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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -संदर्भ-कोरोना वैक्सीन: उसे भूला नहीं कहते

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -संदर्भ-कोरोना वैक्सीन: उसे भूला नहीं कहते

-सुभाष मिश्र

हमारे यहॉ कहावत है कि सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते। केन्द्र सरकार की टीकाकरण पॉलिसी को लेकर फिलहाल तो यही कहा जा सकता है। 21 जून से जब टीको का पुख्ता इंतजाम हो जायेगा, केन्द्र सरकार सभी को नि:शुल्क टीके देगा। अब राज्यों को इस झंझट में पडऩे की जरूरत नहीं। ये कथासार है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा टीकाकरण कार्यक्रम को लेकर ही की गई नई घोषणा का। कोरोना महामारी से जितनी हायतौबा मची हुई थी, उतनी ही उसके खिलाफ इम्युनिटी विकसित करने वाली वैक्सीन को लेकर मची। अलग-अलग वर्ग समूह में टीके लगाने की कवायद के बीच जब कोरोना वायरस की दूसरी लहर आई तो सरकार ने एक मई 2021 से 18 से 45 आयु समूह के लोगों के टीकाकरण की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दे दी। टीके की उपलब्धता, टीके की कीमत और टीके की डोज खराब होने को लेकर जब राज्य और केन्द्र के बीच टकराव होने लगा तो सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र सरकार को गरियाने लगा, तब जाकर अब पूरे देश का टीका एक हो गया। मोदी ने अपने उद्बबोधन में बताया कि 16 जनवरी से 30 अपै्रल 2021 तक केन्द्र ने टीकाकरण अभियान चलाया। एक मई से राज्यों को 25 प्रतिशत टीकाकरण की जवाबदारी उन्हीं की मांग और दबाव पर संघवाद के सिद्धांत के तहत दी गई। बकौल प्रधानमंत्री स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए हमने राज्यो की बात मानकर उन्हें टीकाकरण की जवाबदारी दी। अब ये जवाबदारी खत्म, हम खुद देखेगे टीकाकरण का समूचा कार्यक्रम। इस पर विपक्ष इसे केंद्र सरकार की गलती मानकर बहुत सारे सवाल कर रहा है।

मोदीजी द्वारा घोषित टीकाकरण की इस नई व्यवस्था को लेकर कुछ सवाल जनमानस के ज़ेहन में भी हैं, देश उनसे जानना चाहता हैं कि देश में पिछले सौ साल में आई इतनी भीषण महामारी से निपटने के लिए निर्णय किस प्रक्रिया से किसने लिए? कोरोना को लेकर अभी तक के सारे निर्णय क्या नोटबंदी, जीएसटी की तरह अकेले मोदीजी ने लिया। यदि ये सभी सामूहिक निर्णय थे तो इनकी बैठक कब-कब हुई, कौन उसमें शामिल था। न्यायालय ने भी यही पूछा और फाईल मंगवाई है कि टीके का आर्डर कब-कब दिया गया। टीका खरीदी का पूरा डाटा दिया जाए। टीकों के लिए एडवांस कब दिया गया। 18 से 44 साल की टीकाकरण की नीति का तार्किक आधार नहीं है।

लॉकडाउन का निर्णय फिर लॉकडाउन राज्यों पर छोडऩे का निर्णय किसने लिया? वैक्सीन मैत्री के तहत विदेशों को वैक्सीन भेजने का निर्णय किसने लिया? वैक्सीन का कितना आर्डर देश के लिए पर्याप्त होगा ये निर्णय किसने लिया? वैक्सीन 45+ और 18+ को देने का निर्णय किसने लिया? 18+ को वैक्सीन राज्य देंगे यह निर्णय किसने लिया? फिर राज्य वैक्सीन खुद खरीदें ये निर्णय किसने लिया? टीको की अलग-अलग दर का निर्धारण किसने किया? भारत बॉयोटेक को राज्य व अस्पतालों को कब किसको कितने टीके देना है ये निर्णय किसने लिया? पीएम केयर्स फण्ड से काम की गाइड लाइन किसने तय की और इसका निर्णय कौन करता है? इसकी कोई गवर्निंग कमेटी है तो उसकी बैठक कब कब हुई? देश में दूसरी लहर आने के पहले टीकाकरण का समूचा कार्यक्रम भारत सरकार चला रही थी तो फिर समय रहते पर्याप्त आर्डर देकर टीके क्यों नहीं खरीदें गये। कोविशील्ड के दो डोज़ के बीच अंतर बढ़ाने का निर्णय किसने लिया और बार-बार बदला? अब फिर से इसे 28 दिन के अंतराल में लगाने हैं, निर्देश क्यों दिये जा रहे हैं। आखिर इस महासंकट के दौर में ये निर्णय कौन ले रहा है? जो लाखों लोगों की जान से खेल रहा है? ऐसा महाशक्तिशाली ज्ञानी, वैज्ञानिक, कुशल प्रशासक कौन है? देश जानना चाहता है। टीकाकरण कार्यक्रम में व्यापक बदलाव की घोषणा करते समय 7 जून को भारत सरकार की कोई केबिनेट बैठक नहीं हुई। लोग जानना चाह रहे है की हमारी समूची संसदीय प्रणाली को दरकिनार करके क्या पीएमओ याने प्राइम मिनिस्टर्स आफिस क्या प्राइम मास्टरमाइंड ऑर्गेनाइज़ेशन हो गया है? सरकारे कहीं की भी हो उसके निर्णय सामूहिक होते है। कोरोना महामारी के समय लिए जा रहे बहुत से निर्णयों को देखकर कतई नहीं लगता की यह सलाह मशविरा से लिए जा रहे हो, ये मन की बातों की तरह एक तरफा हैं। जैसे की टीको की सप्लाई का पूरा कंट्रोल केंद्र ने अपने पास रखकर, राज्यों को याचक की मुद्रा में ला दिया था।

