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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -ये किस तरह के शौर्य का प्रदर्शन है?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -ये किस तरह के शौर्य का प्रदर्शन है?


मथुरा-काशी से लेकर शांति का टापू समझे जाने वाले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कुछ मोहल्लों में, कबीरधाम कहे जाने वाले कवर्धा की फिजाओं में मजहबी पारा ऊफान पर है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद हिन्दू-मुस्लिम के बीच बढ़ी वैमनस्यता की खाई जो न्यायालयिन निर्णय के बाद रामलला मंदिर के निर्माण से जो शांति का माहौल निर्मित हुआ था, उसे अब मथुरा-काशी के नाम पर गरमाया जा रहा है। शौर्य दिवस के बहाने यह कवायद नियोजित तरीके से प्रारंभ हो गई है।

19वीं सदी में कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम का गोला कहा था, लेकिन 21 वीं सदी में धर्म सियासत का सबसे बड़ा हथियार बनते जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर में धार्मिक कट्टरता ने बेहद खौफनाक रूप धारण कर लिया है। भारत जैसे विभिन्नता वाले देश ने इसकी बहुत मार झेली है। यहां आम आदमी की बड़ी से बड़ी समस्या पर धार्मिक कट्टरता भारी पडऩे लगी है। देश में इस सियासत ने अब तक मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम को जमकर इस्तेमाल किया, लेकिन अब जिस तरह संकेत मिल रहे हैं लगता है कि अब बारी दुनिया को गीता का दर्शन बताने वाले श्रीकृष्ण की है। जी हां देश एक बार फिर बड़े चुनावों के मुहाने पर खड़ा है। 2022 से शुरू होने वाले ये सिलसिला 2024 में होने वाले आम चुनाव तक जाएगा। जब-जब देश में चुनावी बादल छाते हैं तब-तब धर्म से जुड़ा कोई न कोई मुद्दा बाहर निकल आता है।  

हाल के दिनों में खुले आम और सोशल मीडिया पर उठ रही आवाजों से अंदाजा लग रहा है कि अयोध्या के बाद अब मथुरा के नाम पर वोट मांगा जा सकता है। यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक ट्वीट कर कहा है कि, अयोध्या और काशी में भव्य मंदिरों का विकास जारी है, मथुरा के लिए तैयारी है। अखिल भारत हिंदू महासभा द्वारा शाही ईदगाह मस्जिद में कृष्ण की मूर्ति स्थापित करने की अपनी योजना की घोषणा के बाद मथुरा जिले ने 28 नवंबर से निषेधाज्ञा लागू कर दी गई। महासभा का दावा है कि यह देवता का वास्तविक जन्म स्थान है। फिलहाल महासभा ने अपनी योजना वापस ले ली है, पर इस क्षेत्र को रेड जोन घोषित किया गया है। उत्तर प्रदेश के मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को आगे आना चाहिए और मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि पर सुरक्षित भवन (सफेद संरचना) हिंदुओं को सौंपना चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां अदालत ने अयोध्या मुद्दे का समाधान किया है, वहीं काशी और मथुरा में सफेद संरचनाएं हिंदुओं को आहत करती हैं। उन्होंने कहा कि 6 दिसंबर (1992) को कारसेवकों ने रामलला पर धब्बा हटा दिया था और अब वहां भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। भाजपा सांसद रवींद्र कुशवाहा ने कहा है कि अगर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार तीन कृषि कानूनों को निरस्त कर सकती है, तो वह पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को भी वापस ले सकती है, जिससे एक भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा।

अयोध्या के विवादित ढांचा विध्वंस को 6 दिसंबर 2021 को 29 वर्ष हो गए हैं। इस दिन पर हर वर्ष हिंदू संगठन शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं। शौर्य दिवस के मौके पर हिंदू संगठनों ने शाही मस्जिद पर जाकर जल अभिषेक करने की घोषणा की थी। इस मामले में राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी महंत सत्येंद्र दास ने कहा है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी के दिन 6 दिसंबर को मथुरा में श्रीकृष्ण का मुद्दा उठाना, दो महीनों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव के तहत भाजपा की राजनीति का हिस्सा है।

