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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या किया

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या किया

- सुभाष मिश्र

लम्बे समय के आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री द्वारा तीन कृषि कानून को वापस लेने की बात परमिर्जा ग़ालिब का शेर याद आता है। ...
की मेरे क़त्ल के बाद उस ने जफॉ से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना।

मोदी जी ने प्रकाश पर्व पर सुबह-सुबह टीवी पर तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि हमने किसानों समझाने की बहुत कोशिश पर वह नहीं समझे। यह कानून उनके हित में था। मोदी जी की बात सुनकर ये कहने का मन करता है की... बहुत देर कर दी मेहरबाँ आते-आते। लोग सोशल मीडिया के जरिए तरह-तरह के सवाल पूछ रहे हैं। कृषि कानून लाये सरकार ने वापस लिए क्योंकि मोदी जी किसानों को समझाने में विफल रहे, मगर ये समझ नहीं आया कि जब एक भी बार मोदी जी ने किसानों से बात ही नहीं की तो फिर समझाने में विफल कब हुए!!! गुरुनानक जयंती के दिन को भी सरकारी इवेंट, राजनैतिक लाभ और पंजाब चुनाव की तैयारियों में बदलने के लिये आपदा में अवसर है कृषि कानूनों की वापसी।

एक साल से अधिक चलें किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए बहुत सारे सियासी दांव-पेंच का इस्तेमाल किया गया, पर सब नाकाम रहे। इस आंदोनल में बहुत से आंदोलनकारी किसानों ने अपनी जान गवाई, तब भी सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ था, पर अब पंजाब, उत्तर प्रदेश और बाकी कई राज्यों के चुनाव सर पर है तो अब अचानक मज़बूरी में सही पर गुरुपर्व के मौके पर उदारता दिखातें हुए यह फैसला लिया गया। किसानों के पक्ष में सरकार की और से लिए गए इस फैसले के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि किसान अब वापस लौट जाएं, अपने खेतों में काम करें। दरअसल ये किसानों की जीत है जो साल भर से धूप, बारिश और उत्तर की कड़कड़ाती ठंड में सड़को पर बैठे है, जिन्हें तमाम साजिशों और सत्ता के हथकंडों के बावजूद डिगे नहीं, ये 700 सौ किसानों की शहादत का असर है।

कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले के दौरान प्रधानमंत्री मोदी जी को यह कहना पड़ा की हमारी ही तपस्या में शायद कोई कमी रह गई। मैं किसानों से क्षमा माँगता हूं कि मैं किसानों को इतनी पवित्र बात नहीं समझा पाया।

मोदी सरकार को अंतत: तीनों कृषि कानून वापस लेना पड़ा। सवाल यहां उन परिवारों का है जिन्होने अपना बेटा, पति, भाई, घर में कमाई करने वाले लोगों को खोया है? प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उनके लिए संवेदना के दो शब्द भी नहीं बोले। उन्होने इतने बड़े किसान आंदोलन को लेकर भी कुछ नहीं कहा।

लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा के बाद उत्तरप्रदेश की भाजपा सरकार पर हमले तेज होने लगे। सरकार ने ताबड़तोड़ पीडि़त किसानों के परिवारों को 45-45 लाख रुपये का मुआवजा, सरकारी नौकरी, घायलों को दस-दस लाख रुपये तथा घटना की न्यायिक जांच तथा घटना के लिए दोषी केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के बेटे के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए है। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बीजेपी नेता अजय कुमार मिश्रा के बेटे को गिरफ्तार किया गया।

किसान नेताओं ने पीएम मोदी के तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि जब तक सदन में इस घोषणा पर कार्यवाही नहीं होती है तब तक यह कोशिश पूरी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि इससे हमारे किसानों की समस्या हल नहीं होगी। किसानों के लिए हमारा आंदोलन जारी है और जारी रहेगा। 26 नवबंर को किसान आंदोलन का एक साल पूरा हो रहा है, उस दिन पूरे देश में लाखों किसान रास्तों पर उतरेंगे। अभी आधी मांग पूरी हुई है।  

