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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः सब के अलग-अलग शमशान

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः सब के अलग-अलग शमशान


बीत गयी हैं कितनी सदियाँ

सूख गयी हैं कितनी नदियाँ

मर रहा आँख का पानी

कोई कैसे कविता रच दे

कैसे लिखे कहानी

बिगड़ रही है बानी

बिखर रहे हैं मानी


जो नहीं किसी को अपनाता है

जात पूछ कर दफ़्नाता है

कवि कैसे जी पाये उस समाज में

अपनी क्या जात बताये उस को

कहाँ दफ़्न हो जाये

सब के अलग-अलग शमशान!


जहाँ बहते पानी में

जात ढूँढते लोग मिलेंगे

जहाँ तन की माटी की

जात पूछते लोग मिलेंगे

चिता पर चढ़ने न देंगे

ज़मीं में गड़ने न देंगे


कैसा जीवन का मेल

गोरों की बस्ती में

काले रँग को जेल

कैसी जीवन की रेल

चली आ रही

किस शमशान जा रही?


कवि को फिर वह कविता

वही कहानी याद आ रही

जो सदियों से कही जा रही


कुछ भी नहीं बदलता

वही बना रहता है

कुछ रंग नया रहता है

कवि भी नहीं बदलता

कवि बना रहता है

कहने का ढँग नया रहता है