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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -विस्तारित होता किसान आंदोलन

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -विस्तारित होता किसान आंदोलन

-सुभाष मिश्र

जो लोग भी किसानों के आंदोलन को महज पंजाब के किसानों का आंदोलन मानकर इसे कमतर आंक रहे थे, उन सभी लोगों के सामने ही दस माह पुराना आंदोलन विस्तारित होकर अब देशव्यापी हो गया है। तीन कृषि कानूनों की खिलाफत के लिए दिल्ली की बार्डर से शुरू हुआ यह आंदोलन सोमवार को भारत बंद के साथ ही देश के बहुत से राज्यों में अपनी पैठ जमा चुका है। छत्तीसगढ़ की पुण्य नगरी राजिम में हुई किसान महापंचायत इस बात की गवाह है कि किसान और किसान नेताओं के मंसूबे अभी भी मजबूत हैं। वे अब केंद्र सरकार से कृषि संबंधी विवादित कानूनों की वापसी के साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद की गारंटी चाहते हैं। इसके अलावा वे राज्यों से फसल से जुड़े स्थानीय मुद्दों को भी समाहित करते हुए उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में गन्ना खरीदी का मुद्दा, छत्तीसगढ़ में सब्जी की खरीद भी उचित मूल्य पर चाहते हैं।

राजिम किसान महापंचायत में किसान नेता राकेश टिकैत, डॉ. योगेंद्र यादव, मेधा पाटकर, डॉ. सुनीलम सहित बहुत से नेताओं ने हिस्सा लिया। रायपुर में मीडिया से राकेश टिकैत ने कहा कि बीजेपी को बेचने की बीमारी है। दिल्ली वालों की सरकार देख लो, कानून बनाकर आधा देश बेच दिया। भारत सरकार के तीन काले कानूनों का असर पूरे देश में होगा। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में मंडियां बिक रही हैं। वहां 182 मंडियों को बेचने के लिए निकाल दिया गया है। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ में सब्जी उगाने वाले किसान हैं, उन पर भी कानून का असर पड़ेगा। उन सब्जी किसानों को और लाभ कैसे मिले, पॉलिसी क्या बने, इस पर भी बात की की जायेगी। यहा बड़ी समस्या एमएसपी पर है। यह पूरे देश की समस्या है। राजिम महापंचायत में राकेश टिकैत ने सरकारों को खुला चैलेंज करते हुए कहा है कि जो राज्य सरकार किसान का चेहरा नहीं बनेगी, उस राज्य और राजधानी को भी दिल्ली बना दिया जाएगा। कोल्ड ड्रिंक का बहिष्कार करना होगा। विदेशी कंपनियों की आमदनी कम होगी तभी किसान-मजदूर की आमदनी बढ़ेगी। जिन 14 करोड़ लोगों के रोजगार गए हैं, उन्हें आंदोलन करना होगा। उन्होंने कहा कि यदि छत्तीसगढ़ में किसानों को समर्थन मूल्य पर अधिक राशि मिल सकती है, अगर ऐसा है तो यह कानून दूसरे राज्यों पर भी लागू होना चाहिए।  
देश का एक बड़ा वर्ग जो भाजपा समर्थक या किसान आंदोलन विरोधी है वह इस आंदोलन को भिंडरावाला के खालिस्तान समर्थकों का आंदोलन मानता है। उन्हें लगता है कि किसान आंदोलन आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी में बाधा पहुंचाने वाला है। उन्हे यह दिल्ली के शाहीनबाग में सीएए और एनआरसी को लेकर हुए आंदोलन की तरह भी दिखाई देता है। वे इसका अंत दिल्ली दंगे के रूप में भी देखने से गुरेज नहीं करते। वे यह भी कहते हैं कि देश की विपक्षी पार्टियां किसानों को अनावश्यक बहका रही है। कान्ट्रेक्ट फार्मिंग से उनकी जमीन छिन जायेगी, यह सरासर झूठ है। तमाम आरोप-प्रत्यारोप व कार्यवाही के बावजूद किसान अपने आंदोलन में डटे हुए हैं।