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने दिल्ली सरकार की घर-घर राशन योजना का विरोध करते हुए कहा था कि हम कभी नहीं जान पाएंगे कि अरविंद केजरीवाल किसे राशन दे रहें हैं? ऐसे ही शायद देश ये जान पाये की कोविड 19 को लेकर अब तक लिए गये सारे महत्वपूर्ण निर्णय कौन लेता है? कहने को तो इसके लिए टास्क फोर्स, स्वास्थ्य मंत्रालय में विशेषज्ञों की टीम, मंत्रिपरिषद और राज्य के मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री सबके सब मौजूद थे, फिर महत्वपूर्ण निर्णय में उन्हें क्यों नही शामिल किया गया?

छत्तीसढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फ्री वैक्सीनेशन की घोषणा देरी से लिया गया निर्णय है। उन्होंने कहा कि वैक्सीन की निरंतर आपूर्ति केन्द्र सरकार कैसे करेगी, यही सबसे बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मुख्य समस्या वैक्सीन की पूर्ति की है। हमे एक मई से 7 जून तक छत्तीसगढ़ में केवल 9 लाख 38 हजार 530 वैक्सीन डोज ही प्राप्त हुए। ये रफ्तार वैक्सीन उपलब्ध कराने की रही है। जब वैक्सीन ही उपलब्ध नहीं करा पा रहे है तो डोज कैसे लगेंगे। उन्होंने कहा कि राज्यों पर जो आरोप लगाए जा रहे है वो गलत है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा अब तक 1.5 करोड़ वैक्सीन डोसेज का ऑर्डर कोवैक्सीन एवं कोविशील्ड दिया है जिसके लिए 47 करोड़ 34 लाख रूपए का भुगतान किया है।

टीकाकरण की केन्द्रीकृत नीति और निर्णय को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि वैक्सीन को लेकर राज्यों में आपसी प्रतिस्पर्धा थी। कोई ग्लोबल टेंडर कर रहा था लेकिन कुछ नहीं हो रहा था। वैक्सीन अभियान बिखर रहा था। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अब देश के किसी भी राज्य सरकार को कोविड वैक्सीन प्राप्ति हेतु कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ेगा। सभी देशवासियों के लिए भारत सरकार नि:शुल्क वैक्सीन उपलब्ध करवाएगी।
आप पार्टी के विधायक राघव चड्ढा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की खिंचाई के बाद केंद्र ने यह फैसला लिया, हम इसका स्वागत करते हैं। हमारी मांग राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान चलाने की भी थी, जिसकी अनदेखी की गई। सुप्रीम कोर्ट के लगातार मशक्कत के बाद आखिरकार जाग गया केंद्र।

केंद्र सरकार द्वारा समूची कोरोना महामारी और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं, नीति निर्देशों और टीकाकरण को लेकर जिस तरह का रवैय्या अपनाया गया, उसे लेकर पूरी दुनिया और देश के भीतर उसे आलोचना का शिकार होना पड़ा। जिन परिवारों के लोग आक्सीजन की कमी से मरे, जिन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिली उनके परिवार में भी रोष है। कोरोना वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर जो रोडमैप आना चाहिए, वह अभी भी नहीं आया है। दिसंबर अंत तक प्रधानमंत्री ने जिन 99 करोड़ लोगों को वैक्सीन के डबल डोज लगाने का आश्वासन दिया है, अभी उसकी परीक्षा होनी बाकी है। लोगों के मन में सरकार की नीति और निर्णय को लेकर बहुत से सवाल हैं, जिनका जवाब दिया जाना जरूरी है।