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संतान को संस्कारित न करने वाले पालक शत्रु समान - महंत सुदर्शन शरण जी महराज

संतान को संस्कारित न करने वाले पालक शत्रु समान - महंत सुदर्शन शरण जी महराज

रायपुर। महामाया देवी मंदिर सत्संग भवन में आज श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में राजा परीक्षित की कथा सुनाते हुये महंत सुदर्शन शरण जी महराज ने कहा कि एक दिन राजा परीक्षित शिकार पर जा रहे थे कि रास्ते में उन्हें एक व्यक्ति हाथ में डंडा लिए बैल और गाय को पीटते हुए दिखा।

उस बैल के एक पैर था और गाय कामधेनु दिख रही थी। राजा ने अपना रथ रुकवाया और क्रोधित होकर उस व्यक्ति से पूछा- ‘तू कौन अधर्मी है, जो निरीह गाय और बैल पर अत्याचार कर रहा है। तेरा कृत्य ही ऐसा है कि तुझे मृत्युदंड मिलना चाहिए।’

राजा परीक्षित की बात सुनकर कलियुग डर से कांपने लगा। इस पर राजा ने बैल से पूछा- हे देव आपके तीन पैर कहां हैं? आप बैल हैं या कोई देवता हैं? बैल ने कुछ न कहते हुए भी सबकुछ कह दिया और बैल के वचन सुनकर राजा ने कलियुग का वध करने के लिए अपनी तलवार निकाल ली।

इस पर कलियुग त्राहि-त्राहि करते हुए राजा पीक्षित के पैरों में गिर गया। राजा अपनी शरण में आए हुए व्यक्ति की हत्या नहीं करते थे। तो उन्होंने कलियुग को जीवन दान दिया।

राजा परीक्षित बहुत ज्ञानी भी थे। वह चंद शब्दों से बैल के रूप में धर्म और गाय के रूप में धरती मां को पहचान गए थे। कलियुग को जीवनदान देने के बाद राजा परीक्षित ने कहा- कलियुग, तू ही पाप, झूठ,चोरी, कपट और दरिद्रता का करण तू ही है।

तू मेरी शरण में आया तो मैंने तूझे जीवनदान दिया। अब मेरे राज्य की सीमाओं से दूर निकल जा और कभी लौटकर मत आना। इस पर कलियुग गिड़गिड़ाते हुए विनती करने लगा- महाराज आपका राज्य तो संपूर्ण पृथ्वी पर है। मैं आपकी शरण में आया हूं तो मुझे रहने का स्थान भी आप ही दीजिए।

कलियुग की विनती स्वीकार करते हुए राजा परीक्षित ने उसे रहने के लिए जुआ, मदिरा, परस्त्रीगमन और हिंसा जैसी चार जगह दे दीं। इस पर कलियुग ने विनती की- राजन! ये चारों जगह मेरे लिए पर्याप्त नहीं है, आप एक और स्थान मुझे दीजिए।

इस पर राजा ने उसे सोने अर्थात स्वर्ण में रहने की अनुमति दे दी और शिकार के लिए आगे बढ़ गए। कलियुग को स्थान देते समय राजा यह भूल गए कि उन्होंने सिर पर सोने का ही मुकुट पहना है।

राजा से स्थान मिलते ही कलियुग तब तो वहां से चला गया। लेकिन थोड़ी देर बाद सूक्ष्म रूप में वापस आया और राजा के मुकुट में बैठ गया। शिकार के रास्ते में राजा को प्यास लगी तो वह शमिक ऋषि के आश्रम में चले गए। उस समय शमिक ऋषि ध्यान में लीन थे और राजा द्वारा पानी मांगे जाने पर भी उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। इस पर राजा के मुकुट में बैठे कलियुग ने अपना असर दिखाया और राजा के मन में ऋषि को मृत्युदंड देने का विचार आया।

किन्तु अच्छे संस्कारों के कारण उन्होंने ऐसा करने से खुद को रोक लिया। लेकिन कलियुग के बुरे प्रभाव के कारण उनकी मति भ्रष्ट हो गई और उन्होंने एक मरा हुआ सांप शमिक ऋषि के गले में डाल दिया। पृथ्वी के किसी मनुष्य पर कलियुग का यह पहला प्रभाव था और उसने सबसे संस्कारी राजा को ही अपना शिकार बनाया।

जब शमिक ऋषि के पुत्र श्रृंगी स्नान करके लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके पिता समाधि में बैठे हैं और उनके गले में मरा हुआ सांप पड़ा है। यह देखकर वह बहुत क्रोधित हुए और पता करने पर उन्हें एक राजा द्वारा यह कृत्य करने के बारे में पता चला। इस पर उन्हों ने शाप दिया कि अगले सात दिनों के अंदर राजा की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से होगी।

जब शमिक ऋषि का ध्यान पूरा हुआ और उन्हें इस बारे में पता चला तब उन्होंने राजा के पास सूचना भिजवा दी। ताकि वह पूरी सतर्कता बरतें। इस पर राजा ने अपने आपको मृत्यु के लिए पूरी तरह तैयार कर लिया और अपने बेटे जन्मेजय का राजतिलक कर उन्हें राज्य सौंप दिया।

श्राप से व्यथित और अपने आप को मृत्यु के करीब जानकर राजा ने शुकदेव से पूछा कि मृत्यु के द्वार पर खड़े व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त करने के लिए कौन सा उपाय करने चाहिए। तो शुकदेव ने कहा कि ऐसे व्यक्ति को श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण, चिंतन, मनन करना चाहिए।

भागवत कथा का श्रवण करने से अनेक पापों का यूं ही नाश हो जाता है। कलिकाल में हर व्यक्ति को इस कथा का श्रवण करना चाहिए। शुकदेव के बताए अनुसार राजा परीक्षित ने श्रीमद भागवत कथा का श्रवण किया और उनको मोक्ष की प्राप्ति हुई।

महराज जी ने माता-पिता द्वारा संतान को संस्कारवान बनाने पर जोर देते हुये कहा कि श्रद्धावान , चरित्रवान तथा नीतिज्ञ पुरुष ही विश्व में पूजे जाते हैं। इस प्रकार संतान का श्रद्धावान, चरित्रवान तथा नीतिज्ञ पुरुष बनना जहाँ उनका एक अधिकार है , वहीं माता-पिता के द्वारा उन्हें ऐसा बनाया जाना उनका एक कर्तव्य है।

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।

न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।

अर्थात् ऐसे माता पिता अपनी संतान के शत्रु हैं जो उसे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति कभी भी बुद्धिमानों की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुण्ड में बगुले जैसी होती है। श्रीमद्भागवत की कथा का समय दोपहर 2 से 5 तक है जिसे यूट्यूब पर लाइव तथा संतवाणी चैनल पर रात्रि 8:30 से 11:30 पर प्रसारित किया जा रहा है।