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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -क्या परीक्षा के बिना पढ़ाई की सार्थकता नहीं है?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -क्या परीक्षा के बिना पढ़ाई की सार्थकता नहीं है?

-सुभाष मिश्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद केंद्र सरकार ने 12वीं सीबीएसई बोर्ड की परीक्षा छात्रों के स्वास्थ और सुरक्षा को ध्यान में रद्द कर दी है। जब से कोरोना संक्रमण का फैलाव हुआ है तब से देश में स्कूल, कालेजों में परंपरागत तरीके से होने वाली पढ़ाई-लिखाई बंद है। आन लाईन होने वाली पढ़ाई के बाद 10वीं और 12वीं बोर्ड की आन लाईन परीक्षा लेने के लिए न तो सरकार के पास उतना बड़ा सिस्टम है और ना ही आनलाईन पेपर जांचने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक। शहरीय क्षेत्रों के कुछ सरकारी और निजी स्कूलों को छोड़ दे तो ग्रामीण क्षेत्रों में आनलाईन परीक्षा कैसे हो इसके लिए न तो नेटवर्क है ना ही ऐसा कोई सिस्टम। ऐसे में सबसे आसान तरीका है परीक्षा रद्द करना। बोर्ड परीक्षाओं के रद्द होने के बाद छात्रों का मूल्यांकन किस तरह हो इसको लेकर विमर्श जारी है। सीबीएसई का पैटर्न समग्र मूल्यांकन के साथ बहुत सारे पैरामीटर को ध्यान में रखकर इवेल्युवेशन का है जिसमें प्रोजेक्ट के नंबर भी समाहित होते हैं। संभवत: आंतरिक मूल्यांकन, दसवी बोर्ड के नंबर, प्री बोर्ड के नंबर प्रेक्टीकल परीक्षा के नंबर आदि को समाहित कर कोई फार्मूला तैयार हो सकता। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूरी शिक्षा प्रणाली के मूल्यांकन का अंतिम लक्ष्य वार्षिक परीक्षा ही क्यों है? छात्र-छात्राओं की साल भर की पूरी मेहनत पढ़ाई-लिखाई उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी की वार्षिक परीक्षा। स्कूल, कालेज में छात्र-छात्राओं ने क्या सीखा यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण यह है कि उन्हें फाईनल एक्जाम में कितने नंबर मिले। चाहे सरकार हो, शिक्षक हो, विद्यार्थी हो या अभिभावक सभी के लिए एक्जाम सबसे ज्यादा जरूरी है। ऐसा लगता है कि जब तक परीक्षा नहीं होगी तब तक पढ़ाई-लिखाई की कोई सार्थकता नहीं रह जायेगी। बिना वार्षिक परीक्षा के उत्तीर्ण विद्यार्थियों को उतना महत्व शायद नहीं मिले जितना हर साल एक प्रचलित शिक्षा व्यवस्था के तहत होने वाले एग्जाम में पास होने वाले विद्यार्थियों को मिलता है। इस साल 10वीं और 12वीं के सीबीएसई एग्जाम में 30 लाख से अधिक विद्यार्थियों को शामिल होना था जो अब बिना परीक्षा के ही पास होंगे।

हमारी नई शिक्षानीति में भी बोर्ड की परीक्षा प्रणाली को लेकर कोई खास बात नहीं है। कोरोना संक्रमण को देखते हुए कालेजों में स्नातक स्तर के मूल्यांकन में आंतरिक मूल्यांकन को केंद्र में रखकर विद्यार्थियों का मूल्यांकन किया जा रहा है। स्नातकोत्तर कक्षाओं में परीक्षा के आधार पर मूल्यांकन होगा। बारहवीं कक्षा की सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं को रद्द करने का फैसले के लिए आयोजित बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारे छात्रों का स्वास्थ्य और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस पहल पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। आज के समय में ऐसी परीक्षाएं युवाओं को जोखिम में डालने का कारण नहीं हो सकतीं। छात्रों को ऐसी तनावपूर्ण स्थिति में परीक्षा देने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। यह निर्णय सभी हितधारकों में परामर्श करने के बाद छात्र-हित में लिया गया है। परीक्षा रद्द किये जाने की मांग करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि 12वीं की परीक्षा को लेकर बच्चे और पेरेंट्स काफी चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि बिना वैक्सिनेशन, 12वीं की परीक्षा नहीं होनी चाहिए। पिछले परफारमेंशन के आधार पर उनका आकलन किया जाना चाहिए।

