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विनोद कुमार शुक्ल के जन्मदिन पर विशेष: विनोद जी लोकल फॉर ग्लोबल के नहीं, लोकल विथ ग्लोबल के कवि हैं

विनोद कुमार शुक्ल के जन्मदिन पर विशेष: विनोद जी लोकल फॉर ग्लोबल के नहीं, लोकल विथ ग्लोबल के कवि हैं

सुभाष मिश्र
आज विश्व व्यापी बीमारी कोरोना के दौरान जब हमारे देश में जोर-शोर से लोकल फॉर ग्लोबल की बातें हो रही हैं, ऐसे समय में हमारे बीच का एक कवि लोकल विथ ग्लोबल के विचार के साथ ना केवल मौजूद है बल्कि अपने लिखे से हमें ग्लोबल भी बना रहा है। आज ही के दिन 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे और रायपुर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले कवि, उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल था आज जन्मदिन है। विनोदजी दीर्धायु हों और उनका लिखा, कहा हमें और हमारी दुनिया को ज्यादा संवेदनशील बनाता रहे। कोरोना संक्रमण से बचे रहने के लिए  भले ही वे घर की सीमा में बंघे हुए हों किन्तु उनकी चिंता में कभी भी केवल उनका अपना घर नही रहा। वे समूची पृथ्वी को अपना घर मानते हैं और कविता के जरिया कहते हैं -
जाते जाते पलटकर देखना चाहिए
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से पृथ्वी
तब घर में बच्चे क्या करते होंगे की याद
पृथ्वी में बच्चे क्या करते होंगे की होगी घर में अन्न जल होगा कि नही की चिंता
पृथ्वी पर अन्न जल की चिंता होगी
पृथ्वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होगा
और पृथ्वी की तरफ लौटना घर की तरफ लौटने जैसा।

विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ के एक गऱीब मज़दूर मंगलू के मंगल की कामना करते हुए उसके बहाने सम्पूर्ण पृथ्वी के मंगल की कामना करते हैं। मंगलू उनकी कविता में इस तरह छत्तीसगढ़ का ही नहीं, सारी दुनिया के वंचित समुदाय का एक प्रतिनिधि चरित्र बन जाता है। उनके यहाँ मंगलू तुम्हारा मंगल हो जैसा मामूली-सा वाक्य व्यापक धरातल पर विश्वमंगल के स्वस्ति-पाठ में बदल जाता है। छत्तीसगढ़ की आत्मा उनके यहाँ पूरे वैभव और गरिमा के साथ प्रकट होती है। वे लोकल फ़ॉर ग्लोबल के नहीं, लोकल विथ ग्लोबल के कवि हैं जो स्थानीयता और वैश्विकता के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं खींचते।
वैश्विक पूंजी के प्रचण्ड वेग में जब श्रम की स्थानीयता को बाज़ार की वैश्विकता में तिरोहित कर दिये जाने का आह्वान किया जा रहा हो, विनोद कुमार शुक्ल वैश्विक अपील के साथ स्थानीयता और मेहनतकश जनता के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के अप्रतिम कवि और विरल कोटि के कथाकार हैं। उनकी साहित्य में एक तरफ़ छतीसगढ़ अपने खुरदरे-खरे रूपरंग, कठिन संघर्ष से जूझते लोकजीवन के यथार्थ और समूचे  सांस्कृतिक सत्त्व के साथ उपस्थित है, दूसरी तरफ़ उनके रचना-संसार की एक और खिड़की विश्व-मानवता की मार्मिक पीड़ा और उसके प्रति गहरी संवेदना की ओर खुलती है। उनका साहित्य अपनी गहराई  में स्थानीय, लेकिन अपने विस्तार में वैश्विक है। यह विलक्षण गुण है। ज़ाहिर है, उनके साहित्य की जड़ें छत्तीसगढ़ की भूमि पर बहुत गहरे तक फैली हैं और अखिल मानवता के आकाश में बाँहें फैलाये मज़बूती के साथ वे खड़े दिखाई देते हैं। इसलिए वे रायपुर-बिलासपुर संभाग-जैसी विलक्षण कविता लिख पाते हैं, जिसमें दोनों संभाग उनकी किसान-जैसी नजऱ में बैलजोड़ी की तरह जान पड़ते हैं। यह कविता खाने-कमाने के लिये परदेस जाने को मजबूर छत्तीसगढ़ के गरीब मज़दूरों के जीवन की  व्यथा को अत्यंत मार्मिक ढंग से रेखांकित करती है।
पिछले तीन दशकों में जो आर्थिक परिवर्तन हुए हैं और उसके फलस्वरूप जो नयी दुनिया बन रही है, उसमें बिना शोरशराबा किये वे चुपचाप हस्तक्षेप करते हैं और बड़े संदर्भों को पकड़ते हैं। इसलिए वे कहने का साहस भी करते हैं कि सबसे बड़ा डॉक्टर सबसे गऱीब आदमी का इलाज करे और फ़ीस माँगने से डरे। वैश्वीकरण के दौर में महँगी शिक्षा और महँगी चिकित्सा तक पहुँचने में नाकाम  सामान्य जन के पक्ष में इससे ज़्यादा मार्मिक अपील और क्या होगी। जब दैत्याकार शोर  और रोशनी के भयावह सैलाब के बीच इंसान की महीन आवाज़ सुनाई नहीं देती और चकाचौंध में सच दिखाई नहीं देता, विनोद कुमार शुक्ल का कवि हताश होकर बैठे आदमी की ओर हाथ बढ़ाता है, उसे वह जानता नहीं मगर उसकी हताशा को जानता है। कवि का सच पूंजी की चकाचौंध के बीच हताश व्यक्ति के सच को पहचान कर उसके साथ चलने को जानता है।
अक्सर मंच  पर बोलने से परहेज करने वाले विनोदजी से सुप्रसिध्द व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने पहली बार जबलपुर में एक कालेज के मंच पर सबके सामने कविता पढ़वाई ।
कविता सुनने के बाद परसाईजी ने क्या कहा , पूछने पर विनोदजी कहते हैं कि परसाईजी ने कहा तुम्हारी कविता समझ में नही आती। तुम्हारी कविता हमारे समय की कविता नही है , बाद के समय की कविता है। परसाईजी एकदम सही थे। विनोदजी की कविता को किसी समय काल में नही बांधा जा सकता ।इसी तरह वे अपनी पहली कविता के प्रकाशन का श्रेय गजानन माधव मुक्तिबोध को देते हैं । वे कहते हैं की मुक्तिबोधजी की वजह से पहली बार मेरे जैसे नये कवि की कविता कृति में प्रकाशित हुई।
दृश्य में ही सोचकर लिखने वाले कवि विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं की बचपन की स्मृतियाँ कभी नही जाती । हर बीता पल स्मृति है । बचपन की स्मृति खज़़ाने की तरह होती है। हमारी स्मृति में बसी पुन: नव-पल्लव आने की अनिवार्यता हमें निराश नहीं होने देती.
विनोद कुमार शुक्ल प्रेम और प्रकृति के कवि हैं. वे सीधे सरल शब्दों में जादुई बातें कहने के ऐसे माहिर हैं, जो नदी, पहाड़, घाटी से लेकर सबसे गरीब आदमी को अपनी कविता में समेट लेते हैं.
सादगी पसंद विनोद कुमार शुक्ल का मानना है की जीवन को ईमानदार और कामकाजी होना चाहिए. अपनी जरूरत को इस तरह कम करे कि वातावरण से बाजार को कम किया जा सके, साथ ही साथ बाजार की सोच को भी. प्रकृति को जस का तस छोड़ देना चाहिए. प्रकृति को नष्ट करने का समय तत्काल समाप्त होना चाहिए और उसे जितना प्राकृतिक बनाया जा सके, बनाया जाना चाहिए. विकास की जो अवधारणा है, उसमें मनुष्य की प्रजाति का नष्ट होना अंतिम परिणाम है.।
विनोद जी की एक कविता है -
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
 मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।