किसान नेता यूं ही नहीं नए कृषि कानूनों को किसान विरोधी और पूंजीवादियों का हितैषी बता रहे है। जून 2020 में मध्यप्रदेश के जरिए कृषि कानून आता है, अक्टूबर में सदन से कानून पास हो जाता है, किन्तु इसके बहुत पहले से हरियाणा के पानीपत और उससे लगे क्षेत्र में साइलो स्टोरेज बनना शुरू हो जाते हैं। विशाल स्टील के ढांचे के रूप में नयी और तापमान से अप्रभावित ये बड़े-बड़े भंडारण टैंक में लंबे समय तक अनाज संग्रहित करके रखा जाता है। इन साइलो स्टोरेज में अनाज का भंडारण और परिवहन करने में आसानी होती है। बड़े पूंजीपतियों और कार्पोरेट समूहों द्वारा तैयार साइलो स्टोरेज भविष्य की कालाबाजारी और अवैध संग्रहण के प्रति आगाह करते हैं।

दस माह से भी अधिक अवधि से संचालित किसान आंदोलन को कई बार समाप्त करने, दिशा से भटकाने, किसान नेताओं को डराने-धमकाने के बाद भी बंद नहीं हुआ। किसान आंदोलन से जुड़े योगेंद्र यादव कहते हैं कि आंदोलन के चलते किसानों ने अपना अपमानबोध खोया है और संघर्ष का रास्ता अपनाकर अपना आत्म सम्मान हासिल किया है। किसानों के आंदोलन से पहली बार उन्हें अपनी राजनैतिक हैसियत का भी पता चला है। किसानों ने आंदोलन के जरिए अपना आत्म सम्मान, राजनैतिक ताकत और ऐतिहासिक एकता को पाया है। केंद्र सरकार को अपनी दृढ़धर्मिता छोड़कर किसानों से बात करनी चाहिए। किसान आंदोलन अब पहले से भी ज्यादा व्यापक, गहरा होकर लोकतंत्र बचाने का किसानों की एकता का आंदोलन बन गया है। राजिम में आयोजित किसान महापंचायत के पहले सोमवार को किसानों के भारत बंद को कांग्रेस, आरजेडी, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और लेफ्ट पार्टियों ने समर्थन दिया था। सरकार ने किसानों से अपील की है कि वे आंदोलन छोड़कर बातचीत का रास्ता अपनाएं। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार किसानों की आपत्तियों पर विचार करने के लिए तैयार है। किसान नेताओं ने कहा है कि भारत बंद को पिछले कई साल में इतना समर्थन कभी नहीं मिला था। 25 से ज्यादा राज्यों में बंद कामयाब हुआ है। जब तक किसान विरोधी कानून वापस नहीं लिए जाते और एमएसपी की गारंटी देने वाला केंद्रीय कानून न हो, हम तब तक संघर्ष करने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि किसानों का अहिंसक सत्याग्रह आज भी अखंड है, लेकिन शोषणकारी सरकार को ये पसंद नहीं है।

देश के किसानों को आंदोलित करने वाला कृषि क़ानून 18 जून को अध्यादेश के रुप में आया। मोदी सरकार ने इसे 20-22 सितंबर को लोकसभा-राज्यसभा में पारित करवा दिया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी इस कानून को मिल गई। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से होते हुए यह कानून सरकार की बनाई समिति तक भी गया, किन्तु हासिल कुछ नहीं आया। देश के किसान 26 नवंबर 2020 से अनवरत आंदोलन पर है। देश के लोग चाहते हैं कि सरकार और किसान संगठन आपस में बैठे और इसका कोई बेहतर हल निकाले। यदि कथित किसान हितैषी कानून को बनाने और लागू करने से पहले किसानों, विशेषज्ञों से खुली बातचीत करके इसे लागू किया गया होता तो आज जो हालात निर्मित हुए हैं, वह नहीं होते। गांधी जी के इस देश में अपने वाजिब हितों के लिए आंदोलन की परपंरा पुरानी है और किसान आंदोलन उसी परंपरा का विस्तार है।