II दांव पर हमारी धर्मनिरपेक्षता : प्रधान संपादक सुभाष मिश्र आगाह कर रहे हैं कि असुरक्षा का भय लगातार बढ़ रहा है, यह किसी दिन बड़े आकस्मिक विस्फोट में तब्दील होगा. सांप्रदायिकता पहले धर्म आधारित थी, अब देशभक्ति भी जुड़ गई है.

II दांव पर हमारी धर्मनिरपेक्षता : प्रधान संपादक सुभाष मिश्र आगाह कर रहे हैं कि असुरक्षा का भय लगातार बढ़ रहा है, यह किसी दिन बड़े आकस्मिक विस्फोट में तब्दील होगा. सांप्रदायिकता पहले धर्म आधारित थी, अब देशभक्ति भी जुड़ गई है.

सुभाष मिश्र

प्रधानमंत्री के आह्वान पर करोड़ों हथेलियों से जो उम्मीदों के ज्योति कलश दमके, उसने कोरोना के खिलाफ पूरे देश की एकजुटता का संदेश दिया। किसी ने इसे संकल्प, समर्पण, समर्थन और सहयोग की दीवाली बताया तो किसी ने भारतीय इतिहास की अद्भूत, अविस्मणीर्य घटना। ये सही है कि पूरा देश ही नही, पूरी दुनिया चाहती है कि कोरोना' नामक वायरस से होने वाली जानलेवा बीमारी से मुक्ति मिले। सभी देश इसकी दवा खोजने में लगे हैं और देर सबेर वो मिल भी जायेगी।

कोरोना रूपी बीमारी से उपजे संकट से उभरने के लिये अपने-अपने घरों में बैठे लोगों में नये उत्सव का संचार कराने, उनका मनोबल बढ़ाने के लिये हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने पहले लोगों से अपने-अपने घरों से थाली, ताली बजाई। अब लोगों ने 9 मिनट घर की बत्ती बंद करके दीया, मोमबत्ती, मोबाइल की रौशनी की। मीडिया में इसकी प्रशंसा हुई, लोगों ने लाईट जलाते हुए सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीर भी शेयर की। देश की अखंडता, एकता और राष्ट्रीय भावना रखने वाले बहुतों से लोगों को प्रधानमंत्री के आह्वान बेमानी लगे, अवैज्ञानिक लगे तो उन्होंने ताली-थाली नहीं बजाई। लाईट बुझाने, जलाने के इस राष्ट्रीय खेल में शामिल नहीं हुए। तो क्या ऐसे लोग देशद्रोही हैं?

क्या उन्होंने अपनी तमाम असहमति और वैज्ञानिक सोच के बावजूद इस तरह के मातमी धुन पर मनाये जाने वाले उत्सवों का हिस्सा बनना चाहिए था? 'देखा-देखी या लोग क्या कहेंगे' के इस भय से बहुत से लोगों ने घर की बाहर की लाईट बंद कर दी या फिर एक दो मोमबत्ती जला दी। उन्हे लगा होगा कि यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो आस पड़ोस हमारे बारे में क्या सोचेंगे! बहुत से उत्साही लोगों ने आतिशबाजी की, फटाखे फोड़े और बहुत से दीये जलाये। प्रधानमंत्री ने केवल एक दीया जलाया। स्ट्रीट लाईट बंद न की जाये, इस संदेश के बावजूद कालोनियों में बंद कर दी गई। यह उत्साह और भक्ति का अतिरेक है। मीडिया में नासा और दूसरों के हवाले से रौशनी की तस्वीरें साझा की गई। कोरोना पर जीत जैसा जश्न मनाया गया।

स्वयं प्रधानमंत्री इस पूरे दृश्य से अभिभूत थे। वे चाहकर भी पीपीई किट की कमी की वजह से जो डाक्टर्स वायरस के शिकार हो रहे हैं, उनके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे हैं। मास्क, सेनेटाईजर, वेंटिलेटर की अभी बहुत ज्यादा जरूरत नहीं है। अभी तो पचास हजार से कुछ ज्यादा ही लोगों का परीक्षण हुआ है। हमने कोरोना पर लगभग विजय पा ही ली है, फिर जश्न क्यों ना मनाएं? जैसी चले बयार, पीठ वैसी कीजिए, इस युक्ति को गांठ बांधकर चलने वाले सभी लोग ऐसा कुछ नहीं बोलते, करते जो समय की धारा के, बहुसंख्यक मानसिकता के खिलाफ हो। भले ही वे व्यक्तिगत स्तर पर इन बातों का समर्थन नहीं करते, परन्तु 'पंगा कौन ले' सोचकर अक्सर वहां भी चुप हो जाते हैं, जहां उन्हें बोलना चाहिए, विरोध करना चाहिए।

राजेश जोशी की इस तरह के हालात पर कविता है-
कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे
जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे


हिन्दू धर्म में जो खुलापन था, वह खत्म होता जा रहा है और संकीर्ण बनाने की कोशिश जारी है। खुलापन, जो हिन्दू धर्म का सौंदर्य था, उसे नष्ट किया जा रहा है और उसे इस्लाम और इसाई धर्म की तरह किताब में लिखी इबारत में बदलने की कोशिश हो रही है। हमारे समाज में धीरे-धीरे असहमति का 'स्पेस कम होता जा रहा है जबकि हमारे यहां नये-नये विचारों को खोजने की परंपरा थी। पहले से जो मत, धर्म और परंपराएं चली आ रही हैं, उससे पूरी तरह असहमति जताते हुए अपनी बात कही जा सकती थी। चार्वाक, सुकरात, कबीर जैसे अनेकों विद्वानों, विचारकों से असहमति के बाद समाज उन्हें ऋषि संत कहता था। मंडन मिश्र के यहां शास्त्रार्थ की परपेरा रही है। विरोध का सम्मान होता था। अब हमारे यहां विचारों के लिये कोई जगह नहीं है।