विनोदजी कहते हैं की मैं हर उस व्यक्ति के साथ हूं, जो हाशिये पर है और जिंदगी के सबसे निचले पायदानों पर धकेल दिया गया है. जो सभी बुनियादी सुखों और अधिकारों से वंचित है. वे जीवन और उसके पीछे छुपी हुई संवेदना के कवि हैं, जो अपनी बसावट में आस्तिक हैं. उनकी यह संवेदना और यह पक्ष उनकी कविताओं में मुखर होता है ।
विनोद जी अपनी कविता में कहते हैं
सबके हिस्से का आकाश, पूरा आकाश है।
सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।
सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।
अपने हिस्से की भूख के साथ सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात।

कविता और गद्य की अभिव्यक्ति के लिए व्याकरण का अतिक्रमण करने वाले और एक जिद की तरह अपने लिए एक अलग शिल्प और भाषा गढऩे वाले वे ऐसे कवि हैं, जिन्हें पढऩे का एक धीरज भरा सलीका चाहिए और यह भी कि उन्हें पढ़ते हुए आपके और उनकी कविता के अलावा पूरा एकांत हो.
विनोद जी  का पहला कविता-संग्रह लगभग जयहिंद 1971 में प्रकाशित हुआ था. तबसे उनकी काव्य यात्रा निरंतर जारी है। वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह, सब कुछ होना बचा रहेगा और कविता से लंबी कविता उनके अन्य कविता संग्रह हैं। उपन्यासकार के रूप में उनके उपन्यास नौकर की कमीज़, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में एक खिड़की रहती थी हैं, जो काफी चर्चित हैं उनका एक कहानियों का संग्रह पेड़ पर कमरा भी है। कविता और उपन्यास लेखन के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके विनोद कुमार शुक्ल को उपन्यास दीवार में एक खिड़की रहती थी के लिए 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है. विनोद जी का लेखन निरंतर जारी है। वे बच्चों के लिए कविताएं लिख रहे हैं- हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ , यासि रास्ता, एक चुप्पी जगह आदि।
विनोद जी का काव्य संसार बिना किसी दिखावे, छलावे, भुलावे से दूर अपनी राह का खुद निर्माण करती है और निर्भय होकर अकेले चलने की हिम्मत देती है। वे मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंधों के साझा सौंदर्य के साथ मनुष्य की निजी विधा की बात करते हुए दुनिया को नष्ट करने वाले के लिए कहते हैं यह चेतावनी है-
यह चेतावनी है
मैं बचा हूं।/ किसी होने वाले युद्ध से
जीवित बच निकलकर/ मैं अपनी
अहमियत से मरना चाहता हूं/ कि मरने के
आखिरी क्षणों तक / अनंतकाल जीने की कामना करूं / कि चार फूल हैं / और दुनिया है।