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देह अयोध्या,हृदय राम का घर

देह अयोध्या,हृदय राम का घर

ध्रुव शुक्ल

राम मुझे नहीं रचते, मैं अपने लिए राम को रचता हूँ। वे मेरी प्रकृति से उत्पन्न होने वाली कामना हैं। मैं उन्हें अपनी प्रकृति में बसाये हुए हूँ। राम दुखी होते हैं तो मैं रोता हूँ और वे एक स्वार्थरहित सखा की तरह मुझे ढाढस बँधाते हुए कहते हैं कि सबका जीवन कुयोग-सुयोग पाकर रोज अपनी रामायण रचता रहता है। कोई प्रभु किसी को पार नहीं उतारते। प्रजा ही उन्हें पार उतारती है और उनसे कोई उतराई भी नहीं लेती। 

इक्कीसवीं सदी के बाजार से लौटकर रामायण पढ़ता हूँ और अनुभव करता हूँ कि मायावी स्वर्णमृग का पीछा करके लौट रहा हूँ। मेरी प्रकृति को आज फिर किसी बहुरूपिए ने हर लिया। आज फिर मैं अपने मन से हार गया,बाजार ने मुझे हरा दिया है -- बाजार ही मारीच है,जिसका पीछा करते-करते रोज थक जाता हूँ।

रामायण में इसी थकान को दूर करने की कला छिपी है जो अपना-अपना राम रचने से आती है।अनुभव करता हूँ मेरा शरीर ही अयोध्या है और हृदय राम का घर है। रामायण पढ़ने से उजड़ी हुई अयोध्या फिर बस जाती है।