परीक्षा आधारित शिक्षा व्यवस्था के चलते 12वीं की परीक्षा को लेकर राज्यों ने केंद्र को अपने सुझाव भेजे थे। इनमें 12 राज्यों ने कहा कि कम अवधि के केवल 3-4 पेपर लिए जाएं। दिल्ली, महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान समेत 8 राज्यों ने कहा कि परीक्षा से पहले सभी छात्रों को वैक्सीन दी जाए या परीक्षा रद्द की जाए। राज्य अपने बोर्ड की परीक्षा में भी यही पैटर्न अपनाएंगे, क्योंकि सुझाव देते वक्त भी यही बात राज्यों ने कही थी। दिल्ली ने सुझाव दिया था कि अगर केंद्र फाइजर के टीके का इंतजाम कर सके, जो 12 साल से बड़े बच्चों को लगाई जा रही है, तो फिर सभी बच्चों के टीकाकरण के बाद परीक्षा हो सकती है। महाराष्ट्र, झारखंड, केरल, मेघालय, अरुणाचल, तमिलनाडु और राजस्थान ने भी परीक्षा से पहले टीके का सुझाव दिया था। महाराष्ट्र ने ऑनलाइन परीक्षा की बात भी कही थी। यूपी, जम्मू-कश्मीर, गुजरात, असम, हिमाचल, चंडीगढ़, सिक्किम, पंजाब, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार और ओडिशा चाहते थे कि सिर्फ मुख्य विषयों की परीक्षा हो और अवधि कम हो। परीक्षाएं अपने ही स्कूल में हों। उत्तर प्रदेश ने कहा था कि सहमति बनती है तो वे एक माह में राज्य बोर्ड की परीक्षा आयोजित कर नतीजे भी घोषित कर देंगे। हरियाणा ने 15 से 20 जून, छत्तीसगढ़ में 1 से 5 जून के बीच घरों में ऑफलाइन परीक्षा की तैयारी की थी।

बहुत से शिक्षाविदों का कहना था कि छात्र लंबे समय से 12वीं की परीक्षा में शामिल होने या न होने की दुविधा से गुजर रहे हैं। इस महामारी की स्थिति में परीक्षा देने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थीं। यह सच है कि छात्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया गया है लेकिन रद्द करने के बजाय छात्रों को टीका लगाया जाना चाहिए था, वे परीक्षा दे सकते थे। कुछ लोगों का मानना है कि परिणाम प्रामाणिक नहीं होगा और लाखों छात्रों के जीवन और करियर को प्रभावित करेगा।

छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा 12वीं की आफलाईन परीक्षा आयोजित करने के लिए विद्यार्थियों को एक जून से 5 जून के बीच प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका देकर घर से लिखकर लाने दी जा रही है। इस परीक्षा की प्रक्रिया में 2 लाख 87 हजार विद्यार्थी भाग लेंगे।

जिस कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रखने को लेकर यह परीक्षाएं रद्द की गई है उन बच्चों को जब तक वैक्सीन नहीं लग जाती, तब तक वे सुरक्षित नहीं हो सकते। पूर्व में बच्चों के बड़े पैमाने पर संक्रमित होना का कारण शिक्षण संस्थाएं खुुलना रहा है। अभी 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को टीका लगाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। फाईजर और मार्डना जैसे वैक्सीन निर्माता अभी बच्चों पर यूएस और कनाडा में वैक्सीन ट्रायल कर रहे हैं। इटली-जर्मनी-पोलैंड ने 12 साल से ऊपर के बच्चों को वैक्सीन लगाने की अनुमति दे चुका है। अभी भारत में फाइजर को किसी भी तरह के टीकाकरण की अनुमति नहीं मिली है। जिस उम्र समूह को हमारे देश में अनुमति है उसके लिए भी टीके उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सरकार और शिक्षाविदों को परीक्षा प्रणाली को लेकर नये सिरे से सोचना होगा। यदि स्थितियां ऐसी ही बनी रही तो परीक्षा रद्द करने के बजाए इसके विकल्प खोजना होगा।