breaking news New

छत्तीसगढ़ हबीब तनवीर से कब उऋण होगा?

छत्तीसगढ़ हबीब तनवीर से कब उऋण होगा?

सुभाष मिश्र

हबीब तनवीर इस नाम से हर वो शख्स परिचित होगा जो छत्तीसगढ़ से परिचित है, यहां की लोककला, लोकनाट्य और लोकजीवन से परिचित है। आज जब लोकल से ग्लोबल की बात हो रही है तब हबीब तनवीर ही वो शख्सियत थे जिसने छत्तीसगढ़ी को लोकल रहते हुए भी ना केवल ग्लोबल बनाया बल्कि अपनी निर्देशिकीय क्षमता के जरिए नया थियेटर की ऐसी ब्रांडिंग की है कि आज भी दुनिया में उनके नाटकों का परचम फहराता है। एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना से बहुत पहले 13 अगस्त 1982 को एडिनबरा अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में छत्तीसगढ़ के चरणदास चोर ने पूरी दुनिया को छत्तीसगढ़ दिखाया था। छत्तीसगढ़ी में मंचित इस नाटक को देखकर हॉल में बैठे सभी दर्शकों ने उठकर बहुत देर तालियां बजाई। दरअसल छत्तीसगढ़ का परचम उसी दिन सारी दुनिया की कला संस्कृति के आकाश में फहर गया था। एक चोर ने नाम कमाया सच बोलकर, ये गीत लोगों की जुबान पर उसी समय से चढ़ा हुआ है जो आज तक उतरने का नाम नहीं ले रहा है। हबीब तनवीर ने अपनी बौद्घिक समझ और नाटकों के जरिए जो नाम कमाया, मुकाम हासिल किया, उसकी दूसरी मिसाल देखने नहीं मिलती। 

रायपुर के लॉरी स्कूल यानी सप्रे स्कूल से हबीब तनवीर ने अपनी रंगयात्रा शेक्सपियर के नाटक किंग जॉन के एक अंश में पहली बार अभिनेता के रुप में शुरु की थी। उसके बाद लॉरी सप्रे स्कूल के वार्षिक समारोह में दुरे यतीम उर्फ पॉलिश वाला में अभिनय किया। रायपुर में एक सितम्बर 1923 को जन्मे बहीह तनवीर दिल से शायर और दिमाग से मानवतावादी थे। वे दरअसल किसी पार्टी से, किसी वोट दिलाने वाली जमात से नहीं जुड़े थे इसलिए रायपुर में, छत्तीसगढ़ में ना तो उनके नाम से कोई यूनिवर्सिटी बनी ना कोई आडिटोरियम। उनकी प्रतिमा लगाना तो दूर उनके रायपुर स्थित बैजनाथपारा वाला मकान को भी किसी तरह का कोई संग्रहालय बनाने की पहल तक नहीं हुई। पद्मश्री, पद्मभूषण, राज्यसभा सदस्य हबीब साहब। ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ के रंगकर्मियों ने आपके नाम पर आडिटोरियम, थियेटर, विश्वविद्यालय, शोधपीठ बनाने की, नाट्य समारोह आयोजित करने की मांग ना की हो। सरकारें हमें पहले सी आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाते आ रही हैं इसलिए हमने भी सोचा कौन सरकार के भरोसे रहे। जैसे देश के प्रवासी मजदूर अपने पांवों पर भरोसा करके निकल पड़े, वैसे ही हम रंगकर्मी भी जो सरकारी असहयोग के चलते पहले से ही आत्मनिर्भर थे, आपको साथ लेकर हर साल 8 जून को आपकी पुण्यतिथि पर और 1 सितम्बर को आपके जन्मदिवस पर आपको अपने अपने तरीके से याद करते हैं। वैसे आप तो तब भी प्रेक्षागृह के किसी कोने सिगार पीते मौजूद होते हों, जब हम किसीनाटक का मंचन कर रहे होते हैं। 

मुंबई में 25 मई, 1943 को इप्टा के पहले सम्मेलन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए हिरेन्द्र मुखर्जी ने कहा था, लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटक लेखक आओ, हाथ और दिमाग से काम करने वाले आओ और स्वयं को आजादी और सामाजिक न्याय की नई दुनिया के निर्माण के लिए समर्पित कर दो। हबीब तनवीर उन प्रारंभिक लोगों में से एक थे, जिन्होंने इप्टा से अलग होकर नया थिएटर की स्थापना की। अपनी जीवनसंगिनी मोनिका मिश्रा का साथ लेकर उन्होंने थिएटर को ही अपनी दुनिया बना लिया। रायपुर से नागपुर के मौरिस कॉलेज की यात्रा करते हुए हबीब तनवीर दिल्ली, मुंबई, लंदन होकर आए। किंतु उन्हें नेम, फेम और अपने होने की सार्थकता छत्तीसगढ़ की माटी से जुड़कर ही मिली। हबीब तनवीर लोकल होते हुए भी ग्लोबल थे। हबीब तनवीर को 1970 में संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार मिला। उन्होंने 1973 में छत्तीगढ़ के कलाकारों के साथ मिलकर गांव के नाम ससुराल और मोर नाम दामाद की प्रस्तुति की।  

