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‘हर्बल कलर’ कितना सुरक्षित है?

‘हर्बल कलर’ कितना सुरक्षित है?


होली आने पर हमेशा की तरह बाजार में रंगों की बिक्री जोरों पर है. इस बार सामान्य रंगों के साथ ‘ऑर्गेनिक’ और ‘हर्बल’ रंगों की बाढ़ आई हुई है. इन्हें त्वचा के लिए सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है. हाल के सालों में ये रंग अलग-अलग कैमिकलों से बनने वाले सिंथेटिक (कृत्रिम) रंगों के विकल्प के रूप में सामने आए हैं.

लेकिन त्वचा विशेषज्ञों का कहना है कि यह जरूरी नहीं है कि जो ‘हर्बल’ गुलाल आप खरीदें वह जहरीले कैमिकल से मुक्त हो. आम लोगों को ये रंग अन्य सामान्य रंगों जैसे ही दिखते हैं. वहीं, बाजार में इनकी कीमत सिंथेटिक रंगों से तीन गुना महंगी होती है. ऐसे में ग्राहक केवल इस नाम पर इन्हें खरीद लेते हैं कि ये ऑर्गेनिक हैं, जबकि उन्हें पता ही नहीं कि वे क्या ले रहे हैं. ऐसे में जानकार इन कथित हर्बल रंगों को टेस्ट किए जाने के बाद ही खरीदने की सलाह देते हैं.

बाजार में जितने भी हर्बल रंग उपलब्ध हैं, उनमें से कुछ ही ब्रांडेड हैं. ज्यादातर दुकानदारों को इन रंगों के हर्बल होने की प्रामाणिकता से कोई मतलब नहीं होता. ऐसे में लोगों के लिए अच्छा यही है कि वे किसी प्रतिष्ठित दुकान या बाजार से इन्हें खरीदें. खुले में बिक रहे हर्बल रंगों से बचना चाहिए.

 एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में होली का सामान बेचने वाले एक दुकानदार ने बताया, ‘हर्बल कलर लोगों में लोकप्रिय हो गए हैं. हमने धीरे-धीरे इनकी सप्लाई बढ़ा दी है. लेकिन ये देखने में बिलकुल कृत्रिम रंगों जैसे होते हैं. हम इन्हें सदर बाजार से उठाते हैं. (लेकिन) ये नहीं पता कि ये कितने हर्बल हैं.’

वहीं, कुछ कमियां ग्राहकों में भी हैं. उनके लिए रंगों की कीमत उनके स्वास्थ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है. बाजार में कई लोगों को हर्बल पैकेटों के दाम कम कराने की कोशिश करते देखा जा सकता है. ऐसा नहीं होने पर वे सस्ते बनावटी रंग ही खरीद लेते हैं. होली के मौके पर दुकान लगाने वाले अजय कुमार कहते हैं कि इस त्योहार पर होने वाला 95 प्रतिशत व्यापार कृत्रिम रंगों पर निर्भर है. उन्होंने कहा, ‘हर्बल रंगों की कीमत दो से तीन गुना ज्यादा है. होली पर कोई वैसे भी ज्यादा नहीं सोचता. लोग पानी और कीचड़ का भी इस्तेमाल कर लेते हैं.’

वहीं, ऑर्गेनिक रंग बनाने वाले एक एनजीओ ‘सोसायटी ऑफ चाइल्ड डेवेलपमेंट’ की सदस्य मधुमिता पुरी कहती हैं कि 100-200 रुपये की कीमत में एक किलो हर्बल कलर बनाना संभव नहीं है. मधुमिता ने बताया कि उनके एनजीओ द्वारा बनाए गए रंग 600 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर बिकते हैं. उन्होंने बताया कि रंग तैयार करने के लिए मंदिरों से फूल इकट्ठा किए जाते हैं. उसके बाद उनसे अलग-अलग रंग निकाले जाते हैं.

इन रंगों और सिंथेटिक रंगों में कैसे फर्क करें, यह समझाते हुए मधुमिता कहती हैं, ‘ऑर्गेनिक रंगों की चमक सिंथेटिक रंगों से कम होती है. गुलाब के फूलों से बनने वाला रंग गुलाबी होगा, चमकदार लाल नहीं. हम इन रंगों को बनाने के लिए मंदिरों से लाए गए पीले और केसरिया गेंदे के फूल इस्तेमाल करते हैं. वहीं, पत्तियां सूखने के बाद हरा रंग देती हैं.’

जानकार सिंथेटिक रंगों को लेकर सावधान रहने की बात कहते हैं. वे बताते हैं कि इनमें सीसा, क्रोमियम, कैडमियम, जिंक और आयरन जैसे खतरनाक पदार्थ मिलाए जाते हैं. गुलाल में इन पदार्थों की मौजदूगी जानने के लिए हाल में ‘टॉक्सिक्स लिंक’ नामक एनजीओ ने आईआईटी कानपुर में होली पर मिलने वाले कुछ नीले और लाल रंगों का परीक्षण कराया था. इसमें पता चला कि लाल रंग में पारा मिलाया गया था जो तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है. वहीं, नीले रंग के नमूने में तांबा मिला जो आंखों, त्वचा, श्वसन प्रणाली और लीवर के लिए हानिकारक है. इसके अलावा सिंथेटिक रंगों में सिलिका और ऐजबेस्टस जैसे कैमिकल भी मिले हो सकते हैं जो एक वक्त के बाद शरीर में कैंसर पैदा कर सकते हैं.