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जितनी जिसकी हिस्सेदारी, उतनी उसकी भागीदारी

जितनी जिसकी हिस्सेदारी, उतनी उसकी भागीदारी

ध्रुव शुक्ल

चुनाव वोट के बाज़ार में राजनीतिक दलों का धंधा है । सभी गठबंधिया दल इस बात पर सहमत हैं कि जो लुटेरा जितने वोट लूटकर लाये , सत्ता में वह उतने मंत्री पाकर देश के खजाने से धन लूटकर अपने दल को पैसा दे और  मंत्री अपना घर भरने की स्वतंत्रता प्राप्त करें। देश जाये भाड़ में।  जाति और संप्रदाय के झूठे अभिमान और लालच में फँसकर। 

लोकतंत्र को लगातार धूमिल करते जाने में मतदाताओं की भी बड़ी भूमिका है। जब सभी राजनीतिक दल और मतदाता लोकतंत्र के विनाश में सहयोगी हों तब इस बात का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि चुनाव में कौन जीता और कौन हारा।

मीडिया के लिए भी चुनाव की खबरें धंधा हैं। उसे भी लोकतंत्र की परवाह कहाँ है। वह तो अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का फटा ढोल पीटकर सत्ता का दास बना हुआ है। लोगों के मन की धरती को जाति और संप्रदाय में बाँट रहा है। स्क्रीन पर घृणा और ईर्ष्या से भरे बकवादियों के चेहरे चमकते हैं, जो एंकर के साथ मिलकर एक हिंसक वार्त्तालाप की बेसुरी जुगलबंदी करते हैं, जहर-बुझे शब्द उगलकर एक-दूसरे को घायल करते हैं। देश उनकी चिंता का विषय नहीं होता, वे तो अपने दल के राजनीतिक पाप छिपाने के लिए अपनी जीभों को अपने मुँह में मारते रहते हैं।

इस बहुविश्वासी देश में बसे लोग आपस में नहीं लड़ रहे। जो लोग इन्हें आपस में लड़ाकर अपनी जीत का मंसूबा बांधते हैं, वे ही एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। देश में अशांति देश के लोगों के कारण नहीं, इन राजनीतिक धंधेबाजों के कारण है जिनने लोकतंत्र को मदारियों के तमाशे में बदल दिया है।