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि किसान जीते और मोदी का अहंकार हार गया। यह उन किसानों की जीत है जो एक साल से अधिक समय से चीन-पाक समर्थक आतंकवादी कहे जाने का विरोध कर रहे थे। हम सभी जानते हैं कि खेती-किसानी वैसे ही कभी भी लाभकारी व्यवसाय नहीं रहा, ऊपर से जिस मंडी के सहारे किसान को अपनी फसल बेचने के लिए आश्रय मिलता था, अब वो कृषि उपज मंडियां भी केन्द्र सरकार द्वारा लाये गये अध्यादेश के बाद अप्रत्यक्ष रूप से बड़े व्यापारियों के हाथों में जाने का डर किसानों को सता रहा था। कोरोना काल में ताबड़तोड़ तरीके से किसानों की असहाय स्थिति के बीच लाये गये इस विधेयक का किसान उस तरह से विरोध दर्ज नहीं करा पा रहे हैं, जैसा की भूमि अधिग्रहण सुधार अधिनियम का विरोध हुआ था।

देश के किसानों को अपनी ऊपज का, अधिसूचित कृषि मंडियों के बाहर, किसी अन्य स्थान पर बाधा मुक्त व्यापार करने की सुविधा प्रदान करने के लिए, सरकार ने दो अध्यादेशों को अधिसूचित किया है। मोदी सरकार ने किसानों को लाभ देने और कृषि क्षेत्र में बदलाव के लिए 14 सितंबर 2020 को तीन अध्यादेशों को बदलने के लिए जिन तीन विधेयक को पास करवाया है, उनमें पहला कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 दूसरा कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 और तीसरा आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020।

वर्तमान में देश में सात हज़ार एपीएमसी की मंडियां हैं और तकऱीबन 42000 मंडियों की ज़रूरत है। केन्द्र की मोदी सरकार ने गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के नाम पर प्राइवेटाईजेशन को बढ़ावा दिया है। हमारे देश का किसान इस तरह से संगठित होकर इतने बड़े आंदोलन के लिए नहीं उतरा जितना इस बार दिखा। असल बात यह है की किसान उस तरह से संगठित नहीं है, जैसे किसी जाति-संप्रदाय, धर्म से जुड़े लोग संगठित होते हैं। यही वजह है कि हमारा किसान हर बार ठगा जाता है। कृषि उपज मंडी, समर्थन मूल्य, कर्ज माफी के बावजूद किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। किसानों की बेहतरी के नाम पर ताबड़तोड़ तरीके से लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्तुत और पारित बिलों को लेकर जहां राज्यसभा से 8 सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित किया गया है, वहीं बहुत से किसान संगठन संसद से सड़क तक की लड़ाई पर उतर आये थे। किसानों के बीच यह भय व्याप्त हो गया की बिल से मंडी व्यवस्था खत्म हो जायेगी। निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा। मंडी के बाहर व्यापारी किसानों से उसके उत्पाद को औने-पौने दाम पर खरीदेंगे। कोई भी व्यापारी कभी भी तीन दिन के भीतर किसान को भुगतान नहीं करेगा। व्यापारी किसानों के उत्पाद को अपने पैसे के बूते पर जमाखोरी करेगा। किसानों का मानना है कि व्यापारी टैक्स बचाने के लिये खरीदी के मामले में हेराफेरी करेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन बिल को किसानों को नये अधिकार देने वाला बताते हुए इसे 21वींसदी के भारत की जरूरत बताया था, जिसे उन्हें वापस लेना पड़ा। उन्होंने उस समय कहा था कि यह बदलाव किसान और कृषि उपज मंडियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि देश के उन ताकतवर गिरोह से किसानों को छुटकारा दिलाने के लिए है, जो अब तक उनको मजबूरी का फायदा उठाते रहे हैं। अब मोदी जी इन किसानों को ताकतवर गिरोह कहने कि हिम्मत शायद ही कर पायें, क्योंकि आने वाले समय में यहीं किसान चुनाव में हार-जीत का फैसला करेंगे। मजबूरी में ही सही प्रधानमंत्री को वह क्रांतिकारी बिल जिसकी तारीफ के पुल बांधते वे थक नहीं रहे थे, वापस लेने के लिए विवश होना पड़ा। किसानों ने महात्मा गांधी के बताये अहिंसा आंदोलन की परपंरा का विस्तार करके पूरे देश को अपनी मांगों के लिए लडऩे की नई ताकत दी है।
इस पूरे मामलें को लेकर फैज़ अहमद फैज़ का यह शेर प्रसंगवश याद आता है ...

यूँ ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से ख़ल्क
न ही उनकली रस्म नई है न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये है हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई ।।