हबीब तनवीर ने अपने संस्मरणों में लिखा है : दुख की बात है कि मराठी गोवा में कोंकणी के साथ वैसा ही अन्याय कर रहे हैं जैसा कि हिंदी में हमारे खारी बोली नेता अन्य बोलियों के साथ कर रहे हैं। यह भेदभाव केवल इन दो भाषाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वास्तव में बंगाली, मलयालम, तेलुगु, तमिल, गुजराती, हर जगह व्यापक है। यह शहरी भद्रलोक और देहाती, मानक और घटिया, शहरवासियों और ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों और अशिक्षितों, महान और छोटी परंपराओं के बीच का संघर्ष है। मूर्खतापूर्ण बात यह है कि उच्च भाषण के समर्थकों को यह एहसास नहीं है कि वे भाषाई आत्महत्या कर रहे हैं। खड़ी बोली हिंदी का झरना कहां है? यह तुलसीदास, कबीर, सूरदास, मीराबाई और विद्यापति के साथ है- उनके कार्यों ने खड़ी बोली को जीवन दिया है। वे कभी भी शब्दों, कहावतों, मुहावरों से भरे हुए हैं जो हिंदी को गंभीरता से समृद्ध कर सकते हैं। मैंने इस संघर्ष को बहुत करीब से देखा है क्योंकि इन पदानुक्रमों के कारण हमारे नया थिएटर को बहुत नुकसान हुआ है। 

कई मायनों में नया थिएटर एक वन-मैन शो था, जो अपनी ताकत, रचनात्मक और अन्यथा, उनके बीच के हरफनमौला खिलाई हबीब तनवीर से प्राप्त करता था, कवि, अभिनेता, नाटककार, निर्देशक, गायक, सेट डिजाइनर और एक सक्षम प्रशासक बूट करने के लिए। उनके पास बहुत सारी प्रतिभाएं थी वह हर चीज के साथ पैदा हुए थे। उनमें मस्तिष्क बुद्धि, कवि का हृदय और संवेदनशीलता, अभिनय गायन, रंगमंच और चित्रकला की प्रतिभा थी। और वह सुंदर भी था, एक लेडी किलर।

हबीब तनवीर ने एक बार कहा था। यह नाटक मेरे थिएटर यात्रा में एक मील के पत्थर की तरह था और इस नाटक ने मुझे अपने अगले प्रोडक्शन चरणदास चोर को रास्ता देने में भी मदद की। 

गांव नाम ससुराल, मोर नाम दमाद, पहली बार 1973 में हबीब तनवीर द्वारा निर्देशित, एक हल्की कॉमेडी और लोक कथा है। कहानी फसल के मौसम के त्योहार छेर-छेरा से शुरू होती है और दो युवाओं झंगलू और मंती के प्यार के इर्द-गिर्द घूमती है।

1965 में तनवीर ने चरणदास चोर को लिखा और निर्देशित किया, जिसमें उन्हें 1982 में एडिनबर्ग उत्सव में एक पुरस्कार दिलाया। विजयदान देथा द्वारा एक शास्त्रीय राजस्थानी लोककथा का रूपांतरण, एक चोर, चरण और एक मूर्ख के जीवन पर आधारित है। 

हबीब तनवीर की गायिका, अभिनेत्री बेटी नगीन तनवीर के शब्दों में  कहूं तो कई मायनों में, नया थिएटर एक वन-मैन शो था, जो अपनी ताकत, रचनात्मक और अन्यथा, उनके बीच के हरफनमौला खिलाड़ी हबीब तनवीर से प्राप्त करता था। कवि, अभिनेता, नाटककार, निर्देशक, गायक, सेट डिजाइनर, और एक सक्षम प्रशासक बूट करने के लिए। उनके पास बहुत सारी प्रतिभाएं थीं, वह हर चीज के साथ पैदा हुए थे। उनमें मस्तिष्क बुद्धि, कवि का हृदय और संवेदनशीलता, अभिनय गायन, रंगमंच और चित्रकला की प्रतिभा थी। और वह सुंदर भी था, एक लेडी किलर।

हबीब तनवीर ने अपने संस्मरणों में लिखा है: दुख की बात है कि मराठी गोवा में कोंकणी के साथ वैसा ही अन्याय कर रहे हैं जैसा कि हिंदी में हमारे खारी बोली नेता अन्य बोलियों के साथ कर रहे हैं। यह भेदभाव केवल इन दो भाषाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वास्तव में बंगाली, मलयालम, तेलुगु, तमिल, गुजराती, हर जगह व्यापक है। यह शहरी भद्रलोक और देहाती, मानक और घटिया, शहरवासियों और ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों और अशिक्षितों, महान और छोटी परंपराओं के बीच का संघर्ष है। मूर्खतापूर्ण बात यह है कि 'Óउच्च भाषण'Ó के समर्थकों को यह एहसास नहीं है कि वे भाषाई आत्महत्या कर रहे हैं। खड़ी बोली हिंदी का झरना कहाँ है? यह तुलसीदास, कबीर, सूरदास, मीराबाई और विद्यापति के साथ है- उनके कार्यों ने खड़ी बोली को जीवन दिया है। वे अभी भी शब्दों, कहावतों, मुहावरों से भरे हुए हैं जो हिंदी को गंभीरता से समृद्ध कर सकते हैं। मैंने इस संघर्ष को बहुत करीब से देखा है क्योंकि इन पदानुक्रमों के कारण हमारे नया थिएटर को बहुत नुकसान हुआ है।