एक समय था जब भाजपा ने अयोध्या के मसले को खूब भुनाया, एक लंबे समय तक वोट कमाने का माध्यम बनाया। जब यह मसला पुराना होने लगा और लोग ऊबने लगे तो अयोध्या मसले का निराकरण कर दिया गया और वाहवाही भी लूटी, चुनाव के लिए आधार भूमि भी बनाई। यहीं से भाजपा को लगा कि हिंदुओं में हिंदू धर्म की भावना उभारने के बजाय राजनीतिक हिंदुत्व की भावना को भड़काया जाए। यहीं से कट्टर हिंदुत्व का रास्ता साफ हुआ।
भाजपा को यह स्पष्ट हो गया कि हिंदू-मुस्लिम के बीच फैले वैमनस्य के संशय और संदेह को एक स्थाई शत्रुता में बदल कर ही राजनीतिक सफलता लंबे समय तक हासिल की जा सकती है। इस शत्रुता में हिंदुओं के मन में असुरक्षा का भय बोया गया। भय, असुरक्षा और शत्रुता को धार्मिक उन्माद में बदलने के लिए अयोध्या के बाद उनके पास मथुरा और काशी ही अगला टारगेट था। बहुसंख्यक हिंदुओं को उत्तेजित और उन्मादित बनाए रखने के लिए भाजपा के हाथ एक सूत्र आ गया है, एक फार्मूला आ गया है।

यह अपनी जगह सच है कि मुस्लिम वोटों का मोह पूरी तरह छोड़कर हिंदू वोट पर केंद्रित करके भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की है। इस बात को कांग्रेस जल्दी समझ नहीं पाई और अब समझने के बावजूद उनके पास बहुसंख्यक हिंदू वोट के लिए कोई विकल्प नहीं है। कांग्रेस बहुसंख्यक वोटर को लेकर संशय में है। अब मथुरा और काशी को उत्तर प्रदेश के चुनाव और 2024 के चुनाव के लिए वोट की राजनीति की आधार भूमि बनाया जा रहा है। ये सारी कवायद उसी की है।
धार्मिक कट्टरता की आग सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, इसकी जद में देश के वो हिस्से भी आ रहे हैं जो अपनी शांति और भाईचारे के लिए जाने जाते हैं। कुछ दिनों पहले इसी उन्माद में त्रिपुरा झुलसा था, तो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की हवा में भी इसका जहर अब महसूस होता जान पड़ रहा है। धार्मिक कट्टरपंथ और पाखंड के खिलाफ सबसे ज्यादा खुलकर कहने वाले संत कबीर की नगरी में पिछले दिनों जो हुआ, वो छत्तीसगढ़ की परंपरा नहीं है। कबीरधाम को बदनाम करने वाले ये लोग कौन हैं, ये जानना बहुत जरूरी है।

अभी कवर्धा में हालात पूरी तरह सामान्य हुए नहीं कि रायपुर के एक इलाके में इसी तरह धार्मिक उपद्रव मचने की बात सामने आई है। एका-एक राज्य में धर्मांतरण एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरता है और प्रदेश के तमाम दूसरे मुद्दों पर हावी हो जाता है। ऐसे में सोचना लाजिमी है कि आखिर कौन बो रहा है ये नफरत के बीज।

देखा जाए तो सांप्रदायिक वैमनस्य, मानवाधिकारों पर हमला, धार्मिक कट्टरता और उग्र-राष्ट्रवाद के लक्षण चुनावों की समयावधि के आसपास ज्यादा सघन होने लगते हैं। वे जैसे मतदाता को प्रभावित करने और उस पर शिकंजा कसने की तैयारियां हैं। कई विचारकों ने इसे इलेक्टोरल फासिज्म कहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या मतदाता या आम जन इतने निरीह और नासमझ होते हैं कि इस प्रोपेगंडा में फंस जाते हैं?

धार्मिक कट्टरपंथ की आग में दुनिया के कई देश तबाह हो चुके हैं। आज लेबनान, सिरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे देश इसकी बड़ी कीमत चुका रहे हैं। अयोग्य राजनीतिक सोच ने आज इन देशों को गहरे संकट में डाल रखा है। ऐसे में हमें इस पर बार-बार सोचने की जरूरत है। देश की आबो हवा बिगाडऩे वालों को लेकर हमें सतर्क रहने की जरूरत है।

भले ही इस देश में समस्याओं को सभी धर्म के लोग बराबरी से बांटते हैं, इस देश की कामयाबी में सभी का सर उठ जाता है, फिर चुनाव के वक्त ही क्यों आपस में बंटने लगते हैं। इस पर मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने लिखा है-
ये देखकर अब परिंदे भी हैरान हैं
कि अब छतें भी हिंदू-मुसलमान है।