आज कोरोना समय में सबको एकजुट होकर इस विश्वव्यापी बीमारी से निजात के लिये सोचना चाहिए। बहुत सारे लोग इस समय राष्ट्रभक्ति खोज रहे हैं। जो उनके विचारों, आदेशों, आह्वान से सहमत नहीं हैं, उसके बारे में सोशल मीडिया के जरिए तरह-तरह की भ्रांति पूर्ण जानकारी देकर गालीगलौच करते हुए उन्हें राष्ट्रविरोधी करार दिया जा रहा है। राष्ट्रीय एकता के नाम पर बहुत सारे ऐसे एजेंडे लागू करने की कोशिशें हो रही हैं, जो दरअसल राष्ट्र को बांटने वाली उसकी एकता, अखंडता और भाईचारे को तोड़ऩे वाले हैं। बहुत से लोगों को मोदी जी की नीतियों, कार्यकलापों के बारे में आलोचना अच्छी नहीं लग रही है। उन्हें लगता है कि जब प्रधानमंत्री के आह्वान पर, पूरा देश कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ ताली बजा रहा है, मोमबत्ती जला रहा है तो आप क्यों नहीं?

आप जिन लोगों के बीच रह रहे हैं, उन्हें अलग आचरण व्यवहार करने की क्या जरूरत है। ताली-थाली बजाने, लाईट जलाने से आपका क्या चला जायेगा? यदि आप गलती से मुस्लिम हैं या किसी अन्य धर्म के हैं तो आप राष्ट्रद्रोही हैं जिसे भारतमाता से, देश से प्यार नहीं है और यदि आप हिन्दू हैं तो आप हरामी हैं, गद्दार हैं। धारा के विरुद्ध बोलना, अपराध हो कथित धर्म सत्ता के खिलाफ बोलकर आप संदेह के घेरे में आ जाते हैं। अल्पसंख्यक सिर्फ मुसलमान ही नहीं होते हैं। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि व्यक्ति प्रकट में बहुसंख्यक में शामिल होता है लेकिन उसके विचारों से उसकी गिनती अल्पसंख्यक में शामिल होती है।

जो लोग 5 अप्रैल की रात को दीया जलाने का कोई तार्किक आधार नहीं देख रहे थे और अपने घरों में दीया नहीं जलाया, ऐसे व्यक्ति एकाएक प्रतिपक्ष बन गये। ऐसा प्रतिपक्ष जिसे आसानी से वे लोग देशद्रोही करने में नहीं हिचक रहे थे जिनका अतीत बेईमानी, भ्रष्टाचार और कालाबाजारी से भरा हुआ है। वे लोग मात्र एक दीपक जलाकर देशभक्त का प्रमाण—पत्र खुद को ही बांट रहे थे। वे स्वघोषित देशभक्त होकर घर के आगे पटाखे फोड़ रहे थे। ऐसे लोगों के भीतर एक हीनता.बोध होता है। बेईमान और कालाबाजारी से उपजा हीनताबोध ऐसे ही अवसर की प्रतीक्षा में होता है जब वे अपने आपको देशभक्त कह सकें और उसमें ज्यादा बड़ी बात यह कि वे खुद को देशभक्त दिखा भी सकें।

सारा जोर खुद को देशभक्त दिखाने का है। यह देशभक्ति का एक कुत्सित शार्टकट है। ऐसी देशभक्ति आगे चलकर व्यक्ति को ज्यादा उच्छृंखल और अनियंत्रित बनाएगी। थाली पीटने और दीपक जलाने के आयोजनों ने व्यक्ति को इस राह पर डाल दिया है। यही वो प्राथमिक बिन्दु है जहां से अल्पसंख्यक खासकर मुसलमानों को विभेद सहना पड़ता है। असुरक्षा का भय लगातार बढ़ता जा रहा है। यह किसी दिन बड़े आकस्मिक विस्फोट में तब्दील होगा। सांप्रदायिकता पहले चोर पैरों से आती थी, अब ऐलान करके आ रही है। सांप्रदायिकता में अब धर्म, आर्थिक कारण और आयातीत फंडिंग भी शामिल हो गई है। धर्म का इस तरह देशभक्ति से जुडऩा देश के लिये दुर्भाग्य है। पहले सांप्रदायिकता धर्म आधारित थी। अब देशभक्ति का मुद्दा भी शामिल हो गया है।

धर्म का सच्चा रूप जीवन सौंदर्य रचता है। इतिहास और सभ्यता से संवाद करता है लेकिन देशभक्ति में सारी चीजें गौण हो जाती हैं। यह एक सोच-समझकर गढ़ा गया 'मेटाफर है। इससे भ्रष्ट और बेईमान आदमी को नैतिकता के प्रश्नों से बचने का अवसर मिल जाता है। इस देश का दुर्भाग्य है कि साम्प्रदायिकता इस तरह बदल रही है और अवसरवादी इसी काम में जुटे हैं। साम्प्रदायिकता धर्म के लिये दुर्भाग्य और देश के लिए अभिशाप है। इस नई साम्प्रदायिकता में अब बहुसंख्यक भ्रष्ट और बेईमानों को भी, जो इस धतकरम की भीड़ में शामिल नहीं हैं, देशद्रोही कहने का अवसर मिल गया है।

( लेखक दैनिक आज की जनधारा और वेब न्यूज मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )