधारा समझ ही नहीं आई थी, उक्त आत्मसमर्पित नक्सली यह बता नही सके कि आखिर उन्होंने क्यों इस प्रतिबंधित नक्सली संगठन का दामन थामा था।
उल्लेखनिय है कि डॉ. गिरीशकांत पांडे ने सन् 1990 के शुरुआती दशक में बढ़ते नक्सल चरमपंथ पर पीएचडी की है। इनके रिसर्च में यह बात सामने आई थी कि लगभग 33 प्रतिशत नक्सली सरकार की आत्मसर्मपण नीति से प्रभावित हुए थे। वहीं 13 प्रतिशत नक्सली ऐसे थे जो अपने से उपर के नक्सली नेता की तरफ से हो रहे शोषण से परेशान थे। एक अन्य अनुसंधानकर्ता तोरण सिंह ठाकुर केअनुसार जिन नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया उनके अनुसार नक्सली वर्ष 2011-2012 से युवाओं को आकर्षित करने और उनकी भर्ती करने में असफल रहे, इस वजह से नक्सली संगठन सदस्यों की कमी से जूझ रहे हैं।